Oct 21, 2012

नवगीत



शब्दों से बिंधे घाव
उम्र भर छले,
आस-श्वास पीर-धीर
मिल रहे गले।

सुधियों के दर्पण में
अलसाये-से साये,
शुष्क हुए अधरों ने
मूक छंद फिर गाए,

हृद के नेहांचल में
स्वप्न-सा पले।

उज्ज्वल हो प्रात-सा
युग का नव संस्करण,
चिंतन के सागर में
सुलझन का अवतरण,

रावण के संग-संग
कलुष सब जले।

-महेन्द्र वर्मा

36 comments:

यादें....ashok saluja . said...

सुंदर भाव ...अच्छी सोच !
शुभकामनाएँ!

यादें....ashok saluja . said...
This comment has been removed by the author.
रविकर said...

बढ़िया नवगीत |
बधाई महेंद्र भाई जी ||

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बढिया, बहुत सुंदर

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह!
आपकी इस ख़ूबसूरत प्रविष्टि को कल दिनांक 22-10-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1040 पर लिंक किया जा रहा है। सादर सूचनार्थ

expression said...

वाह...
बहुत सुन्दर नवगीत...

सादर
अनु

Amrita Tanmay said...

अति प्रवाहमयी रचना..

Ramakant Singh said...

शब्दों से बिंधे घाव
उम्र भर छले,
आस-श्वास पीर-धीर
मिल रहे गले।

बहुत ही सुन्दर भावों की लड़ी

lokendra singh said...

बहुत ही सुन्दर

vandana said...

आस-श्वास पीर-धीर..
यह पंक्ति बहुत अच्छी लगी
और नवगीत बहुत ही बढ़िया भावों को लिए हुए

Virendra Kumar Sharma said...

उज्ज्वल हो प्रात-सा
युग का नव संस्करण,
चिंतन के सागर में
सुलझन का अवतरण,

रावण के संग-संग
कलुष सब जले।

नव गीत नव बयार लेकर आया है .तंज भी सकारात्मक भाव भी लिए आया है यह गीत नव आस भी ,उजास भी .बधाई .

Dr.NISHA MAHARANA said...

bahut badhiya .....

Bharat Bhushan said...

नवगीत की यह छटा अच्छी लगी.

Reena Maurya said...

बहुत ही सुंदर नवगीत
सुंदर....
:-)

Virendra Kumar Sharma said...

बढ़िया ज़मीन तोड़ी है नवगीत की आभार आपकी द्रुत टिपण्णी का .

Virendra Kumar Sharma said...

बढ़िया ज़मीन तोड़ी है नवगीत की आभार आपकी द्रुत टिपण्णी का .

Minakshi Pant said...

सुन्दर गीत दशहरे की हार्दिक शुभकामनायें |

डॉ. मोनिका शर्मा said...

उत्कृष्ट रचना ..... बहुत सुंदर

शालिनी पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

कृपया आप इसे अवश्य देखें और अपनी अनमोल टिप्पणी दें

यात्रा-वृत्तान्त विधा को केन्द्र में रखकर प्रसिद्ध कवि, यात्री और ब्लॉग-यात्रा-वृत्तान्त लेखक डॉ. विजय कुमार शुक्ल ‘विजय’ से लिया गया एक साक्षात्कार

Virendra Kumar Sharma said...

Virendra Kumar Sharma said...
हास्य
हार गया तो क्या हुआ, टेंशन गोली मार।
कोचिंग सेंटर खोल ले, सिखला भ्रष्टाचार।।
......महेंद्र वर्मा जी .

कभी अकेला ना रहूं, मेरा अपना ढंग।
घिरा हुआ एकांत से, सन्नाटों के संग।।
सीख
संगति उनकी कीजिए, जिनका हृदय पवित्र।
कभी-कभी एकांत ही, सबसे उत्तम मित्र।।
बहुत बढ़िया नीति और सीख पढ़ाते दोहे .दोहों में गद्य की तरह विस्तार की गुंजाइश नहीं रहती ,कम शब्दों में एक परिवेश एक भाव ,एक मानसिक कुन्हासा उड़ेलना होता है ,महेंद्र जी के दोहे इस कसौटी पर खरे उतरते हैं .
Tue Oct 23, 06:55:00 PM 2012
ram ram bhai
मुखपृष्ठ

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2012
गेस्ट पोस्ट ,गज़ल :आईने की मार भी क्या मार है

http://veerubhai1947.blogspot.com/

Virendra Kumar Sharma said...

उज्ज्वल हो प्रात-सा
युग का नव संस्करण,
चिंतन के सागर में
सुलझन का अवतरण,

रावण के संग-संग
कलुष सब जले।

यही तो दिक्कत है ,रावण लीला से तंत्र लोक फले ,जन मन को नित नित छले .बढिया नवगीत अपनी अलग धाक लिए लायें हैं आप .
ram ram bhai
मुखपृष्ठ

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2012
गेस्ट पोस्ट ,गज़ल :आईने की मार भी क्या मार है

http://veerubhai1947.blogspot.com/

Rajput said...

रावण के संग-संग
कलुष सब जले...
लाजवाब म बहुत शानदार रचना के लिए बधाई ।

संजय @ मो सम कौन ? said...

प्रतीकात्मक रावण दहन के पीछे उद्देश्य तो यही रहा होगा लेकिन हम उत्सवप्रेमियों ने पुतले जलाना ही उद्देश्य मान लिया।
तदापि विजयादशमी पर्व की हार्दिन बधाई।

आशा जोगळेकर said...

रावण के संग संग कलुष सब जले । तथास्तु ।
विजया दशमी पर शुभेच्छाएं ।

Virendra Kumar Sharma said...

दशहरा मुबारक भाई साहब !

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

नवगीत के माध्यम से जो सन्देश आपने दिया है वह हम तक पहुंचा.. शुभकामनाएँ!!

प्रेम सरोवर said...

अच्छी एवं भावमय कविता । मेरे नए पोस्ट पर पधारें।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुंदर अभिव्यक्ति ...सार्थक संदेश देती रचना

Kailash Sharma said...

सुधियों के दर्पण में
अलसाये-से साये,
शुष्क हुए अधरों ने
मूक छंद फिर गाए,

...बहुत भावपूर्ण सुन्दर रचना..

रचना दीक्षित said...

रावण के संग-संग
कलुष सब जले।

सच्ची कामना. सुंदर प्रस्तुति.

रचना दीक्षित said...

बहुत सुंदर गीत.

मनोज कुमार said...

अद्भुत नवगीत!
मूक छंद फिर गाए,
इस प्रयोग ने मन को छुआ।

Naveen Mani Tripathi said...

lajbab prastuti sir .....abhar .

ZEAL said...

bahut sundar navgeet..

आशा जोगळेकर said...

चिंतन के सागर में
सुलझन का अवतरण,

रावण के संग-संग
कलुष सब जले।

बहुत सुंदर नवगीत ।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह बहुत युंदर रचना है