मैं भी इक संतूर रहा हूं।


दिल ही हूं मजबूर रहा हूं,
इसीलिए मशहूर रहा हूं।


चलता आया उसी लीक पर,
दुनिया का दस्तूर रहा हूं।


नए दौर में सच्चाई का,
चेहरा हूं, बेनूर रहा हूं।


वो नज़दीक बहुत हैं मेरे,
जिनसे अब तक दूर रहा हूं।


चोट लगी तो फूल झरे हैं,
मैं भी इक संतूर रहा हूं।


कहते हैं सब कभी किसी की,
आंखों का मैं नूर रहा हूं।


अब मुझको आना न जाना,
मैं तो बस मग़्फ़ूर रहा हूं।

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संतूर-  एक वाद्ययंत्र
मग़्फ़ूर-जिसे मोक्ष प्राप्त हो गया हो



                                          -महेंद्र वर्मा

सबसे उत्तम मित्र


ग्रंथ श्रेष्ठ गुरु जानिए , हमसे कुछ नहिं लेत,
बिना क्रोध बिन दंड के, उत्तम विद्या देत।


संगति उनकी कीजिए, जिनका हृदय पवित्र,
कभी-कभी एकांत भी सबसे उत्तम मित्र।


मन-भीतर के मैल को, धोना चाहे कोय,
नीर नयन-जल से उचित, वस्तु न दूजा कोय।


मन की चंचल वृत्ति से, बिगड़े सारे काज,
जिनका मन एकाग्र है, उनके सिर पर ताज।


करुणा के भीतर निहित, शीतल अग्नि सुधर्म,
क्रूर व्यक्ति का हृदय भी, कर देती है नर्म।


गुण से मिले महानता, ऊंचे पद से नाहिं,
भला शिखर पर बैठ कर, काग गरुड़ बन जाहि ?


मनुज सभ्यता में नहीं, उनके लिए निवास, 
जो हर क्षण दिखता रहे, खिन्न निराश उदास।


                                                                                     -महेंद्र वर्मा

संत गंगादास

महाकवि संत गंगादास का जन्म ई. सन् 1823 में मेरठ जनपद के रसूलपुर गांव में हुआ था। इनका परिवार अत्यंत संपन्न था। उस समय इनके पिता के पास 600 एकड़ जमीन थी। किंतु परिवार से विरक्ति के कारण 12 वर्ष की उम्र में ही इन्होंने बाबा विष्णुदास उदासी से शिष्यत्व ग्रहण कर लिया। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में संत गंगादास और उनके शिष्यों का उल्लेखनीय योगदान रहा।

संत गंगादास ने 25 से अधिक काव्य ग्रंथों और सैकड़ों स्फुट पदों का सृजन कर भारतेंदु हरिश्चंद्र के बहुत पहले खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा का दर्जा दिया। इनके द्वारा रचित प्रमुख कथा-काव्य इस प्रकार हैं- पार्वती मंगल, नल दमयंती, नरसी भगत, ध्रुव भक्त, कृष्ण जन्म, नल पुराण, राम कथा, नाग लीला, सुदामा चरित, महाभारत पदावली, बलि के पद, रुक्मणी मंगल, भक्त प्रहलाद, चंद्रावती नासिकेत, भ्रमर गीत मंजरी, हरिचंद होली, हरिचंद के पद, गिरिराज पूजा, होली पूरनमल, पूरनलाल के पद, द्रौपदी चीर आदि।

संत गंगादास का देहावसान 90 वर्ष की आयु में भाद्रपद कृष्ण 8 वि. संवत 1970 तदनुसार ई. सन् 1913 को हुआ। इनकी समाधि रसूलपुर गांव के निकट चोपला में स्थित है।

प्रस्तुत है, संत गंगादास की दो कुंडलियां-

1.
बोए पेड़ बबूल के, खाना चाहे दाख,
ये गुन मत परगट करे, मन के मन में राख।
मन के मन में राख, मनोरथ झूठे तेरे,
ये आगम के कथन, कभी फिरते न फेरे।
गंगादास कह मूढ़, समय बीती जब रोए,
दाख कहां से खाय, पेड़ कीकर के बोए।


2.
जे पर के अवगुण लखे, अपने राखे गूढ़, 
सो भगवत के चोर हैं, मंदमती जड़ मूढ़।
मंदमती जड़ मूढ़, करे निंदा जो पर की,
बाहर भरमें फिरे, डगर भूले निज घर की।
गंगादास बेगुरु पते पाए न घर के,
वो पगले हैं आप, पाप देखें जो पर के।