Feb 28, 2017

अपने हिस्से की बूँदें

तूफ़ाँ बनकर वक़्त उमड़ उठता है अक्सर,
खोना ही है जो कुछ भी मिलता है अक्सर ।

उसके माथे पर कुछ शिकनें-सी दिखती हैं,
मेरी  साँसों  का  हिसाब रखता है अक्सर ।

वक़्त ने गहरे हर्फ़ उकेरे जिस किताब पर,
उस के सफ़्हे वो छू कर पढ़ता है अक्सर ।

सहरा  हो  या  शहर  तपन  है  राहों में,
जख़्मी पाँवों से चलना पड़ता है अक्सर ।

अपने  हिस्से  की  बूँदों  को  ढूँढ  रहा  हूँ,
दरिया का ही नाम लिखा दिखता है अक्सर ।

 


-महेन्द्र वर्मा

10 comments:

रश्मि प्रभा... said...

http://bulletinofblog.blogspot.in/2017/02/blog-post_28.html

kuldeep thakur said...

दिनांक 02/03/2017 को...
आप की रचना का लिंक होगा...
पांच लिंकों का आनंदhttps://www.halchalwith5links.blogspot.com पर...
आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...
आप की प्रतीक्षा रहेगी...

MEGHnet said...

दिखा भी तो दरिया नाम ही केवल.
अपने हिस्से की बूँदों को ढूँढ रहा हूँ,
दरिया का ही नाम लिखा दिखता है अक्सर ।
ये पंक्तियां टीस छोड़ जाती हैं.

Kailash Sharma said...

अपने हिस्से की बूँदों को ढूँढ रहा हूँ,
दरिया का ही नाम लिखा दिखता है अक्सर ।

>>>वाह...लाज़वाब। बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल...

रश्मि शर्मा said...

अपने हिस्से की बूँदों को ढूँढ रहा हूँ,
दरिया का ही नाम लिखा दिखता है अक्सर ।

बहुत खूबसूरत

VIJAY KUMAR VERMA said...

वाह
बहुत सुन्दर

Digamber Naswa said...

bahut khoob ... lajawab gazal hai ... har sher kamaal ka ...

Vandana Ramasingh said...

सहरा हो या शहर तपन है राहों में,
जख़्मी पाँवों से चलना पड़ता है अक्सर ।

अपने हिस्से की बूँदों को ढूँढ रहा हूँ,
दरिया का ही नाम लिखा दिखता है अक्सर ।


बहुत शानदार ग़ज़ल आदरणीय

Sanju said...

साथॆक प्रस्तुतिकरण......
मेरे ब्लाॅग की नयी पोस्ट पर आपके विचारों की प्रतीक्षा....

Anonymous said...

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