Sep 30, 2017

ऊबते देखे गए



भीड़ में अस्तित्व अपना खोजते देखे गए,
मौन थे जो आज तक वे चीखते देखे गए।

आधुनिकता के नशे में रात दिन जो चूर थे,
ऊब कर फिर ज़िंदगी से भागते देखे गए।

हाथ में खंजर लिए कुछ लोग आए शहर में,
सुना हे मेरा ठिकाना पूछते देखे गए।

रूठने का सिलसिला कुछ इस तरह आगे बढ़ा,
लोग जो आए मनाने रूठते देखे गए।

लोग उठ कर चल दिए उसने सुनाई जब व्यथा,
और जो बैठे रहे वे ऊबते देखे गए।

बेशऊरी इस कदर बढ़ती गई उनकी कि वे,
काँच के शक में नगीने फेंकते देखे गए।

कह रहे थे जो कि हम हैं नेकनीयत रहनुमा,
काफिले को राह में ही लूटते देखे गए।

                                                                           
                                                                       



 -महेन्द्र वर्मा

9 comments:

MEGHnet said...

बहुत ही बढ़िया. प्रत्येक पंक्ति संपूर्ण है. इसे फेसबुक पर शेयर करने की अनुमति दीजिए.

mahendra verma said...

धन्यवाद आ. भूषण जी ।
इसे फ़ेसबुक पर शेयर करेंगे तो मुझे ख़ुशी होगी ।

मनीष कुमार said...

बहुत बेहतरीन प्रस्तुति !
बहुत बहुत धन्यवाद !

kuldeep thakur said...

दिनांक 03/10/2017 को...
आप की रचना का लिंक होगा...
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...

M. Rangraj Iyengar said...

फेसबुक पर शेयर किया.
अयंगर
7780116592

Dhruv Singh said...

आपकी रचना बहुत ही सराहनीय है ,शुभकामनायें ,आभार

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर।

Sudha Devrani said...

बहुत ही सुन्दर, सार्थक अभिव्यक्ति....

Kailash Sharma said...

बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति...