छत्तीसगढ़ी में संस्कृत के शब्द




छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए इस मौसम में ‘ओल’ महत्वपूर्ण हो जाता है । रबी फसल के लिए खेत की जुताई-बुआई के पूर्व किसान यह अवश्य देखता है कि खेत में ओल की स्थिति क्या है । ओल मूलतः संस्कृत भाषा का शब्द है । विशेष बात यह है कि ओल का जो अर्थ संस्कृत में है ठीक वही अर्थ छत्तीसगढ़ी में भी है । दोनों भाषाओं में ओल का अर्थ नमी है ।


शब्द या़त्रा करते हैं, समय और देश, दोनों के सापेक्ष । इस यात्रा के प्रभाव से अनेक शब्द अपना स्वरूप और अर्थ बदल देते हैं । किंतु कुछ शब्द ऐसे भी होते हैं जो हज़ारों साल बाद भी अपना चोला नहीं बदलते । हिन्दी सहित भारत की लगभग सभी भाषाओं और बोलियों में संस्कृत के बहुत सारे शब्द हैं ।   छत्तीसगढ़ी में भी कुछ ऐसे शब्द हैं जो संस्कृत के हैं और जिनकी वर्तनी और अर्थ दोनों अभी भी संस्कृत के समान हैं । ऐसे ही कुछ शब्दों के उदाहरण देखिए- पर, दूसरे, पर के जिनिस । समेत, सहित, झउहाँ समेत उठा ले । कपाट, किवाड़, कपाट ल ओधा दे । मरीच, काली मिर्च, सरदी हे त घी मरीच पी ले । लसुन, लहसुन, लसुन मिरचा के चटनी, संस्कृत वर्तनी लशुन है । सङ्ग, साथ, ओकर संग ल झन छोड़बे । हन, मारना, ओतके मा नँगत हन दीस । कुकुर, कुत्ता । संस्कृत शब्दकोषों में कुकुर की दो और वर्तनियाँ हैं- कुर्कर और कुक्कुर, संस्कृत पर्याय श्वान भी है। कूची, चाबी, तारा के कूची गँवागे । नाथ, बैल के नाक में डाली गई रस्सी, बइला ल नाथ दे.......इत्यादि ।


अब छत्तीसगढ़ी के कुछ ऐसे शब्द जो संस्कृत के हैं किंतु जिनकी वर्तनी में छत्तीसगढ़ी में उच्चारण लाघव के कारण ज़रा-सा ही परिवर्तन हुआ है । अङ्गार से अँगरा, गुरु से गरू अर्थात भारी, प्रीत से पिरीत, विष से बिख, वृथा से बिरथा, इह से इही यानी यहीं, मरकी ला इही मेर मढ़ा दे । स्वाद से सेवाद, शाक से साग, वत्सर से बच्छर या बछर किंतु वर्ष से बरस, सर्वस्व से सरबस, अपन सरबस ल दान कर दीस । व्यवहार से बेवहार, सूची से सूजी अर्थात सुई, आदित्यवार से अइतवार, लवङ्ग से लवाँग, दोला से डोला यानी पालकी, अञ्जलि से अँजरी, हृदय से हिरदे, विपत्ति से बिपत, चिक्कण से चिक्कन यानी चिकना, मुहूर्त से मुहरुत, मूक से मुक्का यानी गूँगा, चमस से चम्मस यानी चम्मच, वर्जना से बरजना यानी मना करना, चिह्न से चिनहा, पाण्डर से पँड़रा यानी सफेद, छन्द से छाँदना- घोड़वा ला छांद दे, पाषाण से पखना, प्रस्तर से पथरा, तप्त से तात, तात पानी पीबे के जूड़ पानी ।


पीयूष या पेयूष से पेंउस, प्रसूता गाय के दूध से बना व्यंजन, देहली से डेहरी, प्रकट से परगट, दलन से दरन- अरन बरन कोदो दरन, जभे देबे तभे टरन । घर्षण से घँसरना, भित्ति से भितिया यानी दीवार, महिषी से भैंसी- भैंसी हा भितिया मा मूड़ी ला घँसरत हे । मुण्ड से मूड़, मसि से मस यानी स्याही, हमारे समय में स्याही की टिकिया आती थी, हम कहते थे- दवात मा मस घोर डरेंव। बर्बटी से बरबट्टी, भृति से भूती, मजदूरी, बनी-भूती, चित्रित से चितरी- चितरी केरा, संलग्न से सरलग, सूत्र से सूत यानी धागा, हड्ड से हाड़ा, हण्डी से हाँड़ी और हँड़िया, शिला से सिल, चटनी पीसने का.......आदि ।


छत्तीसगढ़ी में बहुत से शब्द ऐसे हैं जो संस्कृत से आए हैं किंतु उनकी वर्तनी में अधिक अंतर हो गया है जबकि अर्थ वही हैं जो संस्कृत में हैं, उदाहरण देखिए- पोष्य से पोंसवा, जिसका पालन और पोषण किया जाए, पोंसवा कुकुर, आश्चर्यचकित से अचानचकरित, स्कन्ध से खाँध यानी कंधा, विलोडन से बिलोना, दही बिलोना, अम्लिका से अमली यानी इमली, स्फुटन से फूटना यानी फटना, फुग्गा फूटगे, विकार से बिगाड़, मित्र से मितान, योक्त्र से जोंता यानी गाड़ी में बैल को युक्त करने की रस्सी, राक्षस से रक्सा, लङ्घ से लाँघन रहना यानी उपवास रहना, वण्ड से बँड़वा यानी जिसमें नोक न हो या कुछ हिस्सा टूट गया हो, प्रतिवेशी से परोसी यानी पड़ोसी । भृङ्गराज से भेंगरा, एक पौधा, पट्टवायक से पटवा, धागे से अनेक प्रकार की शृंगारिक वस्तुएं बनाने वाला, अक्ष से अस्कुड़ यानी बैलगाड़ी का एक्सेल ।


अञ्जन से आँजना, लइका ला काजर झन आँज, अनम्बर से नँगरा यानी बिना कपड़े का, ईर्ष्या से इरखा, पारावत से परेवा यानी कबूतर, मधुरस से मँदरस, बुस से भूँसा, मन्द्र से माँदर, एक अवनद्ध वाद्ययंत्र, विस्मरण से बिसरना,  लाङ्गल से नाँगर यानी हल, राशि से रास यानी ढेर, धान के रास मा दिया बार दे । कुक्कुट से कुकरा, पिष्टान्न से पिसान, पिष्ट अन्न यानी पिसा हुआ अन्न । अन्य से आन यानी दूसरा और अन्यत्र से अन्ते यानी कोई अन्य स्थान, न्याय से नियाव, अत्याचार से अइताचार, आर्द्रा से अदरा, एक नक्षत्र, मृग से मिरगा, नक्षत्र भी हिरण भी । इतस्ततः से एती-तेती यानी इधर-उधर, उच्चारण से उचार, विवाह में शाखोचार होता है, शाखा यानी वेदमंत्र पाठ की विभिन्न परंपराएं, संस्कृत में शाखोच्चारण । गोस्थान से गौठान, उत्साह से उछाह, कोष्ठागार से कोठार, खर्पर से खपरा, छान्ही के खपरा, तर्षण से तरसाना, धवल से धौंरा, धौंरा बइला, वञ्चक से बंचक यानी धोखेबाज, पीताम्बर से पीतामड़ी ......आदि ।


कुछ शब्द ऐसे भी हैं जो संस्कृत से छत्तीसगढ़ी में आए हैं किंतु उनका उच्चारण तो परिवर्तित हुआ ही, किंचित अर्थ परिवर्तन भी हुआ है, जैसे- विकट का अर्थ भयानक, विकराल, बड़ा है, इस से बना बिक्कट यानी बहुत । षट्कर्म से खटकरम, षट्कर्म का अर्थ छह क्रियाएं जो शास्त्रों में ब्राह्मणों के लिए निर्धारित हैं किंतु इसी से बना खटकरम का अर्थ झंझट है । शून्य से सुन्न और सुन्ना, सुन्न यानी चेतनाहीन और सुन्ना यानी सुनसान । भाषण से बना भँसेड़ना यानी फटकारना, ओ भासन देवइया ला बने भँसेड़ के आबे । कुभार्या से कुभारज और विधुर से बिदुर, पाञ्चाली से पंचाएल, भाण्ड से भड़वा, गाली के लिए प्रयुक्त होते हैं । स्थिर से थिर यानी विश्राम या आराम, थोकन थिरा ले । पूर्ति से पुरती, तोर पुरती तैं लेग जा ।


अब कुछ ऐसे छत्तीसगढ़ी शब्दों के उदाहरण जो संस्कृत शब्दों में कोई प्रत्यय जोड़ने से बने हैं । संस्कृत में भण्ड का अर्थ है- उपहास करना, इसी से छत्तीसगढ़ी में शब्द बना- भड़ौनी, विवाह के अवसर पर गाया जाने वाला एक गीत । मुख से मुखारी और दंत से दतवन, दांत साफ करने हेतु नीम, बबूल आदि की पतली टहनी । वामन से बावनबूटा यानी बौने कद का, यह शब्द स्वयं बुटरा हो गया । मंडलेश यानी सूबेदार, अब अच्छी आर्थिक स्थिति वाले किसान को मंडल कहते हैं । पाण्डुर से पिंड़ौरी यानी पीले रंग का, पिंड़ौरी माटी ।


इसी तरह के सैकड़ों शब्द छत्तीसगढ़ी में हैं जो संस्कृत से आए हैं । ऊपर दिए गए उदाहरणों में उन शब्दों को यथासंभव स्थान नहीं दिया गया है जो संस्कृत के हैं किंतु हिन्दी और छत्तीसगढ़ी दोनों भाषाओं में एक जैसे या कुछ अंतर के साथ प्रयुक्त होते हैं, जैसे- आश्रय से आसरा, क्षण से छिन, वंश से बाँस, घृणा से घिन, रात्रि से रात, चन्द्र से चंदा, खट्वा से खटिया आदि ।


हमने जाना कि किसी छोटे से क्षेत्र की भाषा के शब्द हज़ारों साल बाद भी जीवित रह सकते हैं। संस्कृति के संरक्षण और विकास से भाषा समृद्ध होती है तथा भाषा संस्कृति को अगली पीढ़ियों तक संचारित करती रहती है । भाषा कमजोर होती है तो संस्कृति का भी क्षरण होता है । इसलिए नई पीढ़ी के लिए यह आवश्यक है कि वे लगभग बिसरा दी गई अपनी समृद्ध भाषायी संस्कृति को जानें और समझें ।


-महेन्द्र वर्मा

औपनिषदिक ब्रह्म और ऊर्जा



उपनिषदों में ब्रह्म की अवधारणा एक दार्शनिक अवधारणा है, धार्मिक अवधारणा नहीं । वेदों के संहिता खंड में बहुत सी प्राकृतिक शक्तियों के लिए प्रार्थनाओं का उल्लेख है । ब्राह्मण खंड में इन प्राकृतिक शक्तियों की उपासना के लिए कर्मकाण्ड का विधान वर्णित है । इस कर्मकाण्ड की प्रतिक्रिया के रूप में उपनिषदों में ऋषियों ने एक नया विचार प्रस्तुत किया जो आगे चलकर भारतीय दर्शन का मूल बना। इस विचार के अंतर्गत ब्रह्म की अवधारणा प्रस्तुत की गई जो वेदों में उल्लेखित प्राकृतिक शक्तियों का केवल एकीकृत रूप ही नहीं है बल्कि विशाल ब्रह्माण्ड से लेकर सूक्ष्म कण जैसे पदार्थों तक, अमूर्त भौतिक शक्तियों से लेकर भावनाओं तक का समेकित रूप है।

ब्रह्म के वर्णन में विचारणीय बात यह है कि इसमें और आधुनिक विज्ञान की ऊर्जा संबंधी तथ्यों में बहुत अधिक समानता परिलक्षित होती है ।

आधुनिक विज्ञान मुख्य रूप से पदार्थ और ऊर्जा का अध्ययन करता है । संपूर्ण ब्रह्माण्ड इन्हीं दोनों की परस्पर प्रतिक्रिया से संचालित है । ऊर्जा के संबंध में विज्ञान के विचार ये हैं-

1.    ऊर्जा उत्पन्न नहीं की जा सकती और न ही नष्ट की जा सकती है । दूसरे शब्दों में, इस ब्रह्माण्ड में जितनी ऊर्जा है उतनी पहले भी थी और उतनी ही हमेशा रहेगी । यहां जितनी और उतनी शब्दों को अनंत के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है ।
2.    ऊर्जा एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ में स्थानांतरित हो जाती है, स्वाभाविक रूप से अथवा प्रयास द्वारा ।
3.    ऊर्जा के द्वारा कार्य संपन्न होता है अर्थात यह प्रत्येक कार्य का कारण है ।
4.    ऊर्जा स्वयं को अनेक रूपों में व्यक्त करती है, स्वाभाविक रूप से या प्रयास द्वारा ।
5.    चूंकि ऊर्जा पदार्थ नहीं है इसलिए इसका कोई रूप-आकार, रंग-गंध, घनत्व-आयतन आदि जैसा  गुण नहीं होता ।
6.    प्रत्येक पदार्थ में ऊर्जा निहित है ।
7.    पदार्थ ऊर्जा में और ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित होती रहती है ।
8.    ऊर्जा वह है जिसके कारण कोई कार्य संपन्न होता है ।
9.    पदार्थ ऊर्जा के कारण ही अस्तित्व में आते हैं, ऊर्जा के कारण ही उनका अस्तित्व बना रहता है और ऊर्जा के कारण ही वे नष्ट होकर पुनः ऊर्जा में रूपांतरित हो जाते हैं ।


उपनिषदों में वर्णित ब्रह्म संबंधी विचारों में यद्यपि उस समय तक उपलब्ध तार्किक ज्ञान और उस समय की चिंतन शैली और उस समय की काव्यमय भाषा झलकती है फिर भी ब्रह्म के लक्षण संबंधी मूल विचार स्पष्ट हैं, जिन्हें हम तथ्य कह सकते हैं । इन तथ्यों में यदि ब्रह्म के स्थान पर उर्जा रखकर मनन करें तो भी ये कथन ऊर्जा के संदर्भ में सही हैं । इन पर विचार करें और ब्रह्म की ऊर्जा से तुलना करें -

अनाद्यनंतम् महतः परं ध्रुवं । कठोपनिषद, 1।3।15

ब्रह्म अनादि और अनंत है, श्रेष्ठ है और दृढ़ सत्य है ।
ऊर्जा का भी प्रारंभ और अंत नहीं होता ।

नित्यं विभुं सर्वगतं ।
मुंडक 1।1।6

ब्रह्म नित्य है, व्यापक है और सब में विस्तारित है ।
ऊर्जा भी शाश्वत है, सर्वत्र है और सभी पदार्थों में है ।

अक्षरात्संभवतीह विश्वं। मुंडक 1।1।7

अविनाशी ब्रह्म से ही इस सृष्टि में सब कुछ उत्पन्न होता है ।
ऊर्जा से ही पदार्थों की उत्पत्ति होती है, पहले निर्जीव बाद मे क्रमशः सजीव।

सर्वखल्वमिदम् ब्रह्म । छान्दोग्य 3।14।1

यह संपूर्ण विश्व ब्रह्म है ।
चूंकि पदार्थ ऊर्जा में परिवर्तित होता है इसलिए विश्व को ऊर्जामय कह सकते हैं ।

एकं रूपं बहुधा यः करोति । कठ, 2।2।12

ब्रह्म अपने एक रूप को ही विविध रूपों में व्यक्त करता है ।
सभी प्रकार के पदार्थ ऊर्जा के ही रूपांतरण हैं । एक  ही ऊर्जा  विभिन्न  प्रकार की ऊर्जा में रूपांतरित हो सकती है ।

इदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । छांदोग्य 6।2।1

आरंभ में यह एकमात्र अद्वितीय ही था ।
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के पहले केवल ऊर्जा ही विद्यमान थी, कृष्ण विवर के रूप में । महाविस्फोट सिद्धांत यही व्यक्त करता है ।

यतो वा इमानिभूताति जायन्ते येन जातानि जीवन्ति,
यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासत्व ।
तैत्तिरीय, 3।1।1

ब्रह्म सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप और अनंत है, जिनसे ये सम्पूर्ण पदार्थ जन्म लेते, जन्म लेकर जिनसे जीवन धारण करते तथा प्रलय के समय जिनमें पूर्णतः प्रवेश कर जाते हैं, उनको जानने की इच्छा करो ।
पदार्थ ऊर्जा के कारण ही अस्तित्व में आते हैं, ऊर्जा के कारण ही उनका अस्तित्व बना रहता है और ऊर्जा के कारण ही वे नष्ट होकर पुनः ऊर्जा में रूपांतरित हो जाते हैं ।

अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमो अवाय्वनाकाशमसड.गमरसमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनो अतेजस्कमप्राणममुखममात्रमनन्तरमबाह्यम् बृहदारण्यक 3।8।8

वह ब्रह्म न स्थूल है, न अणु है, न क्षुद्र है, न विशाल है, न अरुण है, न द्रव है, न छाया है, न तम है, न वायु है न आकाश है, न संग है, न रस है, न गंध है, न नेत्र है, न कर्ण है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, उसमें न अंतर है न बाहर है ।
ऊर्जा के संबंध में भी ये बातें सही हैं ।

यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्,
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि ।
केन 1। 5

जिसका मन के द्वारा मनन नहीं होता, जिसकी शक्ति से ही मन मनन करने में समर्थ होता है, उसी को तुम ब्रह्म जानो ।
जब हम सोचते हैं तो भी ऊर्जा की आवश्यकता होती है ।

येद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। केन, 1।4

जो वाणी के द्वारा अभिव्यक्त नहीं होता, जिसके द्वारा वाणी अभिव्यक्त होती है, उसे ही तुम ब्रह्म जानों ।
हम ऊर्जा के कारण ही बोल पाते हैं ।


स आत्मा, तत्वमसि । छांदोग्य 6।8।7

यह आत्मा है, वह तुम हो ।
आत्मा भी ऊर्जा है, तुम ऊर्जा हो । चूंकि तुम कार्य कर सकते हो इसलिए तुम्हारे भीतर ऊर्जा है ।

अहं ब्रह्मास्मि । बृहदारण्यक 1।4।10

मैं ब्रह्म हूं ।
मैं ऊर्जा हूं ।

छान्दोग्य उपपिषद के 7 वें अध्याय में कहा गया है कि नाम, वाक्, मन, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न, जल, तेज, आकाश, स्मरण, आशा, प्राण ....ये ब्रह्म हैं ।
हमारे मन की भिन्न-भिन्न दशाएं और भावनाएं भी मानसिक ऊर्जा के कारण प्रदर्शित हो पाती हैं ।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि ब्रहम की अवधारणा ऊर्जा की अवधारणा से बिल्कुल मेल खाती है । प्रारंभ में रचे गए 10 मुख्य उपनिषदों में ब्रह्म संबंधी ऐसे ही अनेक उदाहरणों की प्रचुरता है । यहां केवल कुछ ही दिए गए हैं । यह चर्चा दर्शन से संबंधित है। वर्तमान समय में दर्शन के अंतर्गत परंपरागत विषयों पर चर्चा नहीं की जाती क्योंकि जो कभी दर्शन के विषय थे उनमें से अनेक का अब विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन होता है, जैसे सृष्टि की उत्पत्ति और उसका विकास । प्रारंभिक उपनिषदों के बाद के विद्वानों ने ब्रह्म को  सगुण और निर्गुण में विभाजित कर दिया । अब निर्गुण ब्रह्म दर्शन के क्षेत्र में आ गया और सगुण ब्रह्म धर्म का विषय हो गया । तब से लोगों ने निर्गुण ब्रह्म को भुला दिया । मन की संतुष्टि के लिए कह देते हैं कि दोनों में कोई अंतर नहीं । वैदिक दर्शन के अनुसार ब्रह्म ही सर्वोच्च शक्ति है यानी  ऊर्जा ही सर्वोच्च शक्ति है ......!



-महेन्द्र वर्मा

पांच सुरों का सौंदर्य





ज्योति कलश छलके,
हुए गुलाबी लाल सुनहरे
रंग दल बादल के.....

यह एक पुरानी फ़िल्म का गीत है । यह गीत आपको आज भी अच्छा लगता होगा। इस गीत की कई ख़ूबियों में से एक यह है कि इस गीत की धुन केवल पांच सुरों के मेल से बनी है । इस गीत के कर्णप्रिय होने का एक कारण यही पांच सुर हैं । हम जो गाने सुनते, गाते या बजाते हैं उनमें छह और सात सुरों का उपयोग सामान्य है । कुछ गीतों में तो सभी बारह सुर लगाए गए हैं । संगीत के जानकारों का कहना है कि पांच से कम सुरों से कोई राग नहीं बन सकता । किसी गीत को गाने के लिए कम से कम पांच सुरों की आवश्यकता तो होगी ही ।

पांच सुरों से सजा केवल ‘ज्योति कलश छलके’ ही नहीं है, हज़ारों गीत हैं । ‘पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में’, ‘जाने कहां गए वो दिन’, ‘नीले गगन के तले धरती का प्यार पले’, ‘तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है’, ‘कोई सागर दिल को बहलाता नहीं’ आदि फ़िल्मी गीतों के अलावा अनेक गैरफिल्मी गीत, ग़ज़ल, भजन आदि भी हैं । लोक गीत भी हैं, शास्त्रीय और उपशास्त्रीय गायन पांच सुरों वाले रागों में भी होता ही है । केवल हमारे देश में ही नहीं बल्कि दुनिया के हर क्षेत्र में पांच सुर वाले गीत-संगीत  लोकप्रिय हैं । इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि छह या सात सुर वाले गीत-संगीत कम लोकप्रिय हैं । संगीत प्रिय ही होता है, चाहे लोक का हो या शास्त्र का ।

पांच सुरों वाले गीतों की कर्णप्रियता प्राकृतिक और आदिम है । इस बात को पचास हज़ार वर्ष हो गए जब मनुष्य ने नैसर्गिक रूप से गुनगुनाना सीख लिया था या कहें, विकसित कर लिया था। मां जब अपने शिशु को सुला रही होती है तो वह सहसा गुनगुनाने भी लगती है । यह गुनगुनाना वही आदिम गुनगुनाना है । वही भावना और वही स्वर। इस गुनगुनाने में स्वाभाविक रूप से तीन, चार या अधिकतम पांच सुरों का प्रयोग होता है। बच्चों के खेल गीतों में भी प्रायः तीन से पांच सुरों का प्रयोग होता है ।

अतीत के गीत-संगीत में पांच सुरों के प्रयोग का एक पुरातात्विक प्रमाण भी मिला है । दक्षिण जर्मनी की पहाड़ियों की एक गुफा में एक बांसुरी जैसा वाद्ययंत्र मिला है । यह किसी पक्षी की हड्डी से बना है । इसमें चार छेद हैं जो यह दर्शाते हैं कि इससे पांच स्वर उत्पन्न किए जाते थे । पुरातत्वविदों ने इसे चालीस-पचास हज़ार साल पुराना माना है । पांच सौ ई.पू. के तमिल संगम साहित्य में पांच सुरों के समूह ‘पन्’ का उल्लेख है । पांच सुर वाले रागों की परंपरा यहीं से प्रारंभ हुई ।

प्राचीन गीतों में सात सुरों में से शुरू के लगातार तीन, चार या पांच सुरों की प्रधानता होती थी । बाद के विकास क्रम में जब मनुष्य में सुरों का सौंदर्यबोध थोड़ा और विकसित हुआ तो उसने अनुभव किया कि नैसर्गिक सात सुरों में से बीच के दो सुरों (जैसे ग और नि) को छोड़ दें तो केवल पांच सुरों के गाने में कहीं अधिक मधुरता होती है। विश्व के अनेक भागों में आज भी पांच सुरों वाला गीत-संगीत उनकी संस्कृति की पहचान है । अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, यूरोप और एशिया के अनेक देशों में पांच सुर वाले गीत लोकप्रिय हैं । चीन और जापान के संगीत विधान में तो पांच सुरों की ही प्रधानता है । हिंदी फ़िल्म ‘लव इन टोकियो’ के गीत ‘सायोनारा सायोनारा’ को जापानी संगीत में ढालने की कोशिश की गई है।

भारत के अनेक राज्यों के लोकगीतों में पांच सुर मिलते हैं । हिमाचल और उत्तरांचल के पारंपरिक लोकगीतों में पांच सुरों की मधुरता स्पष्ट झलकती है । शास्त्रीय राग दुर्गा का विकास यहीं के लोकगीत से हुआ है । गुजरात का गरबा गीत भी पांच सुरों का है । ‘पंखिड़ा ओ पंखिड़ा’ आपने ज़रूर सुना होगा । असम के बिहू नृत्य के साथ गाए जाने वाले गीत भी पांच सुरों से सजे होते हैं।

भारतीय शास्त्रीय संगीत में पांच सुर वाले 30 से अधिक राग हैं । हिंदी फिल्मों के अनेक गीत इन्हीं रागों पर आधारित हैं । कुछ उदाहरण देखिए- ‘चंदा है तू मेरा सूरज है तू’, ‘जा तोसे नहीं बोलूं कन्हैया’, ‘मन तड़पत हरि दरसन को आज’, ‘आ लैट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं’, ‘बहारों फूल बरसाओ’, ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’, ‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए’, ‘मेरे नैना सावन भादों’ आदि ।

इन गीतों की मधुरता के कई कारणों में एक यह है कि इनके सभी पांच सुर परस्पर सुसंगत होते हैं। दो सुर अनुपस्थित होने के कारण जो ‘गेप’ बनता है वह गीत में विशेष प्रभाव उत्पन्न करता है । लेकिन ये सुर सभी गीतों में एक जैसे नहीं हैं । कुल बारह सुरों में से कोई पांच ऐसे सुर चुने जाते हैं जो सुनने में रंजक लगे । एक शोध का निष्कर्ष है कि इन से जो राग बने हैं उनको सुनने से मस्तिष्क को शांत और प्रसन्न रखने वाले रसायन ‘डोपामाइन’ के स्तर में वृद्धि होती है ।

-महेन्द्र वर्मा

सप्ताह के दिनों का नामकरण - कब, कहां, कैसे ?



समय की गणना के लिए सप्ताह एकमात्र ऐसी इकाई है जो किसी प्राकृतिक घटना पर आधारित नहीं है । समय की अन्य सभी इकाइयां जैसे, वर्ष, महीना, दिन, घटी, घंटा, किसी न किसी प्राकृतिक घटना से संबंद्ध हैं । चंद्रमा की घटती-बढ़ती कलाओं के आधार पर दिनों की गणना की प्रक्रिया आदिम लोगों ने प्रारंभ की थी, किसी गणितज्ञ या वैज्ञानिक ने नहीं । दुनिया के अनेक क्षेत्रों में इन 15 दिनों के क्रमसूचक नामों का उपयोग आज भी होता है जैसे, भारत में पूर्णिमा या अमावस्या के बाद प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया और ग्रामीण इलाकों में परिवां, दूज, तीज आदि । तिथियों से दिनों को जानने की परंपरा 50 हज़ार वर्ष पुरानी है । आज दुनिया भर में सप्ताह और इस के सात दिनों के नाम चलन में हैं । ये नाम फलित ज्योतिष में प्रचलित ग्रहों के नामों पर आधारित है। दिनों के नामकरण की प्रक्रिया अतीत में 2000 वर्षों तक क्रमशः विकसित होती रही ।

सप्ताह की अवधारणा की शुरुआत कब और कहां हुई इस का परीक्षण पहले भारत से ही प्रारंभ करते हैं । हमारे देश के सबसे प्राचीन लिखित साहित्य वेदों (रचना काल 2500 ई.पू.) से लेकर महाभारत (रचना काल 500 ई.पू.) तक के विशाल साहित्य में दिनों के नामों का कहीं उल्लेख नहीं है । लगध रचित ऋग्वेदीय वेदांग ज्योतिष में तो सूर्य और चंद्र के अतिरिक्त किसी अन्य ग्रह का नाम तक नहीं है ।

अथर्ववेदीय वेदांग ज्योतिष (500 ई.पू.) के एक श्लोक में दिनों के स्वामी के रूप में ग्रहों के नामों का उल्लेख है । इसके अतिरिक्त सप्ताह या दिनों के संबंध में और कोई विवरण नहीं है । चौथी शती में रचित याज्ञवल्क्य स्मृति में फलित ज्योतिष के नौ ग्रहों के नाम हैं । इस श्लोक में विशेष बात यह है कि प्रथम सात ग्रहों के नाम उसी क्रम में हैं जिस क्रम में दिनों के नाम आज प्रचलित हैं । प्रसिद्ध गणितज्ञ आर्यभट ने अपनी पुस्तक आर्यभटीयम् (5वीं शती) में ‘होरा’ के स्वामी ग्रहों का उल्लेख किया है किंतु यह नहीं लिखा है कि यही दिनों के नाम भी हैं । आगे चर्चा करेंगे कि ‘होरा के स्वामी’ से किसी दिन के नाम का निर्धारण कैसे होता है ।

किसी दिवस या दिन के नाम का सर्वप्रथम उल्लेख पांचवी शती के एक शिलालेख में अंकित है । मध्यप्रदेश के सतना ज़िले में एरण एक पुरातात्विक स्थल है । यहां एक पाषाण स्तंभ के लेख में तिथि के साथ ‘सुरगुरुर्दिवसे’ अंकित है जिसका स्पष्ट अर्थ है- गुरुवार के दिन । प्रसिद्ध गणितज्ञ वराहमिहिर (6वीं शती) लिखित पंचसिद्धांतिका के पहले अध्याय में एक श्लोक में सोमदिवस अर्थात सोमवार का उल्लेख है ।

उक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि ई.सन् की चौथी-पांचवीं शती के पहले तक भारत में सप्ताह और  उसके दिनों के नाम प्रचलित नहीं थे। पांचवी शती के बाद दिनों के नाम ग्रंथों में मिलने शुरू होते हैं लेकिन हमारे किसी भी प्राचीन ग्रंथ में इस बात का कोई विवरण नहीं मिलता कि सप्ताह की शुरुआत कब और कैसे हुई और दिनों के नाम ग्रहों के नाम पर क्यों रखे गए हैं । ‘भारतीय ज्योतिष’ के विद्वान लेखक शंकर बालकृष्ण दीक्षित ने लिखा है- ‘‘वारों की उत्पत्ति हमारे देश में नहीं हुई है क्योंकि उनकी उत्पत्ति का संबंध ‘होरा’ नामक अवधारणा से है जो हमारे देश का नहीं है ।’’

‘होरा’ शब्द मूलतः लैटिन horae और ग्रीक ώρα ओरा है जिसका अर्थ है- एक निश्चित समयावधि । दिन-रात के समय को छोटी इकाइयों में विभाजित करने का प्रयास सब से पहले इज़िप्त में 2400 ई.पूर्व हुआ था लेकिन इसकी जड़ें बेबीलोन, खाल्दिया और सुमेर से जुड़ी हुई थीं। यहां के खगोल विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों ने धूप घड़ी की सहायता से सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को दस भागों में विभाजित किया । सुबह-शाम के उजाले की अवधि को मिला कर बारह भाग बनाए । रात की अवधि को कुछ विशेष तारा-समूहों के आधार पर बारह विभाग किए । इस प्रकार दिन-रात की अवधि को चौबीस भागों में विभाजित किया । तब ये विभाग समान नहीं थे । बाद में जल घड़ी के द्वारा चौबीस भागों को समान किया गया । समय विभाजन की यह अवधारणा जब ग्रीस पहुंची तो वहां इसे ‘ओरा’ नाम दिया गया जो लैटिन में ‘होरा’ और अंग्रेज़ी में ‘आवर hour’ बना । होरा संस्कृत का शब्द नहीं है । वराहमिहिर जानते थे कि होरा ग्रीक शब्द है, फिर भी उन्होंने ‘वृहद् जातक’ (1.3) में लिखा कि संस्कृत के अहोरात्र शब्द से अ और त्र को विलोपित कर देने से होरा शब्द बना । लेकिन उन्होंने अपने एक और ग्रंथ ‘वृहद् संहिता’ (2.14) में ग्रीक ज्योतिषियों की प्रशंसा करते हुए उन्हें ऋषितुल्य पूज्य माना है । भारत में वेदांग ज्योतिष काल से दिन-रात की अवधि का विभाजन 60 घटी या नाड़ी ही प्रचलित है । आज भी पंचांगों में घटी-पल में समय को दर्शाया जाता है । घंटा, मिनट और सेकंड का प्रचलन तो 17 वीं शताब्दी के अंत में अंग्रेज़ों के शासनकाल में शुरू हुआ ।

महीने को कुछ दिनों के समूहों में बांटने की परंपरा भी मेसोपोटामियाई सभ्यता के बेबीलोन और खाल्दिया से आरंभ होती है । खाल्दियनों ने लगभग 2500 ई.पू. आकाश में आसानी से पहचाने जा सकने वाले 5 ग्रहों और सूर्य-चंद्रमा का एक विशेष क्रम निर्धारित किया था । सूर्य से दूरी के आधार पर इन आकाशीय पिंडों, जिसे उस समय के ज्यातिषियों ने ग्रह कहा,  का क्रम इस प्रकार है- शनि, बृहस्पति, मंगल, चंद्र, शुक्र, बुध और सूर्य। यहां दिए गए ग्रहों के नाम ग्रीक नामों के संस्कृत शब्दार्थ हैं । खाल्दियनों ने इन पिंडों को पृथ्वी से आभासित होने वाली इनकी गतियों के आधार पर आरोही क्रम में इस प्रकार रखा- शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चंद्रमा। उनकी मान्यता थी कि दिन-रात के 24 होरा भागों में प्रत्येक ग्रह का ‘शासन’ होता है । तदनुसार प्रत्येक होरा के लिए उपरोक्त क्रम से एक-एक ग्रह शासक बनाए गए । फिर यह तय किया गया कि सूर्योदय के समय जिस ग्रह की होरा होगी उसी ग्रह के नाम पर पूरे दिन का नाम होगा ।

पहली बार जब यह नियम लागू हुआ तो उस दिन सूर्योदय के समय की होरा को सूर्य द्वारा शासित ‘मान लिया गया’ क्योंकि सूर्य सबसे बड़ा और सर्वाधिक पूज्य ‘ग्रह’ था । 24 होरों के साथ सूर्य से प्रारंभ कर क्रमशः एक-एक ग्रह रखे जाएं तो पच्चीसवां ग्रह चंद्रमा होगा जो अगले दिन सूर्योदय के समय के होरा का शासक या स्वामी होगा और इसलिए उस पूरे दिन का नाम भी । यही क्रम निरंतर रखे जाने पर दिनों के नामों का अग्रलिखित क्रम बनता है- सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि । यही 7 दिनों का समूह या सप्ताह बना । इसके समकालीन प्राचीन सभ्यताओं- मिस्र में 10, ग्रीक और रोमनों में 8  दिनों का समूह प्रचलित था । ग्रीक शासकों ने सबसे पहले इस पद्धति को अपनाया ।

अब इस बात की चर्चा कर लें कि यह पद्धति भारत में कब और कैसे आई । 326 ई.पू. ग्रीक के शासक अलेक्ज़ेन्डर ने भारत पर आक्रमण किया । इसी के बाद से भारत और ग्रीक में ज्ञान-विज्ञान का आदान-प्रदान प्रारंभ हुआ जिसमें ज्योतिषीय ज्ञान भी था । ई की दूसरी शती में उज्जयनी में स्फुजिध्वज नामक राज्याधिकारी ने यवनजातक नामक ग्रंथ संस्कृत में लिखा था । ग्रीस को संस्कृत में यूनान और वहां से संबंधित बातों और निवासियों को यवन कहते हैं । इस यवनजातक ग्रंथ के एक श्लोक (77.9) का अनुवाद यह है- ‘‘यवन ज्योतिषियों ने सप्ताह के विभिन्न दिनों में लोगों के करने लायक जो-जो कार्य बताए हैं उन्हें प्रत्येक होरा के लिए भी लागू मानना चाहिए ।’’ इसी ग्रंथ के साथ भारत में सप्ताह, दिनों के नाम और होरा का प्रवेश हुआ । अगले 2-3 शताब्दियों के बाद दिनों के नाम के साथ अनेक काल्पनिक बातें लेखकों ने लिखनी शुरू कर दीं जिन्हें आज लोग भ्रमवश वैदिक और धार्मिक मान लेते हैं ।

एक बात और-यदि बेबीलोनवासी होरा से दिनों का नामकरण 1-2 दिन पहले या बाद में शुरू किए होते तो आज के दिन का नाम वह नहीं होता जो आज है !

-महेन्द्र वर्मा

ददरिया में विविध ताल-शैलियों का प्रयोग



छत्तीसगढ़ में आज से 40-50 साल पहले तक ददरिया गीत अपने मौलिक स्वरूप में विद्यमान था । इस मौलिक रूप की कुछ विशेषताएं थीं- खेतों में काम करने वाले श्रमिक इसे गाया करते थे । इस गीत के साथ किसी वाद्य-यंत्र का प्रयोग नहीं होता था । दो अवसरों पर यह गीत अधिक सुनाई देता था- जब श्रमिक जेठ के महीने में रात के समय गाड़ा हांकते हुए धान के खेतों में देशी खाद डालने जाते थे । ये तार सप्तक में बहुत ऊंचे सुर में गाते थे । धान के खेतों में रोपा लगाते समय या निंदाई करते समय ददरिया समूह गीत के रूप में गाया जाता था । नाचा की प्रस्तुति में भी प्रसंगवश ददरिया की दो-चार पंक्तियां गाई जाती थीं ।


ददरिया में भले ही वाद्य यंत्रों का उपयोग नहीं होता था लेकिन उसमें सुर और ताल अवश्य होता था । इसकी लय विलंबित होती थी । गाते समय किसी सुर में देर तक ठहराव बार-बार होता था । पुराने समय के ददरिया का एक आदर्श उदाहरण मुझे इंटरनेट में मिला । भारती भाषाओं का सर्वेक्षण करने वाले प्रसिद्ध विद्वान जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन के सहयोगियों ने सन् 1917 ई. में रायपुर के बृजलाल यादव के स्वर में एक ददरिया रिकार्ड किया था । 102 साल पुरानी यह प्रस्तुति निस्संदेह मौलिक ददरिया गायन का श्रेष्ठ उदाहरण है । इसमें ददरिया के चार पद हैं जो आज भी गाए जाते हैं । एक पद यह है-

नइ दिखय रूख राई, नइ दिखय गांव,
नइ दिखय लेवइया, काकर संग जांव ।



गाते समय संगी, रे, दोस, जंवारा, लिए जा और रंगरेली- इन अतिरिक्त शब्दों का प्रयोग हुआ है जो ददरिया की एक और मौलिक विशेषता है ।


ददरिया के उक्त उदाहरण में जो सुर प्रयोग में लाए गए हैं वे एक ही सप्तक के भीतर हैं । इसमें राग पीलू की झलक मिलती है । इसके साथ कोई भी वाद्य-यंत्र प्रयुक्त नहीं हुआ है इसलिए गीत किस ताल में है यह तत्काल नहीं पहचाना जा सकता । गीत की लय को ध्यान से सुनने और स्वरों पर बलाघात को गिनने से पता चलता है कि यह कहरवा ताल में गाया गया है । ददरिया नाम के कारण प्रायः यह समझा जाता है कि इसमें दादरा ताल का प्रयाग होता है । लेकिन ऐसा नहीं है, ददरिया में कहरवा का भी प्रयोग होता है । ताल की चर्चा इसलिए क्योंकि ददरिया के लोक-शैली के तालों में जो विशेषता है वह कहीं और नहीं है । तालों के मध्यलय और दु्रत में वादन की शैली मोहक है ।


1965 में निर्मित पहली छत्तीसगढ़ी फ़िल्म ‘कहि देबे संदेश’ में एक ददरिया गीत है । इसमें गाने के दौरान किसी ताल-वाद्य का प्रयोग नहीं किया गया है। 1971 में  दूसरी छत्तीसगढ़ी फ़िल्म ‘घर द्वार’ में एक ददरिया है- ‘गोंदा फुलगे मोरे राजा ’, इस गीत में कहरवा ताल प्रयुक्त हुआ है । लेकिन इन दोनों गीतों में छत्तीसगढ़ की लोक-अनुभूति अनुपस्थित है । 1971 के आसपास ही आकाशवाणी रायपुर में स्व. शेख हुसैन के ददरिया गीतों की रिकार्डिंग की गई । इनके गाए हुए सभी ददरिया गीत 6 मात्रा के दादरा ताल में है। अपने समय के ये मशहूर गीत थे ।


इसके बाद प्रसिद्ध लोक कलामंच ‘चंदैनी गोंदा’ ने तो ददरिया को खेतों से आमंत्रित कर मंच पर स्थापित कर दिया । स्व. खुमान साव द्वारा संगीतबद्ध किए गए इसके ददरिया गीतों में लय-सुर-ताल का बिल्कुल नया किंतु कर्णप्रिय समन्वय हुआ । पहली बार छत्तीसगढ़ी लोक-तालों का सुंदर प्रयोग उनके गीतों में सुनाई देता है । प्रसिद्ध ददरिया ‘मंगनी म मांगे मया नइ मिले’ इसी तरह का एक नया प्रयोग था जो अत्यंत लोकप्रिय हुआ । इस गीत में द्रुत कहरवा की एक विशिष्ट लोकशैली का प्रयोग किया गया है जिसे प्रायः देवार कलाकार मांदर में बजाते हैं ।


 ‘चंदैनी गोंदा’ का एक और ददरिया गीत उल्लेखनीय है ।किस्मत बाई देवार की खनकती आवाज़ ने ‘चौंरा म गोंदा रसिया मोर बारी म पताल’ जैसे पारंपरिक ददरिया के एक बहुत कम सुने गए रूप को छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधि गीत बना दिया । इस गीत में प्रयुक्त ताल 16 मात्रा का है जिसे देवार कलाकारों के द्वारा मांदर पर बजाया जाता है । इसे तीनताल की लोकशैली कहा जा सकता है । इस गीत में 8 और 16 मात्रा के 3 अलग-अलग ‘बाज’ का प्रयोग किया गया है । इस ददरिया में राग भैरवी की झलक दिखती है । लक्ष्मण मस्तुरिहा का एक ददरिया गीत ‘बखरी के तूमा नार बरोबर मन झुमे रे’ बहुत लोकप्रिय हुआ था । इस गीत में जिस ताल का प्रयोग किया गया है वह छत्तीसगढ़ के बजगरी समुदाय के द्वारा बजाया जाने वाला 12 मात्रा का एकताल है । गाने के मध्य की धुन में सामान्य दादरा ताल का प्रयोग हुआ है ।


‘सोनहा बिहान’ के कलाकारों, ममता चंद्राकर और मिथिलेश साहू के ददरिया गीत ‘चिरइया ला के गोंटी मारंव’ में 12 मात्रा के देवार शैली के मंदरहा ताल के साथ मध्य के इंटरल्यूड में मध्यद्रुत एकताल की लोक शैली का सुंदर प्रयोग किया गया है । स्व. केदार यादव ने लोकप्रिय ददरिया गीत ‘मोर झूल तरी गेंदा इंजन गाड़ी’ में 12 मात्रा के बजगरी शैली के ताल का प्रयोग किया है । 6 मात्रा वाले दादरा ताल के गीत द्रुत एकताल के साथ गाए जा सकते हैं । केदार यादव स्वयं गाते हुए इस ताल को ख़ूबसूरती से बजाते थे । ममता चंद्राकर द्वारा गाया ददरिया ‘तोर मन कइसे लागे राजा’ बिल्कुल अलग तरह की मौलिक रचना है । इसमें सीमित और पारंपरिक वाद्यों का उपयोग किया गया है । ताल-वाद्य के रूप में डफली का कहरवा ताल में सुंदर प्रयोग इस गीत को विशिष्ट बना देता है ।


ददरिया गीतों की ये ताल-शैलियां बाद के लोक गायकों के लिए प्रेरणादायी बनीं और अब अक्सर इन्हीं लोक-तालों में वर्षों तक ददरिया गीत गाए-बजाए जाते रहे। इन गीतों में पारंपरिक ताल-वाद्यो जैसे, ढोलक, मांदर, तबला, डफली, दफड़ा और निसान तक का उपयोग किया गया है । लेकिन अंत में एक और ददरिया की बात कर ही लें । फ़िल्म दिल्ली 6 में ए. आर. रहमान ने  एक पारंपरिक ददरिया गीत में 4 मात्रा के पश्चिमी ताल का प्रयोग किया है जो आजकल की भाषा में फ़्यूज़न ही कहा जाएगा। आजकल के छत्तीसगढ़ी वीडियो एल्बमों और फ़िल्मों में पारंपरिक वाद्यों के स्थान पर इलेक्ट्र्रानिक ताल-वाद्यों के प्रयोग के कारण ददरिया गीतों की गमक लुप्त होती जा रही है । ऐसे प्रयोगों में छत्तीसगढ़ की माटी की सुगंध नहीं आती।

-महेन्द्र वर्मा
                              
                    


प्राचीन उन्नत सभ्यताओं का ऐसा पतन !



विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में सिंधु घाटी, मिस्र, मेसोपोटामिया, बेबीलोन, यूनान और सुमेर की सभ्यताएं सबसे अधिक विकसित थीं । 3-4 हज़ार ईस्वी पूर्व में ये सभ्यताएं ज्ञान-विज्ञान, संस्कृति, कला, साहित्य दर्शन और गणित के क्षेत्र में शिखर पर थीं। भारत में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य आदि जैसे गणितज्ञ और कपिल, जैमिनी, व्यास, कणाद, पतंजलि और  गौतम जैसे महान दार्शनिक हुए । यूनान और अरब में यूक्लिड, पाइथोगोरस, उमर खय्याम, अल ख़्वारिज़्मी आदि जैसे गणितज्ञ और सुकरात, अरस्तू, अल ग़ज़ाली, अल मआरी जैसे अनेक दार्शनिक हुए । इन्हीं स्थानों के विद्वानों ने सर्वप्रथम यह प्रदर्शित किया कि मनुष्य एक बौद्धिक प्राणी है । ये सभी स्थान दक्षिण-मध्य एशिया और मध्य-पूर्व में स्थित हैं । लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता है कि ये स्थान बौद्धिकता के तिरस्कार के केन्द्र बन गए हैं । ऐसा कहने का कुछ आधार है ।

पिछले 118 वर्षों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व भर के विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों को नोबल पुरस्कार दिए जाते रहे हैं । इन पुरस्कारों को बौद्धिकता और विद्वता का मापक माना जा सकता है । अब तक के नोबल पुरस्कार विजेताओं की सूची पर ध्यान  दें तो एक चौंकाने वाला परिणाम सामने आता है । दुनिया के जो स्थान 3-4 हज़ार वर्ष पूर्व विद्वानों के गढ़ थे उन स्थानों से नोबल विजेताओं की संख्या उंगलियों में गिने जाने लायक हैं । जबकि दुनिया के उन स्थानों से जहां की प्राचीन सभ्यता का कोई इतिहास नहीं है, अब तक सैकड़ों विद्वान नोबल पुरस्कार पा चुके हैं ।

इसका कारण क्या हो सकता है ? एक बात तो तय है कि जहां अशिक्षा होगी वहां बौद्धिकता और विद्वता का कोई मूल्य नहीं होगा । अशिक्षा का एक और उपउत्पाद है- धार्मिक अनुदारता। इन कथनों को ये आंकड़े सिद्ध करते हैं-

पिछले 118 वर्षों में कुल 935 नोबल पुरस्कार दिए गए हैं, जिनमें सामान्यतया दुनिया के हर प्रमुख धर्म और  संप्रदाय के विद्वान हैं । मुस्लिम धर्म को मानने वालों की संख्या विश्व में दूसरे क्रम में सबसे अधिक है, लगभग 1 अरब 80 करोड़, उस समुदाय के केवल 12 विद्वानों को यह पुरस्कार मिला है । इन 12 पुरस्कारों में भी 7 केवल शांति के लिए है, साहित्य के लिए 2 और विज्ञान के लिए केवल 3 ।

तीसरा सबसे बड़ा धर्म हिंदू है जिसे मानने वालों की संख्या 1 अरब 10 करोड़ है । अब तक इस समुदाय के केवल 7 विद्वानों को ही नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ है । शांति के लिए 1, साहित्य के लिए 1, अर्थशास्त्र के लिए 1 और विज्ञान के लिए 4 । विज्ञान के लिए जिन 4 विद्वानों को यह पुरस्कार मिला है उनमें से 3 विदेशी नागरिकता ले चुके थे ।

विश्व का पहले क्रम का सबसे बड़ा धर्म इसाई धर्म है । इसके अनुयायियों की संख्या लगभग 2 अरब 40 करोड़ है । इस समूह के विद्वान अब तक दिए गए 935 नोबल पुरस्कारों में से कुल 654 पुरस्कार जीत चुके हैं । विश्व में इनकी जनसंख्या केवल 30 प्रतिशत है लेकिन 70 प्रतिशत नोबल पुरस्कार इन्होंने ही प्राप्त किया है ।

इससे भी आश्चर्यजनक एक और तथ्य है । दुनिया में यहूदी धर्म के मानने वालों की संख्या मात्र 1 करोड़ 45 लाख है जो हमारे गोवा प्रदेश की जनसंख्या के बराबर है । किंतु इसके अनुयायियों ने अब तक कुल 198 नोबल पुरस्कार जीता है । यह कुल दिए गए पुरस्कार का 22 प्रतिशत है जबकि इनकी जनसंख्या विश्व की जनसंख्या का केवल 0.2 प्रतिशत है ।

उक्त आंकड़ों से कुछ निष्कर्ष निकलते हैं । जो समुदाय 118 वर्षां में भी अपनी जनसंख्या के अनुपात में नोबल पुरस्कार प्राप्त नहीं कर सके हैं वे ऐसे समुदाय हैं जो उच्च शिक्षा और शोधकार्यों में पीछे हैं और जो धार्मिक रूप से उदार नहीं हैं । पुरस्कार प्राप्त करने वाले समुदायों में ज्ञान-विज्ञान के प्रति आकर्षण है और वे धर्म के प्रति उदार दृष्टिकोण रखते हैं । इस संदर्भ में जापान एक अच्छा उदाहरण है ।
वहां धार्मिक पाखंड, धार्मिक कट्टरता, रूढ़िवादिता जैसी चीजों का कोई स्थान नहीं है । वे तार्किक ज्ञान पर विश्वास करते हैं । इसीलिए इस छोटे और कम जनसंख्या वाले देश ने अब तक कुल 25 नोबल पुरस्कार प्राप्त किए हैं ।

ऐसा नहीं है कि नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले व्यक्ति बिल्कुल भी धार्मिक नहीं होते । 90 प्रतिशत पुरस्कार विजेता किसी सर्वोच्च सत्ता पर विश्वास करते हैं लेकिन वे कट्टर धार्मिक नहीं हैं । उनका धर्म केवल मानवता है । वे सच्चे अर्थों में मानवतावादी होते हैं । वास्तव में उन्होंने जो कार्य किया है वह केवल अपने ही धर्म के लिए नहीं बल्कि समूची मानवता के लिए है ।

जहां से हमने बात शुरू की थी वहीं लौट जाएं । मध्य-पूर्व और दक्षिण-मध्य एशिया की वर्तमान स्थिति पर विचार कीजिए । इतिहास की वे महान बौद्धिक और तार्किक कही जाने वाली सभ्यताएं जिनके ज्ञान-विज्ञान ने बाकी दुनिया को राह दिखाई , आज इसीलिए पीछे हो गईं क्योंकि उनकी परवर्ती पीढ़ियों ने ज्ञान-विज्ञान और धर्म के मूल तत्वों की संकीर्ण व्याख्या की , अशिक्षा और धार्मिक अनुदारता को प्रश्रय दिया । इन्होंने ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे मानवतावादी मंत्रों को भुला दिया ।

-महेन्द्र वर्मा

परंपरागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान




आज से हज़ारों वर्ष पूर्व जब मनुष्य ने प्राकृतिक घटनाओं को समझना प्रारंभ किया तब उसके पास पर्याप्त ज्ञान नहीं था । इसलिए उसने अनुमान के आधार पर व्याख्या करने का प्रयास किया । जैसे, सूर्य और चंद्रग्रहण की घटना का कारण यह समझा गया कि इन्हें कोई राक्षस निगल लेता है । यह व्याख्या उनके लिए ‘ज्ञान’ बन गई । प्राचीन धर्म और दर्शन की शुरुआत इसी तरह से हुई और आज भी इन दोनों क्षेत्रों में अनुमान के आधार पर ज्ञान रचने की यही परंपरा जारी है ।


यदि धर्म और दर्शन द्वारा इस तरह संकलित ज्ञान सत्य और शाश्वत होता तो इनकी अनेक शाखाएं-उपशाखाएं नहीं होतीं । ये शाखाएं एक-दूसरे के द्वारा स्थापित ज्ञान को ग़लत सिद्ध करती रहती हैं ।


धर्म और दर्शन की एक और परंपरा है, ये अपनी बातों को स्पष्ट रूप से सरल भाषा में व्यक्त न कर काव्यात्मक भाषा में व्यक्त करते रहे हैं । जब भाषा और तर्क भी हार मानने लगे तब धर्म आस्था का विषय बन गया और उसे ‘अकथ’ कह कर तर्क से दूर रखा जाने लगा । लेकिन परंपरागत दर्शन में कविता की भाषा के समान अस्पष्ट और भावनात्मक तर्क सदैव दिए जाते रहे ।


बीसवीं सदी के जर्मन विचारक हैन्स राइख़ेन बाख़ ने परंपरागत धर्म और दर्शन की इस अस्पष्ट और काव्यात्मक भाषा की आलोचना की और कहा कि दर्शन के प्रश्नों का उत्तर विज्ञान की भाषा में ही दिए जाने चाहिए । 1930 ई. में उन्होंने ‘वैज्ञानिक दर्शन का उदय’ शीर्षक से एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उन्होंने परंपरागत दर्शन की समस्याओं का विश्लेषण करते हुए उनका आधुनिक विज्ञान की भाषा में तर्कसंगत उत्तर प्रस्तुत किया है ।

हैन्स राइख़ेन बाख़ (1891-1953)



हैन्स राइख़ेन बाख़ के उक्त पुस्तक से उद्धरित निम्नांकित विचार मनन करने योग्य हैं -
‘‘सृष्टि की कहानी एक मिथ्या व्याख्या है.....मनोवैज्ञानिक इच्छाओं की पूर्ति को व्याख्या नहीं कहा जा सकता.....परंपरागत  दार्शनिक अवैज्ञानिक भाषा इसलिए बोलता है क्योंकि वह उन प्रश्नों के उत्तर देने की कोशिश करता है जिनसे संबंधित ज्ञान उसके पास उपलब्ध ही नहीं होते....।’’


‘‘...विज्ञान के जिम्मे ऐसा सामाजिक कार्य आ गया है जिसकी पूर्ति पहले धर्म के द्वारा होती थी, वह काम था- अंतिम सुरक्षा प्रदान करने का । विज्ञान में विश्वास ने बड़े पैमाने पर ईश्वर में विश्वास का स्थान ले लिया है......विज्ञान नई संभावनाओं के द्वार खोलता है । संभव है, किसी दिन हमारा परिचय उन भावनाओं से करा दे जिनका हमने पहले कभी अनुभव ही नहीं किया....।’’

‘‘तर्क से संबंधित समस्याएं चित्रमय भाषा से हल नहीं होतीं बल्कि उनके लिए गणितीय व्याख्या जैसी शुद्धता की आवश्यकता होती है.....नया तर्क परंपरागत दर्शन से नहीं बल्कि गणित की धरती से उत्पन्न हुआ है ।’’

‘‘.....उस व्यक्ति को जो सत्य को चाहता है, जब निषेधात्मक रूप में सत्य उपस्थित हो तो निराश नहीं होना चाहिए ।..अप्राप्य की मांग करने की अपेक्षा निषेधात्मक सत्य को जानना श्रेयस्कर है ।’’


अपनी पुस्तक में राइख़ेन बाख़ ने परंपरागत दर्शन की भले ही आलोचना की हो लेकिन इसमें जहां भी वैज्ञानिक और गणितीय दृष्टिकोण लक्षित हुआ है उसकी प्रशंसा भी की है ।


विज्ञान प्रकृति के जितना निकट है, धर्म और दर्शन उससे उतनी ही दूर हैं । परंपरागत दर्शन और धर्म की मान्यताएं मनुष्य को कट्टरतावादी सोच की ओर उन्मुख करती हैं जबकि वैज्ञानिक दर्शन किसी मान्यता को अंतिम सत्य होने का दावा नहीं करता बल्कि उसका एक सत्य किसी और नए सत्य की शोध के लिए संभावनाओं का द्वार खोलता है ।

 
-महेन्द्र वर्मा