May 31, 2014

ख़ामोशी

तन्हाई में जिनको सुकून-सा मिलता है,
आईना भी उनको दुश्मन-सा लगता है।

दिल में उसके चाहे जो हो तुझको क्या,
होठों से तो तेरा नाम जपा करता है।

तेरी जिन आंखों में फागुन का डेरा था,
बात हुई क्या उनमें अब सावन बसता है।

वो तो दीवाना है उसकी बातें छोड़ो,
अपने ग़म को ही अपनी ग़ज़लें कहता है।

ख़ामोशी भी कह देती है सारी बातें,
दिल की बातें कब कोई मुंह से कहता है।

                                                 
                                                  -महेन्द्र वर्मा

9 comments:

Shikha Kaushik said...

bahut sundar v sarthak lekhan hetu badhai

Vandana Ramasingh said...

तन्हाई में जिनको सुकून-सा मिलता है,
आईना भी उनको दुश्मन-सा लगता है।

वाह आदरणीय बहुत बढ़िया ग़ज़ल

Amrita Tanmay said...

बहुत..बहुत.. बहुत बढ़िया..

दिगंबर नासवा said...

दिल में उसके चाहे जो हो तुझको क्या,
होठों से तो तेरा नाम जपा करता है ..

सच कहा है दिल किसने देखा है ... जो होठों ने कहा वो ही सच है ...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

आपके मूड से बिल्कुल अलग सी एक ग़ज़ल.. लेकिन बहुत ख़ूबसूरत!!

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बेहतरीन पंक्तियाँ

Ankur Jain said...

वो तो दीवाना है उसकी बातें छोड़ो,
अपने ग़म को ही अपनी ग़ज़लें कहता है।

ख़ामोशी भी कह देती है सारी बातें,
दिल की बातें कब कोई मुंह से कहता है।

बहुत खूब....

Unknown said...

बेहतरीन लिखते हैं आप।

संजय भास्‍कर said...

बहुत ख़ूबसूरत!!