Jul 14, 2012

सोचिए ज़रा



कितनी लिखी गई किताब सोचिए ज़रा,
क्या मिल गए सभी जवाब सोचिए ज़रा।

काँटों बग़ैर ज़िंदगी कितनी अजीब हो,
अब खिलखिला रहे गुलाब सोचिए ज़रा।

ज़र्रा है तू अहम विराट कायनात का,
भीतर उबाल आफ़ताब सोचिए ज़रा।

चले उकेर के हथेलियों पे हम लकीर,
तकदीर माँगता हिसाब सोचिए ज़रा।
 

दरपन दिखा रहा तमाम शक्ल इसलिए,
उसने पहन रखा नक़ाब सोचिए ज़रा


                                                    -महेन्द्र वर्मा

39 comments:

ANULATA RAJ NAIR said...

वाह...
बहुत सुन्दर....

सादर
अनु

vandan gupta said...

कहाँ से लफ़्ज़ लाऊँ महेन्द्र जी इस लाजवाब अभिव्यक्ति के लिये ……………शानदार

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चले उकेर के हथेलियों पे हम लकीर,
तकदीर माँगता हिसाब सोचिए ज़रा।

दरपन दिखा रहा तमाम शक्ल इसलिए,
उसने पहन रखा नक़ाब सोचिए ज़रा ।

वाकई सोचनेपर मजबूर करती गज़ल

डॉ. मोनिका शर्मा said...

चले उकेर के हथेलियों पे हम लकीर,
तकदीर माँगता हिसाब सोचिए ज़रा।


बहुत सुन्दर....

रविकर said...

सोचने के लिए प्रेरित करती |
आभार ||

शिवनाथ कुमार said...

सोचने को विवश करती हुई ...
सुंदर सी कविता !!

संध्या शर्मा said...

आत्मा के दर्पण में सारे बेनकाब..लाजवाब... आभार

Bharat Bhushan said...

दरपन दिखा रहा तमाम शक्ल इसलिए,
उसने पहन रखा नक़ाब सोचिए ज़रा ।

नक़ाब पहन कर दरपन देखने वाले भी दरपन के सच्चे प्रतिबिंब से नहीं बच सकते. बहुत खूब लिखा है महेंद्र जी. गजल की सादगी भा गई.

मेरा मन पंछी सा said...

गहरे अर्थ लिए अभिव्यक्ति...
बेहतरीन :-)

Anupama Tripathi said...

दरपन दिखा रहा तमाम शक्ल इसलिए,
उसने पहन रखा नक़ाब सोचिए ज़रा ।
गहन अभिव्यक्ति ...बहुत अच्छी रचना ...!!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

काँटों बगैर जिंदगी कितनी अजीब हो,
अब खिलखिला रहे गुलाब सोचिये ज़रा.

बहुत सुन्दर गजल सर....
सादर बधाई.

Unknown said...

चले उकेर के हथेलियों पे हम लकीर,
तकदीर माँगता हिसाब सोचिए ज़रा।

बहुत ही सुन्दर जीवन से जुडी बातें खुबसूरत ...

ऋता शेखर 'मधु' said...

शानदार...इसके आगे क्या कहूँ सोचती हूँ जरा :)

Amrita Tanmay said...

सोचूं तो...उम्दा गजल.. . वाह! बहुत खूब..

virendra sharma said...

ज़र्रा है तू अहम विराट कायनात का,
भीतर उबाल आफ़ताब सोचिए ज़रा।
कॉफ़ी इंतजारी के बाद बड़ी सशक्त गजल पढवाई आपने ,लिखी आपने .

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

दरपन दिखा रहा तमाम शक्ल इसलिए,
उसने पहन रखा नक़ाब सोचिए ज़रा ।

वाह,,, बहुत सुंदर गजल,,,के लिए बधाई,,महेंद्र जी

RECENT POST...: राजनीति,तेरे रूप अनेक,...

लोकेन्द्र सिंह said...

महेंद्र जी, सोचना पड़ेगा...

प्रतिभा सक्सेना said...

काँटों बग़ैर ज़िंदगी कितनी अजीब हो,
अब खिलखिला रहे गुलाब सोचिए ज़रा।
कांटों की सुरक्षा नहो तो गुलाब की हँसी खिल ही न सके - तत्वपूर्ण बात कही है !

Rahul Singh said...

दरपन का नकाब- अनूठा प्रयोग.

ashish said...

सोचने को मजबूर करती अद्भुत रचना , आभार

उपेन्द्र नाथ said...

बहुत ही विचारनीय पंक्तियाँ... सोंचने को मजबूर करती हुई. सुंदर प्रस्तुति.

संतोष त्रिवेदी said...

दूर हमसे न जाने क्यों हो गए,
दिल पे हाथ रखके सोचिये ज़रा !!

बढ़िया गज़ल !

संतोष त्रिवेदी said...

दूर हमसे न जाने क्यों हो गए,
दिल पे हाथ रखके सोचिये ज़रा !!

बढ़िया गज़ल !

दिगंबर नासवा said...

काँटों बग़ैर ज़िंदगी कितनी अजीब हो,
अब खिलखिला रहे गुलाब सोचिए ज़रा ...

बहुत खूब ... मुमकिन नहीं ऐसा जीवन सोचना ,... क्या जुस्तजू रह जायगी जिंदगी में जो ऐसा हो गया ,... सच है सोचने की जरूरत है ... लाजवाब गज़ल ...

VIJAY KUMAR VERMA said...

बहुत ही सुंदर

white bedroom furniture said...

Hello
I adore this writing. You definitely know how to bring an issue to light and make it important.

devendra gautam said...

बहुत खूब!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत ख़ूब!
आपकी यह सुन्दर प्रवृष्टि कल दिनांक 16-07-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-942 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

सुशील कुमार जोशी said...

कितनी लिखी गई किताब सोचिए ज़रा,
क्या मिल गए सभी जवाब सोचिए ज़रा।

सोच ही तो रहे हैँ पर क्या करें ?

बहुत खूब !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सोच-सोच में हो गई, अपनी उम्र तमाम।
अब पछताए होत क्या, किए नहीं कुछ काम।।

सदा said...

कितनी लिखी गई किताब सोचिए ज़रा,
क्या मिल गए सभी जवाब सोचिए ज़रा।
वाह ... बहुत खूब

मनोज कुमार said...

इस ग़ज़ल का तेवर हमें सोचने पर विवश करता है।

संजय भास्‍कर said...

चले उकेर के हथेलियों पे हम लकीर,
तकदीर माँगता हिसाब सोचिए ज़रा।
..... सुंदर गजल के लिए बधाई महेंद्र जी

Kailash Sharma said...

चले उकेर के हथेलियों पे हम लकीर,
तकदीर माँगता हिसाब सोचिए ज़रा।

...वाह! लाज़वाब गज़ल...हरेक शेर गहन अर्थ छुपाये..

Satish Saxena said...

काँटों बग़ैर ज़िंदगी कितनी अजीब हो,
अब खिलखिला रहे गुलाब सोचिए ज़रा।

गज़ब का लिखते हैं आप !
बधाई !

Bharat Bhushan said...

एक सप्ताह खाली गया. जल्द लौटिए.

ZEAL said...

चले उकेर के हथेलियों पे हम लकीर,
तकदीर माँगता हिसाब सोचिए ज़रा..

Excellent creation..

.

डॉ. जेन्नी शबनम said...

सोचने के लिए इतने सारे विषय, और सभी जीवन से जुड़े हुए, पर जवाब नदारद. अच्छी रचना, बधाई.

Anjani Kumar said...

"दरपन दिखा रहा तमाम शक्ल इसलिए,
उसने पहन रखा नक़ाब सोचिए ज़रा ।"
ग़ज़ब की कल्पना...
लाजवाब ग़ज़ल