Nov 19, 2011

दो कविताएँ


एक

उस दिन
आईने में मेरा प्रतिबिंब
कुछ ज्यादा ही अपना-सा लगा
मैंने उससे कहा-
तुम ही हो 
मेरे सुख-दुख के साथी
मेरे अंतरंग मित्र !
प्रतिबिंब के उत्तर ने 
मुझे अवाक् कर दिया
उसने कहा-
तुम भ्रम में हो
मैं ही तो हूँ 
तुम्हारा
सबसे बड़ा शत्रु भी !

दो

इंसान को 
इंसान ही रहने दो न
क्यूँ उकसाते हो उसे
बनने के लिए
भगवान या शैतान
अरे, धर्म !
अरी, राजनीति !

                                      -महेन्द्र वर्मा

38 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सटीक बात कही है दोनों रचनाओं में ...

Sunil Kumar said...

सही कहा आपने इन्सान को इन्सान ही रहने दो दोनों कवितायेँ बहुत सुंदर अच्छी लगी

Unknown said...

बहुत बढ़िया

रेखा said...

बहुत ही सुन्दर और सार्थक सन्देश देती हुई रचनाएँ ..

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

एक - बिल्कुल सही कहा आपने, आईना सदा सच बोलता है मगर हम भ्रम में रहते हैं.
दो - बहुत सटीक बात कही.

मनोज कुमार said...

दूसरी रचना राह्जनीति पर करारा व्यंग्य है।
पहली रचना एक यथार्थ है। खुद के प्रतिबिम्ब से परिचय या मुलाक़ात हो जाए तो वह तो शत्रु लगेगा ही।

vandan gupta said...

दोनो ही रचनाये बेहद गहन और सटीक्।

Dr.R.Ramkumar said...

Nice poetry

monali said...

Very apt poems...

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

अच्छी कविता

अनुपमा पाठक said...

इंसानी पक्ष को ख़ूबसूरती से पेश करती कवितायेँ!

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बहुत सटीक और सार्थक सन्देश लिए कवितायेँ......

Bharat Bhushan said...

धर्म और राजनीति सबसे पहले इंसानियत का शिकार करते हैं. अपना प्रतिबिंब अपनी ही दृष्टि में मित्र और शत्रु होता है. बहुत खूब कहा है वर्मा जी.

रविकर said...

छाई चर्चामंच पर, प्रस्तुति यह उत्कृष्ट |
सोमवार को बाचिये, पलटे आकर पृष्ट ||

charchamanch.blogspot.com

virendra sharma said...

दोनों कवितायें अति अर्थ पूर्ण आधुनिक बिम्ब विधान समेटे .

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

मैं ही तो हूँ
तुम्हारा
सबसे बड़ा शत्रु भी !

वाह वाह सर... कितने पते की बात कही है....
दोनों ही क्षणिकाएं अद्भुत है...
सादर बधाई....

Unknown said...

fully agreed sir !

प्रेम सरोवर said...

अच्छी पोस्ट आभार ! मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद।

Arun sathi said...

इंसान को
इंसान ही रहने दो न
क्यूँ उकसाते हो उसे
बनने के लिए
भगवान या शैतान
अरे, धर्म !
अरी, राजनीति !

साधु-साधु

Anupama Tripathi said...

dono rachnayen bahut badhia ...
sateek baat kahati hui ....

Amrita Tanmay said...

बढ़िया लिखा है.दोनों रचना बहुत अच्छी लगी. प्रभावी..

हरकीरत ' हीर' said...

bahut khoob ....

Mahendr ji apni 10,12 kshnikayein sakshipt parichay aur tasveer bhej dein mujhe saraswati-suman ke liye .....

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

पहली कविता में छिपा है आईने का सच और दूसरे में जीवन का सच... एक बार दोनों कविताओं का मर्म समझ में आ जाए तो जीवन के प्रति दृष्टिकोण ही बदल जाए!!

कुमार संतोष said...

दोनों ही सुंदर कवितायें !

www.navincchaturvedi.blogspot.com said...

आईने पर की कविता वाक़ई अचंभित कर गई। और दूसरी का 'अरे धर्म - अरी राजनीति' वाक्यांश अपने आप में एक सम्पूर्ण पुस्तक है। बधाई वर्मा जी।

Vandana Ramasingh said...

तुम भ्रम में हो
मैं ही तो हूँ
तुम्हारा
सबसे बड़ा शत्रु भी !...

सच है अभिमान के रूप में यही तो होता है हमारा शत्रु

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...






आदरणीय महेन्द्र वर्मा जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

बहुत प्रभावशाली कविताएं हैं
आत्म-साक्षात् कराती यह रचना चमत्कृत करती है , जब आईने में से प्रतिबिंब उत्तर देता है -
तुम भ्रम में हो
मैं ही तो हूं
तुम्हारा
सबसे बड़ा शत्रु भी !



…और इस अधिकार के साथ एक ईमानदार ही राजनीति को फटकार सकता है -
इंसान को
इंसान ही रहने दो न
क्यूं उकसाते हो उसे
बनने के लिए
भगवान या शैतान
अरे, धर्म !
अरी, राजनीति !

आपके यहां बहुत संतुष्टि मिलती है … रचना भले ही छंदबद्ध हो चाहे छदमुक्त ।


बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

इंसान को
इंसान ही रहने दो न
क्यूँ उकसाते हो उसे
बनने के लिए
भगवान या शैतान
अरे, धर्म !
अरी, राजनीति !

bahut sundar..
insaan yadi insaan hi ban jaaye to bahut hai.

Suman Dubey said...

महेन्द्र जी नमस्कार, सुन्दर अभिव्यक्ति ।

Dr.NISHA MAHARANA said...

इंसान को
इंसान ही रहने दो न
क्यूं उकसाते हो उसे
बनने के लिए
भगवान या शैतान.gahan abhivaykti.

दिगंबर नासवा said...

जब तक इंसान रहेगा ये राजनीति उसे बाँट कर ही रहेगी ...

ZEAL said...

प्रतिबिम्ब के बेबाक उत्तर ने अचंभित कर दिया और इस रचना में छिपे आपके चिंतन ने आवाक !
अति सुन्दर !

SANDEEP PANWAR said...

बेहतरीन लिखा है,

हरकीरत ' हीर' said...

mujhe bhej dein ....


harkirathaqeer@gmail.com

प्रेम सरोवर said...

बहुत रोचक और सुंदर प्रस्तुति.। मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर और रोचक अभिव्यक्ति ।

Udan Tashtari said...

अरे, धर्म !
अरी, राजनीति !

मेरा मन पंछी सा said...

बहूत ही अच्छे और सार्थक दोहे है...