Mar 21, 2011


नवगीत

पंछी के कोटर में 
सपनों के जाले।
चुगती है संध्या भी
नेह के निवाले।


गगन तिमिर निरख रहा
तारों का क्रंदन,
रजनी के भाल, चंद्र
लेप गया चंदन।


दृग संपुट खोल रहे
भोर के उजाले।


जुगनू की देह हुई
रश्मि पुंज वर्तन,
नूपुर छनकाता है
झींगुर का नर्तन।


नीरव के अधरों के
तोड़ सभी ताले।

                        -महेन्द्र वर्मा

40 comments:

वन्दना said...

पंछी के कोटर में
सपनों के जाले।
चुगती है संध्या भी
नेह के निवाले।
बहुत ही भावमयी रचना।

Kailash C Sharma said...

पंछी के कोटर में
सपनों के जाले।
चुगती है संध्या भी
नेह के निवाले।

बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत सुन्दर..

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

गगन तिमिर निरख रहा
तारों का क्रंदन,
रजनी के भाल, चंद्र
लेप गया चंदन।

जुगनू की देह हुई
रश्मि पुंज वर्तन,
नूपुर छनकाता है
झींगुर का नर्तन।

वाह!वाह!वाह!
शिल्प के कसाव के तो कहने ही क्या हैं, विम्बों का भी कोई जवाब नहीं !
इस उत्कृष्ट नव गीत के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें !
आभार !

संजय भास्कर said...

आदरणीय महेंद्र जी
नमस्कार !
बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत सुन्दर..

संजय भास्कर said...

रंगों का त्यौहार बहुत मुबारक हो आपको और आपके परिवार को|
कई दिनों व्यस्त होने के कारण  ब्लॉग पर नहीं आ सका
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

ZEAL said...

कभी-कभी अपनी कमतरी का एहसास होता है । काव्य समझने की शक्ति कम है , इसलिए कविता का अर्थ ठीक से नहीं समझ सकी । वैसे पढने में बहुत अच्छी लगी प्रस्तुति।

सुशील बाकलीवाल said...

अत्यन्त भावपूर्ण उत्तम प्रस्तुति.
आभार सहित...

शुक्रिया भी... शिकायत भी...!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत नवगीत है भावपूर्ण अभिव्यक्ति ..



चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 22 -03 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.blogspot.com/

संजय @ मो सम कौन ? said...

आपका शब्द-संयोजन बहुत सुद्ढ़ है वर्मा जी। सशज तरीके से इतनी खूबसूरत अभिव्यकित, पढ़कर मजा आ जाता है। पढ़ने के बाद लगता है कि हम भी लिख सकते हैं, लेकिन सबके वश का नहीं ऐसा सुंदर लिखना।
आभार स्वीकारें सर।

शिखा कौशिक said...

जुगनू की देह हुई
रश्मि पुंज वर्तन,
नूपुर छनकाता है
झींगुर का नर्तन।
bahut sundar.
sanjay ji ne bilkul sahi kaha hai.

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

गगन तिमिर निरख रहा
तारों का क्रंदन,
रजनी के भाल, चंद्र
लेप गया चंदन।
बेहतरीन अभिव्यक्ति......

शालिनी कौशिक said...

पंछी के कोटर में
सपनों के जाले।
चुगती है संध्या भी
नेह के निवाले।
kya kahoon shabd jaise jam hokar rah gaye hon bahut shandar prastuti..

ज्योति सिंह said...

दृग संपुट खोल रहे
भोर के उजाले।


जुगनू की देह हुई
रश्मि पुंज वर्तन,
नूपुर छनकाता है
झींगुर का नर्तन।


नीरव के अधरों के
तोड़ सभी ताले।
bahut hi pyaari rachna ,bha gayi ,holi parv ki badhai .

Rahul Singh said...

भागते-भटकते लौटे के लिए ठंडी लेप की तरह.

Bhushan said...

सुंदर काव्य बिंबों से सजी रचना.

अजय कुमार said...

सुंदर अभिव्यक्ति ,कोमल नवगीत

ashish said...

जुगनू की देह हुई
रश्मि पुंज वर्तन,
नूपुर छनकाता है
झींगुर का नर्तन।
निशा के नख शिख सौन्दर्य वर्णन की सुन्दर अभिव्यक्ति .

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

पंछी के कोटर में, सपनों के जाले,
चुगती है संध्या भी, नेह के निवाले।

बेहतरीन अभिव्यक्ति, वर्मा जी को तहे-दिल बधाई।

Shah Nawaz said...

बहुत बढ़िया!

Navin C. Chaturvedi said...

दृग सम्‍पुट............वाह वाह
माटी की सुगंध बिखेरता उत्तम नवगीत
बधाई महेंद्र भाई

मनोज कुमार said...

अद्भुत!
कसा हुआ शिल्प और अनूठे बिबों ने नव गीत को कई बार पढने पर मज़बूर किया।

Navin C. Chaturvedi said...

महेंद्र भाई मेरे पास आप का ईमेल पता नहीं है| कृपया मुझे navincchaturvedi@gmail.com पर एक टेस्ट मेल भेजने की कृपा करें|

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

नवगीत अत्यन्त सुन्दर बन पडा है ।

विशाल said...

बहुत खूबसूरत भाव.
खूबसूरत अभिव्यक्ति.
खूबसूरत शब्द संयोजन .
सलाम.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

वर्मा साहब!
इतने सुन्दर शब्दों में आपने जादू बिखेरा है की बस सादगी पर मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता.. पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो ठुमक चलत रामचंद्र की पैजनियाँ बज रही हैं!!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

गागर में सिमटे हों जैसे सागर के भाव।

होली के पर्व की अशेष मंगल कामनाएं।
धर्म की क्रान्तिकारी व्या ख्याa।
समाज के विकास के लिए स्त्रियों में जागरूकता जरूरी।

Sawai Singh Rajpurohit said...

पंछी के कोटर में
सपनों के जाले।
चुगती है संध्या भी
नेह के निवाले।


गगन तिमिर निरख रहा
तारों का क्रंदन,
रजनी के भाल, चंद्र
लेप गया चंदन।

बहुत सुंदर

अरविन्द जांगिड said...

आदरणीय महेंद्र वर्मा जी, बहुत ही सुन्दर है आपकी रचना.

पंछी के कोटर में
सपनों के जाले।
चुगती है संध्या भी
नेह के निवाले।

इन पंक्तियाँ का तो क्या कहना, आभार.

Minakshi Pant said...

बहुत सुन्दर रचना |

pragya said...

बेहतरीन अभिव्यक्ति...जयशंकर प्रसाद याद आ गए...

ZEAL said...
This comment has been removed by the author.
Kunwar Kusumesh said...

बहुत सुन्दर नवगीत बन पड़ा है .आपको बधाई इस नवगीत की.

Prem Farrukhabadi said...

जुगनू की देह हुई
रश्मि पुंज वर्तन,
नूपुर छनकाता है
झींगुर का नर्तन।

वर्मा जी,
बड़ी प्यारी सी लगी आपकी रचना। बधाई!!

राज भाटिय़ा said...

एक बहुत अच्छी ओर सुंदर रचना धन्यवाद

daanish said...

गीत ,,,
भाव और अभिव्यक्ति
का एक अनुपम सौजन्य बन कर
हम तक पहुंचा है ...

अभिवादन .

मदन शर्मा said...

आदरणीय महेंद्र जी नमस्कार !
कृपया थोडा सरल शब्दों में लिखें मुझ जैसे अज्ञानी को समझने में बहुत दिक्कत हो रही है.
शायद प्रकृति का बहुत शूक्ष्म चित्रण किया है आपने !
कुछ गलत हो तो क्षमा करें !!

BrijmohanShrivastava said...

झींगुर, जुगनू, रजनी तारे, की प्राकृतिक छटा का सजीव चित्रण

Apanatva said...

bahut sunder bhavo ko liye alankrut rachana chaap chod gayee....

ek arse baad itnee sunder hindi padne ko milee .
aabhar

दिगम्बर नासवा said...

गगन तिमिर निरख रहा
तारों का क्रंदन,
रजनी के भाल, चंद्र
लेप गया चंदन।..
महेंद्र जी ... बहुत ही सुंदर भाव लिए है ये नवगीत ..... शब्दों और अर्थों का लाजवाब संयोजन ......

Amrita Tanmay said...

Bachapan me padhi kavita ki yaad dila di...bahut sundar hai yah ...navgeet