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सप्ताह के दिनों का नामकरण - कब, कहां, कैसे ?



समय की गणना के लिए केवल सप्ताह ही ऐसी इकाई है जो किसी प्राकृतिक घटना पर आधारित नहीं है। समय की अन्य सभी इकाइयाँ  जैसे, वर्ष, माह, दिन, घटी, घंटा, किसी न किसी प्राकृतिक घटना से संबन्धित हैं। चंद्रमा की घटती-बढती कलाओं के  आधार पर दिनों की गणना की प्रक्रिया आदिम लोगों ने शुरू की थी, किसी गणितज्ञ या वैज्ञानिक ने नहीं। विश्व के अनेक क्षेत्रों में 15 दिनों के क्रमसूचक नामों  का उपयोग आज भी होता है, जैसे, भारत में पूर्णिमा या अमावस्या  के बाद प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया और ग्रामीण क्षेत्रों में परिवां, दूज, तीज आदि। तिथियों से दिनों को देखने की परंपरा 50 हजार वर्ष पुरानी है। आज दुनिया भर में सप्ताह और इस के  सात दिनों के नाम चलन में हैं। ये  नाम फलित ज्योतिष में प्रचलित  ग्रहों  के नामों पर आधारित हैं । दिनों के नामकरण की प्रक्रिया अतीत में 2000 वर्षों से लेकर क्रमशः विकसित होती रही।

सप्ताह की अवधारणा की शुरुआत कब और कहाँ हुई इस का इतिहास जानना काफी रोचक है । हमारे देश के सबसे प्राचीन लिखित साहित्य वेदों (रचना काल 2500 ई. पू.) से लेकर महाभारत (रचना काल 500 ई. पू.) तक के विशाल साहित्य में दिनों के नामों  का कहीं उल्लेख नहीं है। लगध  रचित ऋग्वेदीय वेदांग ज्योतिष में तो सूर्य और चन्द्र के अतिरिक्त किसी अन्य ग्रह का नाम तक नहीं है।

अथर्ववेदीय वेदांग ज्योतिष (दूसरी शती ई.) के एक श्लोक में दिनों के स्वामी के रूप में आदित्य, सोम आदि का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त सप्ताह या दिनों के संबंध में और कोई विवरण नहीं है- 
आदित्य सोमो भौमश्च तथा बुधबृहस्पतो 
भार्गवः शनैश्चरैव एते सप्तदिनाधिपाः  ।
 
चतुर्थ शती में रचित याज्ञवल्क्य स्मृति में फलित ज्योतिष के नौ ग्रहों  के नाम हैं। इस श्लोक में विशेष बात यह है कि प्रथम सात ग्रहों  के नाम उसी क्रम में हैं जिस क्रम में दिनों के नाम आज प्रचलित हैं- 
सूर्यः सोमो महीपुत्रः सोमपुत्रो बृहस्पतिः
शुक्र: शनैश्चराेः राहु केतुश्चैते ग्रहा स्मृताः।

किसी दिवस या दिन के नाम का सर्वप्रथम उल्लेख दूसरी शती में लिखा गया काव्य ' गाथा सप्तशती ' के एक श्लोक 3:61 में मिलता है - 
सुखायन्ति चापशकुनांगारकवारान्य विशिष्टदिवसाश्च।
इस में अंगारकवार शब्द आया है जिस का अर्थ मंगलवार है । उक्त श्लोक में इसे अशुभ दिन कहा गया है । किंतु अन्य दिनों के नामों का कोई उल्लेख नहीं है ।

प्रसिद्ध गणितज्ञ आर्यभट्ट ने अपनी पुस्तक आर्यभटीयम् (5वीं शती) में 'होरा' के स्वामी ग्रहों  का उल्लेख किया है  किन्तु यह  नहीं लिखा है कि ये ही ग्रहों  के नाम भी हैं ।आगे  चर्चा करेंगे कि 'होरा के स्वामी' से किसी दिन के नाम का पता कैसे लगाया जाता है ।

किसी भी दिन या दिन के नाम का प्रथम उल्लेख पांचवी शती के एक शिलालेख  में अंकित है। मध्य प्रदेश के सतना  जिले में एरण नमक  एक पुरातात्विक  स्थल  है। यहां एक पाषाण स्तम्भ के लेख में तिथि  के साथ 'सुर गुरुर्दिवसे   ' अंकित है जिसका स्पष्ट अर्थ है- देवताओं के गुरु का दिन अर्गुथात गुरुवार का दिन। प्रसिद्ध गणितज्ञ वराहमिहिर (6वीं शती) लिखित पंचसिद्धांतिका के प्रथम अध्याय के एक श्लोक में सोमदिवस अर्थात सोमवार का उल्लेख है। शिवपुराण में उल्लेख है की दिनों के नामों की रचना भगवान  शिव ने की है किन्तु यह केवल कथात्मक उल्लेख है , तथ्यात्मक नहीं । शिवपुराण की रचना पांचवीं सदी मानी जाती है ।

उक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि ईसा मसीह की चौथी-पांचवीं शताब्दी तक भारत में सप्ताह  और उस के दिनों के  नाम जनसाधारण में  प्रचलित नहीं थे । पांचवी शती के बाद के ग्रंथों में दिनों के नाम  मिलते हैं । किन्तु हमारे किसी भी प्राचीन ग्रंथ में इस बात का कोई विवरण नहीं है कि सप्ताह की शुरुआत कब  और कैसे हुई और दिनों के नाम  ग्रहों  के नामों पर क्यों  रखे गए। 'भारतीय ज्योतिष' नमक पुस्तक के  विद्वान लेखक शंकर बालकृष्ण  दीक्षित  ने लिखा है- ''वारों की उत्पत्ति हमारे देश में नहीं हुई है क्योंकि उनकी उत्पत्ति का संबंध 'होरा' नामक सिद्धांत से है जो हमारे देश का नहीं है।''

'होरा' शब्द मूलतः लैटिन होरा और ग्रीक ώρα ओरा है जिसका अर्थ है- एक निश्चित समयपूर्णता। दिन-रात के समय को छोटी इकाइयों में  विभाजित करने का प्रयास सब से पहले 2400 ई.पूर्व में हुआ था लेकिन इसकी जड़ें बेबीलोन,  खल्दिया  और सुमेर से जुड़ी हुई थीं। यहां के खगोल विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों ने धूप घड़ी की सहायता से सूर्योदय से सूर्यास्त तक  के समय को दस घंटे में बांट दिया। सुबह-शाम के उजाले की अवधि को मिला कर बारह भाग बनाए गए । रात्रि की अवधि में कुछ विशेष तारा-समूहों की स्थिति  के  आधार पर बारह विभाग किए गए । इस प्रकार दिन-रात की अवधि को चौबीस  अलग-अलग भागों में बाँट दिया गया। तब ये विभाग समान नहीं थे। बाद में जल घड़ी के द्वारा विभागों को बराबर  किया गया।

 समय विभाजन की यह अवधारणा जब ग्रीस पहुंची  तो वहां इसे 'ओरा' नाम दिया गया जो लैटिन में 'होरा'  और अंग्रेजी में 'आवर' बना। होरा संस्कृत का शब्द नहीं है। प्रसिद्द भारतीय गणितज्ञ  वराहमिहिर को पता था कि होरा ग्रीक शब्द है, फिर भी उन्होंने 'वृहद जातक' (1.3) में लिखा है कि संस्कृत के अहोरात्र शब्द से अ और त्रि को विलोपित कर दिया गया जिस  से होरा शब्द बना। लेकिन उन्होंने अपने एक और ग्रंथ 'वृहद् संहिता' (2.14) में ग्रीक ज्योतिषियों की स्तुति में उन्हें ऋषितुल्य पूज्य माना है। ज्योतिष के विद्वानों का मानना है  कि वराहमिहिर ने ग्रीक ज्योतिष के कुछ बातों को ग्रहण किया था  । भारत में वेदांग ज्योतिष काल से दिन-रात की अवधि का विभाजन 24 भागों में नहीं बल्कि  60 भागों में किया गया है जिसे  घटी या घड़ी कहते हैं । आज भी पंचांगों में घाटी-पल में समय का उल्लेख  किया जाता है। घंटा, मिनट और सेकंड का प्रयोग  तो 17वीं सदी के अंत में ब्रिटेन के शासनकाल में शुरू हुआ।

महीने को कुछ दिनों के समूहों  अर्थात सप्ताहों  में  बांटने  की परंपरा भी  मेसोपोटामियाई सभ्यता के बेबीलोन और खालदिया से शुरू होती है। खालडियन्स ने लगभग 2500 ई.पू. आकाश में आसानी से पहचाने जा सकने वाले 5 ग्रहों  और सूर्य-चंद्रमा का एक विशेष क्रम निर्धारित किया गया था। सूर्य से दूरी के  आधार पर  इन आकाशीय पिंडों , जिसे उस  समय के ज्योतिषियों ने ग्रह कहा था, का क्रम इस प्रकार है- शनि, बृहस्पति, मंगल, चंद्र, शुक्र, बुध और सूर्य। यहां दिए गए ग्रहों  के नाम ग्रीक नामों  के संस्कृत शब्दार्थ हैं।  खाल्दियांस ने  इन पिंडों को पृथ्वी से आभासित होने वाली इनकी  गतियों के आधार पर आरोही क्रम में व्यवस्थित किया   - शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चंद्रमा। उनकी मान्यता थी कि दिन-रात के 24 होरा  के प्रत्येक होरा में किसी एक  ग्रह का 'शासन' होता है। प्रत्येक होरा के लिए उपरोक्त  क्रम से एक-एक ग्रह शासक निर्धरित किए गए  । फिर यह तय किया  गया कि सूर्योदय के समय जिस ग्रह की होरा होगी उसी ग्रह के नाम पर पूरे दिन का नाम होगा। 

पहली बार जब यह नियम लागू हुआ तो उस दिन सूर्योदय के समय की होरा को  सूर्य द्वारा शासित  'मान' लिया गया क्योंकि सूर्य सबसे बड़ा और परम पूज्य 'ग्रह' था। 24 होरों के साथ सूर्य से प्रारंभ कर के क्रमशः एक-एक ग्रह  रखे जाएँ तो 25वां ग्रह चंद्रमा होगा जो अगले दिन सूर्योदय के समय की  होरा का शासक या स्वामी होगा और इसलिए उस पूरे दिन का नाम  चंद्रवार  या सोमवार  होगा। यही क्रम  निरंतर  रखे जाने पर दिनों का  क्रम इस प्रकार बनता है- सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि। यही 7 दिन का समूह  या सप्ताह बना। इसके समकालीन प्राचीन सभ्यताओं- मिस्र में 10, ग्रीक और रोमनों में 8 दिनों का समूह प्रचलित था। यूनानी शासकों ने सबसे पहले इस पद्धति को अपनाया ।

अब इस बात पर चर्चा कर लें कि यह कार्यप्रणाली भारत में कब और कैसे आई। 326 ई.पू. में  ग्रीक के शासक अलेक्जेंडर ने भारत पर आक्रमण किया। इसी के बाद भारत और यूनान में ज्ञान-विज्ञान  के आदान-प्रदान   की   शुरुआत हुई जिसमें ज्योतिषीय ज्ञान भी था। ईसा  की दूसरी शती में उज्जयिनी में स्फुजिध्वज नामक राज्य के अधिकारियों ने यवनजातक नाम का ग्रंथ संस्कृत में लिखा था। ग्रीक को संस्कृत में यूनान और वहां से संबंधित लोगों  और क्षेत्र को यवन कहा जाता है। इस यवनजातक ग्रंथ के एक श्लोक (77.9) का अनुवाद है- ''यवन ज्योतिषियों ने सप्ताह के विभिन्न दिनों में लोगों के लिए जो-जो कार्य बताए हैं, उन्हें प्रत्येक होरा के लिए भी लागू करना चाहिए।'' इसी ग्रंथ के साथ ईसा की दूसरी सदी में भारत में सप्ताह, दिनों के नाम और होरा की अवधारणा का प्रवेश हुआ। आम लोगों में इस का प्रचलन होने में   2-3 शताब्दियां और लग गईं । 

एक बात और - यदि बेबीलोनवासी होरा से दिनों का नामकरण   1-2 दिन पहले या बाद में शुरू करते तो आज के दिन का नाम वह नहीं होता जो आज है !

-महेंद्र वर्मा