May 25, 2020

शिशु ने नामकरण किया मां-बाबा का



सभी जीवों के साथ-साथ मनुष्यों के जीवन के लिए हवा के बाद पानी दूसरा महत्वपूर्ण पदार्थ है । पानी के लिए दुनिया की विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग शब्द हैं, जैसे मलय भाषा में एइर, लैटिन में एक्वा, रूसी में वोदी, तुर्की में सु, अरबी में मान फ़ारसी में आब, अफ़्रीकी भाषा ज़ुलू में अमांन्जी, चीनी में शुइ आदि । इन समानार्थी शब्दों के ध्वनिरूप में कोई समानता नहीं दियाई देती । यह स्वाभाविक है कि किसी एक पदार्थ के लिए अलग-अलग भाषा में अलग-अलग शब्द होते ही हैं । लेकिन यह जानना बहुत रोचक है कि संसार की लगभग सभी भाषाओं और बोलियों में माता-पिता के लिए जो विभिन्न शब्द हैं उनकी ध्वनियों में आश्चर्यजनक रूप से समानता है ।


इन शब्दों के अध्ययन से भाषा के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का अनुमान लगाया जा सकता है। जैसे, मनुष्य ने भाषा की शुरुआत कैसे की होगी, वे कौन से शब्द हैं जो पहले-पहल बनाए गए, इन शब्दों के लिए प्रेरणा कहां से प्राप्त हुई होगी, बोलने के संदर्भ में किसी मनुष्य के लिए कौन-कौन सी ध्वनियां सबसे आसान हैं आदि । इस लेख में इन्हीं प्रश्नों के उत्तर तलाशने का प्रयास किया गया है । पहले हम विभिन्न भाषाओं में माता-पिता के लिए प्रयुक्त शब्दों पर विचार कर लें जिनमें कुछ खास वर्णों या ध्वनियों का प्रयोग हुआ है ।


दुनिया की कुछ भाषाओं में मां के लिए प्रचलित शब्दों के उदाहरण देखिए- अधिकांश भारतीय भाषाओं में मां को मां, अम्मा या अम्मी से संबोधित करते हैं । भोजपुरी और कोंकड़ी जैसी बहुत सी क्षेत्रीय भाषाओं में माई, इया, मइया, मराठी में आई, कुमाउंनी में इजा, डोगरी में म्ये, कश्मीरी में मम्ज, मणिपुरी में इमा, गुजराती में बा, पंजाबी में बेबे, उड़िया में बाउ, हल्बी और बहुत सी आदिवासी बोलियों में माय, छत्तीसगढ़ी में दाई, संस्कृत में मातृ आदि । यूरोप की भाषाएं भारोपीय समूह की भाषाएं हैं इसलिए इन में मां के समरूप शब्द संस्कृत मातृ से मिलते-जुलते हैं किंतु सभी नहीं । विदेशी भाषाओं में उदाहरण- अंग्रेज़ी में मदर, डच में मोएदेर, एस्टोनियाई में एमा, आयरिश में मताइर, पुर्तगाली में माय, अजरबैजानी में अना, हंगेरियाई में आन्या, तुर्की में अन्ने, अरबी में उम, तुर्कमेनी में इजे, वियतनामी में मे, हिब्रू में मु, स्वाहिली में मामा, योरूबा में इया, जुलू में उनिना, स्लोवाक में मात्का, फिनिश में माइती, चीनी में मु किन् आदि ।


मां के समरूप उपर्युक्त शब्दों में अधिकांश में पहला वर्ण म है, कुछ में मध्य या अंतिम वर्ण म है, कुछ के प्रारंभ, मध्य या अंत में स्वर वर्ण अ, इ, ए या उ है, कुछ में त, द या न भी है । कुछ शब्द इन्हीं ध्वनियों के मेल से बने हैं । म हिन्दी वर्णमाला में प वर्ग का अंतिम वर्ण है और त,द,न त वर्ग के वर्ण हैं । निष्कर्ष यह कि मां के लिए जो शब्द हैं उनमें प और त वर्ग के व्यंजन तथा लघु स्वरों की प्रधानता है । क्या ऐसा होने का कोई महत्वपूर्ण कारण है ? इसकी चर्चा कुछ देर बाद करेंगे, पहले पिता के लिए विभिन्न भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों पर विचार कर लें । कुछ उदाहरण देखिए-


अधिकांश भारतीय भाषाओं और बोलियों में पिता के लिए बाबा, बप्पा, बाबूजी, अब्बा, बापू, दद्दा, ददा आदि प्रचलित हैं जबकि दक्षिण भारतीय भाषाओं में अप्पा, अन्ना, अच्चन, तन्दी आदि । संस्कृत में पितृ, तात और वाप्ति भी पिता के समानार्थी हैं । भारोपीय समूह की भाषाओं में लैटिन के पतेर और उसके अन्य रूपों के अलावा संबोधन के लिए पापा शब्द प्रचलित है । फिलिपीनी में ताते, हंगेरियन में अपा, चेक में ताता, अफ्रीकी में बाबा, हिब्रू में अब्बाह्, इंडोनेशियाई में बापा, इटैलियन में बब्बू, ग्रीक में बब्बास् आदि जैसे शब्द संसार की प्रायः सभी भाषाओं में पिता के लिए प्रयुक्त होते हैं । इन में भी प, ब, त, द, न और अ वर्णों के अर्थात प और त वर्ग के वर्णों के अलावा अ स्वर के प्रयोग की अधिकता है ।


अब इस बात पर विचार करना है कि दुनिया भर में माता-पिता के लिए प्रयुक्त शब्दों में इतनी समानता क्यों है और वह भी कुछ खास वर्णों के साथ ! वास्तव में एक शिशु का जब जन्म होता है तो सबसे पहले वह रोता है । रोने की इस ध्वनि को किसी लिपि में लिखा तो नहीं जा सकता किंतु सुनने से यह समझ आता है कि उस ध्वनि का मूल स्वर नासिक्ययुक्त अ या आ है । कुछ महीने तक शिशु की यही ध्वनि उसके लिए संपूर्ण भाषा बनी रहती है । 5-6 महीने की आयु में शिशु अ की ध्वनि निकालते हुए शिशु जब दोनों होठों को बंद कर लेता है तब यह अम् की ध्वनि होती है । अम् बोलते हुए होंठों को फिर खोलता है तो अम्अअ की की ध्वनि निकलती है । इस दौरान यदि 2-3 बार होंठों को खोलता और बंद करता है तो अम्अम्अ जैसी ध्वनि सुनाई देती है । शिशु को ऐसा करने के लिए किसी ने नहीं सिखाया है, यह अनायास ही उसके मुंह से निकलता है । मां इस ध्वनि को अपने लिए अनायास ही संबोधन मान लेती है । कहा जा सकता है कि इस प्रकार नवजात शिशु ने अपनी जननी का नामकरण किया- मां, अम्मा, मामा आदि। इन्हीं के आधार पर बाद में बड़ों ने देश-काल के अनुसार और भी अनेक संज्ञाएं बनाई ।


एक वर्ष की आयु होते-होते शिशु के मुंह से स्वाभाविक रूप से दो ध्वनियां और निकलने लगती हैं- प और ब । ये दोनों ध्वनियां भी होठों के बंद होने और खुलने पर निकलती हैं । शिशु द्वारा बार-बार की जाने वाली ध्वनि बब्बब्बब् या पप्पप्पप् का संबंध उसके जनक के लिए बाबा और पापा जैसे शब्दों से है जो उनके लिए संज्ञाएं बनी और बाद में विस्तारित होकर अनेक रूपों में परिवर्तित हुई । भाषा शास्त्रियों का अनुमान है कि शिशु की इन ध्वनियों का शब्दविशेष में रूपांतरण की प्रक्रिया लगभ्ग एक लाख वर्ष पहले विकसित होनी शुरू हुई । शिशु द्वारा अनायास इन वर्णों को उच्चारित कर लेने के कारण इन्हें सरलतम वर्ण कहा जाता है ।


प वर्ग के वर्णों के बाद उच्चारण की दृष्टि से सरलता क्रम में त वर्ग के वर्ण हैं। इसीलिए माता-पिता के लिए बने शब्दों में यही ध्वनियां अधिक प्रयुक्त हुई हैं । बच्चे की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती है वैसे-वैसे उनकी उच्चारण क्षमता बढ़ने लगती है और वे प और त वर्ग की महाप्राण ध्वनियों फ, भ, थ, ध को भी बोलने लगते हैं । भारतीय भाषाओं में परिवार के अन्य सदस्यों के लिए बनी संज्ञाओं में भी यही सारे वर्ण अधिक मिलते हैं, भाई से लेकर फूफा तक और भांजी से लेकर नानी तक। बच्चों की ध्वनि ताता से प्रेरित हो कर संस्कृत का तात और हिंदी का चाचा जैसे शब्द बने ।

4-5 वर्ष के जो बच्चे कठिन वर्णों को उच्चारित नहीं कर पाते वे इन्हीं सरल वर्णों के सहारे तुतलाते हैं । अनुमान किया जा सकता है कि मनुष्य ने जब वाचिक भाषा की शुरुआत की होगी तब ये शब्द उन शब्दों में शामिल रहे होंगे जो पहले-पहल अस्तित्व में आए।



-महेन्द्र वर्मा

Apr 26, 2020

वह जो जानता था अनंत को



(श्रीनिवास रामानुजन् की सौवीं पुण्यतिथि पर विशेष)





प्रतिभा और योग्यता प्रायः विषम परिथितियों में ही विकसित होती हैं । रामानुजन् हजारों सूत्रों, सिद्धांतों और विवरणों एक ऐसा खजाना छोड़ गए हैं जो दुनिया के सबसे बड़े हीरे से भी ज्यादा मूल्यवान है ।’’ यह विचार अमेरिका के इमोरी विश्वविद्यालय के जापानी मूल के प्रोफेसर केन ओनो ने एक साक्षात्कार में  प्रसिद्ध भारतीय़ गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन् के संबंध में व्यक्त किया था । गणित की दुनिया में भारत का नाम प्रतिष्ठित करने वाले रामानुजन् की पारिवारिक पृष्ठभूमि हर प्रकार से साधारण थी किंतु उसकी जन्मजात गणितीय प्रतिभा विलक्षण थी । 

गणित के संदर्भ में वे स्वशिक्षित थे । जब वे 12 वर्ष के थे एस.एल.लोनी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘त्रिकोणमिति’ के अतिरिक्त उच्च गणित की कुछ और पुस्तकों को पढ़ कर उसके सारे प्रश्नों को हल कर लिया था और स्वयं नए गणितीय सूत्रों की रचना शुरू कर दी थी । वे स्लेट पर प्रश्न हल करते । स्लेट में लिखे हुए को बार-बार साफ करने के कारण उनकी कुहनी खुरदुरी और काली हो गई थी । गणितज्ञ कार की पुस्तक ‘सिनाप्सिस ऑफ प्योर मैथमेटिक्स’ ने रामानुजन् की शक्तियों को और सुदृढ़ किया जो उसे कुंभकोनम के महाविद्यालय से मिली थी ।

रामानुजन् की रुचि गणित के अलावा किसी अन्य विषय में नहीं थी । इसी कारण वे 12वीं की परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गए। फलस्वरूप उन्हें विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं मिला । वे चाहते थे कि उनके गणितीय कार्यों के आधार पर उन्हें कोई छोटी-सी नौकरी दिला दे । इसी उद्देश्य से रामानुजन् ने अपने सूत्रों को सबसे पहले 1910 में वी. रामास्वामी अय्यर को दिखाया जो ‘इंडियन मैथमेटिकल सोसायटी’ के संस्थापक थे । उसके बाद वे पी.वी. शेषु अय्यर, नेल्लोर के कलेक्टर दीवान बहादुर आर. रामचंद्र राव, मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के अध्यक्ष सर फ्रांसिस स्प्रिंग और मि. ग्रिफिथ, भारत की वेधशालाओं के निदेशक डॉ. जी.टी. वाकर आदि से मिले । इन्होंने रामानुजन् के कार्यों की सराहना की लेकिन उन्हें केवल क्लर्क की नौकरी ही मिल सकी। 1903 से 1914 के मध्य कैम्ब्रिज जाने से पहले तक दो रजिस्टरों के 400 पृष्ठों में वे अपने सूत्रों और सिद्धांतों के बारे में लिख चुके थे । उनका प्रथम शोध पत्र ‘जर्नल ऑफ इंडियन मैथमेटिकल सोसायटी’ में 1911 में प्रकाशित हुआ था । रामानुजन् को सुझाव दिया गया कि उन्हें इंग्लैंड जाना चाहिए क्योंकि उनके गणित को इंग्लैंड के गणितज्ञ ही महत्व दे सकते हैं ।


मित्रों के कहने पर रामानुजन् ने कैम्ब्रिज के प्रोफेसर जी.एच. हार्डी को पत्र लिखा । पहले दो पत्रों का कोई उत्तर नहीं मिला। 16 जनवरी, 1913 को लिखे गए तीसरे पत्र के बाद हार्डी ने रामानुजन् को कैम्ब्रिज आमंत्रित किया किंतु परिवार और बिरादरी वालों ने उनके समुद्र यात्रा करने पर आपत्ति व्यक्त की और जाति से बहिष्कृत करने की धमकी दी। 1914 में कैम्ब्रिज के गणित के प्राध्यापक ई.एच. नेबिल भारत आए । डॉ. हार्डी ने नेबिल को कह दिया था कि वे रामानुजन् से मिलें और उन्हें अपने साथ कैम्ब्रिज ले आएं । नेविल ने मद्रास वि.वि. के अधिकारियों को रामानुजन् को छात्रवृत्ति देने हेतु एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने लिखा था- ‘‘श्री रामानुजन् की प्रतिभा का संसार के समक्ष उद्घाटन गणित संसार में हम लोगों के समय की सर्वोकृष्ट घटना होगी । उनका नाम भी गणित के इतिहास में महान और सर्वश्रेष्ठ गणितज्ञों में लिखा जाएगा ।’’ तब वि.वि. ने रामानुजन् को वार्षिक छात्रवृत्ति स्वीकृत की । उसी राशि को लेकर 26 वर्षीय रामानुजन्  मि. नेविल के साथ 17 मार्च, 1914 को लंदन के लिए रवाना हुए ।

यहाँ से रामानुजन् के जीवन में एक नए युग का आरंभ हुआ और इसमें डॉ. हार्डी की बड़ी भूमिका थी । उनके गणितीय शोध से इंग्लैंड के गणितज्ञ बहुत प्रभावित हुए । वे 6 वर्ष वहाँ रहे । इस अवधि में रामानुजन् ने हार्डी के साथ मिलकर 21 शोधपत्र प्रकाशित किए । जी. एच. हार्डी ने लिखा  हैं- ‘‘यह अत्यंत विस्मयजनक प्रतीत होता है कि श्रीनिवास रामानुजन् ने इतनी छोटी अवस्था में इतने महत्वपूर्ण और कठिन प्रश्नों को सिद्ध कर दिया है । इन्हीं प्रश्नों को हल करने में यूरोप के बड़े से बड़े गणितज्ञों को सौ वर्ष से अधिक लग गए और उनमें से बहुत से तो आज भी हल नहीं किए जा सके हैं । मैं उनके जैसे किसी और गणितज्ञ से नहीं मिला हूं, रामानुजन् की तुलना केवल जैकोबी या आयलर से की जा सकती है ।’’

जून, 1914 में उनको कैम्ब्रिज में अध्ययन हेतु प्रवेश दिया गया था । 16 मार्च, 1916 को उनके द्वारा किए गए एक विशेष शोधकार्य के आधार पर उन्हें बी.ए. की उपाधि प्रदान की गई । 28 फरवरी, 1918 को ‘रायल सोसायटी’ के सदस्य नामित किए गए । रायल सोसायटी के पूरे इतिहास में  इतने कम उम्र का कोई सदस्य नहीं हुआ । इसके बाद 2 मई, 1918 को ट्रिनिटी कालेज का सदस्य बनने वाले वे पहले भारतीय बने । उन्हें 6 वर्षों के लिए 250 पाउंड वार्षिक की फेलोशिप राशि प्रदान की गई जिसका लाभ लेना उनके भाग्य में नहीं था । अस्वस्थ होने के कारण 27 मार्च, 1919 को वे भारत वापस आ गए । रामानुजन् के भारत लौटने पर प्रो. हार्डी ने कहा था- ‘‘रामानुजन् इतने महान और प्रतिष्ठित गणितज्ञ हो कर भारत लौटेंगे जितना आज तक कोई भारतीय नहीं हुआ । मुझे आशा है कि भारत इन्हें अपनी अमूल्य संपत्ति समझ कर इनका उचित सम्मान करेगा ।’’ उनके लिए मद्रास वि. वि. में प्राचार्य का विशेष पद सृजित किया गया किंतु अधिक समय तक इस पद पर कार्य नहीं कर सके । उनका रोग असाध्य हो चुका था । 26 अप्रेल, 1920 को लगभग 4 हजार गणितीय सूत्रों के रूप में अपनी बौद्धिक संपत्ति छोड़ कर अनंत को जानने वाला रामानुजन् स्वयं अनंत की ओर चले गए । प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ ने उनके निधन पर जो लेख प्रकाशित किया था, उस का यह अंश रामानुजन् के कार्यों की श्रेष्ठता को व्यक्त करता है- ‘‘इस समय से 20 वर्ष पश्चात जब रामानुजन् के कार्यों पर शोध कार्य पूरे हो जाएंगे तब उनका कार्य आज की अपेक्षा और अधिक महत्वपूर्ण और आश्चर्यजनक प्रतीत होगा ।’’

रामानुजन् का कार्य  क्षेत्र मूल रूप से शुद्ध गणित था । संख्या सिद्धांत और अनंत श्रेणियों पर उन्होंने अति महत्वपूर्ण और मौलिक सूत्र प्रस्तुत किए । उनके द्वारा संख्या 1729 के कुछ विशिष्ट गुण बताए जाने के कारण इसे ‘रामानुजन् संख्या’ कहा जाता है । रामानुजन् ने संख्या 139 का एक जादुई वर्ग बनाया जिसमें उनकी जन्म तिथि की संख्याएं 22,12,18 और 87 का प्रयोग किया गया था। उन्होंने जादुई वर्गों को हल करने का एक सूत्र भी बनाया ।


रामानुजन् के अधिकांश प्रमेय उच्च गणित से संबंधित हैं जो आज कम्प्यूटर विज्ञान, इंजीनियरिंग, भौतिकी और गणित के विविध क्षेत्रों में उपयोगी हैं । अमेरिका के इमोरी वि.वि. के प्रोफेसर केन ओनो कहते है- ‘‘ब्लैक होल संबंधी एक समस्या को हमने रामानुजन् के अंतिम दिनों के सूत्रों से ही हल किया जबकि 1920 में ब्लैक होल के बारे में वैज्ञानिकों को कोई जानकारी नहीं थी ।’’ प्रकृति के गुणों और रहस्यों को समझने में गणित की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । रामानुजन् के निधन के बाद से ही उनके कार्यों का गणितज्ञों द्वारा निरंतर विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है । उनके कुछ अनुमानों और कथनों ने अध्ययन के नए क्षेत्रों का सृजन किया है । दुनिया भर के गणितज्ञ और वैज्ञानिक 100 सालों के बाद भी उनके कार्यों पर शोध कर रहे हैं । गणितज्ञ फ्रीमैन डायसन ने ठीक ही कहा था- ‘‘रामानुजन् के उद्यान से जो बीज हवा में बिखरे हैं वे अब पूरी दुनिया में अंकुरित होने लगे हैं ।’’

उनके सभी प्रकाशित 21 शोध पत्रों का संग्रह 355 पृष्ठों के ग्रंथ के रूप में उनके निधन के 7 साल बाद 1927 में ‘द कलेक्टेड पेपर्स’ नाम से कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित हुआ । उन्होंने अपने जीवन काल में गणित के 3884 प्रमेयों का सृजन किया । 1985 में उनके मूल नोट बुक्स ‘रामानुजन् नोट बुक्स’ शीर्षक से 5 खंडों में प्रकाशित हुआ । उनका एक पुराना रजिस्टर जिसमें वे प्रमेयों और सूत्रों को लिखा करते थे, 1976 में अचानक ट्रिनिटी कालेज के पुस्तकालय में मिला जिसे रामानुजन् की ‘द लॉस्ट बुक’  के नाम से जाना गया । यह पुस्तक उनकी जन्म शताब्दी वर्ष 1987 में प्रकाशित हुआ । रामानुजन् के हस्तलिखित 3 नोटबुक मद्रास वि.वि. के पुस्तकालय में हैं । उनके द्वारा लिखे गए कुछ पत्र राष्ट्रीय अभिलेखागार में है और कुछ अन्य दस्तावेज कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज के पुस्तकालय में है ।

रामानुजन् की जीवनी से संबंधित पुस्तकों में राबर्ट कैनिगेल लिखित ‘द मैन हू नो इन्फिनिटी’, ‘द इंडियन क्लर्क’ और ‘द फर्स्ट वन’ प्रमुख हैं । उनके नाम पर 3 जर्नल भी प्रकाशित हो रहे हैं ।
विदेशों में उन पर बहुत से नाटक भी मंचित हुए हैं जिनमें ‘द ओपेरा-रामानुजन्, पार्टीशन’, ‘फर्स्ट क्लास मैन’ और ‘ए डिस्अपीयरिंग नंबर’ उल्लेखनीय हैं । उनके जीवन पर देश-विदेश में कई डाक्यूमेंटरी फिल्में बनीं । दो फीचर फिल्में भी बनीं- 1914 में ‘रामानुजन’ और 2015 में ‘द मैन हू नो इन्फिनिटी’। भारत सरकार ने वर्ष 1962, 2011, 2012 और 2016 में रामानुजन् की स्मृति में डाक टिकिट जारी किए । उनकी 125 वीं जयंती पर वर्ष 2012 को ‘राष्ट्रीय गणित वर्ष’ घोषित किया गया था जबकि उनकी जन्मतिथि 22 दिसंबर  को ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ घोषित किया गया है । लेकिन अब समय है कि हम  प्रसिद्ध वैज्ञानिक पद्मविभूषण रोदम नरसिम्हा के इस गूढ़ कथन पर भी ध्यान दें- ‘‘भारतीय विश्वविद्यालयों में अभी भी रामानुजन् को प्रवेश नहीं मिला है !’’

एक महान बौद्धिक व्यक्तित्व होने के बावजूद रामानुजन् का स्वभाव अत्यंत सरल था । वे आस्तिक थे किंतु रूढ़ियों और कुरीतियों को स्वीकार नहीं करते थे । उनकी धारणा थी कि जात-पाँत और छुआछूत के नियम ईश्वरीय नहीं हैं और इनका पालन करना भी अनिवार्य नहीं है । रामानुजन् का जीवन अल्प समय का रहा, लगभग 33 वर्ष, किंतु उनकी कीर्ति दुनिया भर के गणितज्ञों और वैज्ञानिकों की स्मृति में चिरकाल तक स्पंदित होती रहेगी ।

-महेन्द्र वर्मा  



Mar 30, 2020

ममतामयी प्रकृति








कभी छलकती रहती थीं ,
बूँदें अमृत की धरती पर,
दहशत का जंगल उग आया ,
कैसे अपनी धरती पर ।

सभी मुसाफिर  इस सराय के , 
आते-जाते रहते हैं,
आस नहीं मरती लोगों की ,
बस जीने की  धरती पर ।

ममतामयी प्रकृति को चिंता ,
है अपनी संततियों की,
सबके लिए जुटा कर रक्खा ,
दाना -पानी धरती पर ।

पूछ  रहे  हो  हथेलियों  पर,
कैसे   रेखाएँ   खींचें,
चट्टानों पर ज़ोर लगा, 
हैं बहुत नुकीली धरती पर ।

रस्म निभाने सबको मरना, 
इक दिन लेकिन उनकी सोच,
जो हैं  अनगिन  बार  मरा ,
करते  जीते -जी  धरती पर ।

जब से पैसा दूध-सा हुआ,  
महल बन गए बाँबी-से,
नागनाथ औ’ साँपनाथ की,
भीड़ है बढ़ी धरती पर ।

मौसम रूठा रूठी तितली ,
रूठी दरियादिली  यहाँ,
जाने किसकी नज़र लग गई, 
आज हमारी धरती पर ।

                                                                                                              -महेन्द्र वर्मा