Jun 21, 2016

चींटी के पग





सहमी-सी है झील शिकारे बहुत हुए,
और उधर तट पर मछुवारे बहुत हुए ।

चाँद सरीखा कुछ तो टाँगो टहनी पर,
जलते-बुझते जुगनू तारे बहुत हुए ।

चींटी के पग नेउर को भी सुनता हूँ,,
ढोल मँजीरे औ’जयकारे बहुत हुए ।

आओ अब मतलब की बातें भी  कर लें,
जुमले वादे भाषण नारे बहुत हुए ।

कुदरत यूँ ही ख़फ़ा नहीं होती हमसे,
समझाने के लिए इशारे बहुत हुए ।

-महेन्द्र वर्मा

8 comments:

Rakesh Kaushik said...

वाह वाह - अति सुंदर

Bharat Bhushan said...

इंसान ने वातावरण को ऐसा बना लिया है कि शोर बहुत चलता रहता है और मुद्दा खो जाता है. जो करना चाहिए वह बहुत पीछे छूट रहा है या कहें कि बहुत ही पीछे छूट चुका है.

आओ अब मतलब की बातें भी कर लें,
जुमले वादे भाषण नारे बहुत हुए।
कुदरत यूँ ही ख़फ़ा नहीं होती हमसे,
समझाने के लिए इशारे बहुत हुए।

हर पंक्ति ज़िंदा अहसास है.

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " यूरोप का नया संकट यूरोपियन संघ... " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Kailash Sharma said...

चाँद सरीखा कुछ तो टाँगो टहनी पर,
जलते-बुझते जुगनू तारे बहुत हुए ।
....वाह्ह्ह्ह...क्या खूब कहा है...लाज़वाब प्रस्तुति..

Unknown said...

कुदरत यूँ ही ख़फ़ा नहीं होती हमसे,
समझाने के लिए इशारे बहुत हुए ।

सुंदर सी गज़ल में पर्यावरण संकट का भी जिक्र बहुत बढिया।

दिगंबर नासवा said...

सच है कुदरत का इशारा समझने में ही भलाई होती है ... नहीं तो विनाश झेला नहीं जाता ...

संजय भास्‍कर said...

कमाल कर दिया

Unknown said...

वाह!