वैदिक गणित और विद्यालयीन पाठ्यक्रम

(मेरे पिछले पोस्ट का दूसरा भाग, पहला भाग यहां देखें)


दिसंबर 2016, संसद का शीतकालीन सत्र । सदन में भारत शासन से पूछे गए दो दो प्रश्न और संबंधित ‘मिनिस्टर’ द्वारा दिए गए उनके उत्तर-
प्र.1.  क्या यह सच है कि वैदिक गणित परंपरागत विधि से अधिक तीव्र गति से गणितीय प्रश्न हल करने में सक्षम है ?
उ. वैदिक गणित में शीघ्र हल करने के लिए कुछ विधियां दी गई हैं, किंतु ये विधियां गणित में सभी जगह लागू नहीं होतीं ।
पं. 2. क्या सरकार वैदिक गणित को विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में लागू करने के संबंध में विचार कर रही है ?
उ. सरकार इस तरह के किसी प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही  है ।
.......................

इस तरह का प्रस्ताव एक न्यास द्वारा शासन के समक्ष प्रस्तुत किया गया था । एन.सी.ई.आर.टी. ने इस पर काम भी शुरू कर दिया था । यह न्यास  सन् 1992 से इस प्रयास में लगा था कि वैदिक गणित देश भर के स्कूलों में पढ़ाया जाए । इसी न्यास के प्रस्ताव पर कुछ राज्यों के स्कूली पाठ्यक्रमों में वैदिक गणित को सम्मिलित कर लिया गया है ।

उक्त प्रस्ताव को केन्द्र शासन निरस्त नहीं करता यदि देश के जागरूक वैज्ञानिक और गणितज्ञों ने इस की आलोचना नहीं की होती। इन सब का कहना है कि जिसे वैदिक गणित कहा जा रहा है वह गणित नहीं है बल्कि परंपरागत गणित के कुछ प्रारंभिक प्रश्नों के शीघ्र उत्तर बताने की मौखिक विधियां हैं । लेकिन सीखने वाले को यह नहीं बताया जाता कि वह ऐसा क्यों कर रहा है जबकि गणित सीखने का अर्थ यह होता है कि उत्तर प्राप्त करने की प्रक्रिया में हर क्यों का जवाब भी मालूम हो ।

वैदिक गणित के संबंध में सबसे पहले प्राचीन भारतीय गणित और खगोल विज्ञान पर अनेक पुस्तकों के लेखक डॉ.के.एस.शुक्ल का एक आलोचनात्मक लेख Mathematical Education  पत्रिका के जनवरी 1989 अंक में Vedic Mathematics-The illusive title of Swamijis book शीर्षक से प्रकाशित हुआ । उनके अनुसार ‘वैदिक गणित’ शीर्षक भ्रम उत्पन्न करने वाला है क्योंकि इसकी विषय वस्तु वैदिक नहीं है ।

1993 से 2007 के मध्य टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के डॉ. एस.जी.दानी ने Vedic Mathematics-Myths and Reality सहित कई लेख लिखे ।  एक लेख में उन्होंने लिखा है- ‘‘वैदिक गणित को पढ़ाए जाने से कहीं ऐसा न हो कि हमारे देश का बौद्धिक और शैक्षिक जीवन विकृत हो जाए, आने वाली पीढ़ी के लिए शिक्षा और इतिहास की प्रवृत्ति ही दूषित हो जाए ।

प्रसिद्ध खगोलभौतिक विज्ञानी प्रो. जयंत विष्णु नारलीकर की एक पुस्तक 1993 में प्रकाशित हुई- The Scientific Edge । इस में भारत के पिछले 3000 वर्षों के विज्ञान और गणित के गौरवपूर्ण अतीत का विस्तृत वर्णन किया गया है ।  इस पुस्तक में उन्होंने आजकल प्रचलित वैदिक गणित के संबंध में भी विस्तार से लिखा है । प्रो.. नारलीकर इसे न तो वैदिक मानते हैं और न ही गणित । वे लिखते हैं- ‘‘वास्तविक गणित केवल संख्याओं का परिकलन नहीं है बल्कि तर्क और विचारों का परस्पर ऐसा  संबंध है जो सरल सिद्धांतों से प्रारंभ हो कर एक गहन निष्कर्ष तक पहुंचता है ।’’

यही कारण है कि बोधायन (ई.पू. 8वीं श.) द्वारा बताई गई समकोण त्रिभुज संबंधी विशेषता को ‘गणित’ नहीं माना गया क्योंकि उन्होंने इस की उपपत्ति नहीं दी और पायथेगोरस (ई.पू. 5वीं श.) को इसका श्रेय इसलिए दिया गया क्योंकि उसने उपपत्ति भी लिखी । प्रमेय का अर्थ ही है, ‘जिसे प्रमाणित किया जाए’ ।

बहुत से लोगों ने वैदिक गणित के समर्थन में कई लेख प्रकाशित करवाया है । इस पर प्रो. नारलीकर लिखते हैं-‘‘उन्हें गणित की समझ नहीं है । आगे वे एक महत्वपूर्ण बात लिखते हैं- ‘‘स्कूली पाठ्यक्रम में वैदिक गणित को सम्मिलित करना गणित के उस वास्तविक और सार्थक स्वरूप से ध्यान भटकाना होगा जिसे वास्तव में पढ़ाए जाने की आवश्यकता है ।’’

आई.आई.टी. चेन्नई में गणित की प्रोफेसर डॉ.(सुश्री) वसंत कांतसामी, जिनकी गणित पर 116 शोध-पुस्तकें लिखी हैं, ने वैदिक गणित पर शोध अध्ययन किया है । यह शोध 220 पृष्ठों के एक पुस्तक Vedic Mathematics -‘Vedic’ or‘Mathematics’:A Fuzzy & Neutrosophic Analysis  शीर्षक से 2006 में प्रकाशित हुई है। इन्होंने वैदिक गणित के संबंध में छात्रों, अध्यापकों, पालकों और उच्च शिक्षित व्यक्तियों के विचारों का एक नई गणितीय विधि से विश्लेषण किया है । इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि 90 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने वैदिक गणित को स्कूलों में अध्ययन-अध्यापन के लिए लाभदायक नहीं माना है ।

इनके अतिरिक्त और भी कई गणितज्ञों एवं वैज्ञानिकों ने वैदिक गणित को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने के प्रयास की आलोचना की है । उनके अनुसार वैदिक गणित 
में केवल ‘शार्टकट्स’ हैं जो प्रारंभिक कक्षाओं के कुछ ही परिकलनों में लागू होते हैं । उच्च गणित में इनका कोई व्यावहारिक उपयोग नहीं है ।

 इन सब के बावज़ूद यह न्यायालय का प्रकरण बन गया ।

सुप्रीम कोर्ट में स्कूली पाट्यक्रम के संबंध में शासन के विरुद्ध एक अपील दर्ज की गई थी । इस प्रकरण के संदर्भ में कोर्ट द्वारा 12 सितंबर, 2002 को दिए गए निर्णय में यह तथ्य भी है- ‘‘वैदिक गणित को पाठ्यक्रम का भाग नहीं बनाया गया है बल्कि इसे गणना सहायक सामग्री के रूप में उपयोग करने हेतु सुझाव दिया गया है । गणित शिक्षण के दौरान शिक्षक इसका उपयोग करने अथवा न करने के लिए स्वतंत्र है ।’’

इसी संदर्भ में एन.सी.ई.आर.टी. में गणित विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. हुकुम सिंह ने दिसंबर, 2016 में यह विचार व्यक्त किया था- ‘‘वैदिक गणित पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं होना चाहिए, यह निर्णय प्रसिद्ध गणितज्ञों से प्राप्त सुझावों के आधार पर लिया गया था ।’’

उक्त तथ्यों से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि विद्यालयों में वैदिक गणित नहीं पढ़ाया जाना चाहिए ।  कई राज्यों के स्कूली पाठ्यक्रमों में यह अभी भी सम्मिलित है, पढ़ाने की अनिवार्यता सहित ।

-महेन्द्र वर्मा







‘वैदिक गणित’ क्या सचमुच वैदिक है






जब मैं ज़िला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में कार्यरत था तब सेवारत शिक्षकों और प्रशिक्षु शिक्षकों को वैदिक गणित विषय पर प्रशिक्षण देने का अवसर प्राप्त हुआ था । हमें एक पुस्तक दी गई थी-‘वैदिक गणित’ । पुस्तक के शीर्षक से ऐसा ध्वनित होता है कि इस में जिस गणित का वर्णन है वह वेदों में है । कक्षा में प्रशिक्षण देने के पूर्व मैंने उसका अध्ययन किया । मुझे कुछ संदेह हुआ कि क्या यह सचमुच वैदिक है ?

और फिर मैंने अपने स्तर पर इस संदर्भ में खोजबीन करना आरंभ किया । इस प्रक्रिया में मुझे जो जानकारी मिली वह अप्रत्याशित नहीं थी ।

इस विषय की मूल पुस्तक Vedic Mathematics शीर्षक से 1965 में प्रकाशित हुई जिसके लेखक स्व. स्वामी श्री भारतीकृष्ण तीर्थ जी महाराज हैं जिसमें 16 ‘सूत्र’ दिए गए हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन स्वामी जी के स्वर्गारोहण के पश्चात  हुआ था । विद्यालयों में पढ़ाया जाने वाला ‘वैदिक गणित’ इसी पुस्तक पर आधारित है । वर्तमान में छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के अतिरिक्त कई राज्यों में स्कूली विद्यार्थियों को ‘वैदिक गणित‘ पढ़ाया जा रहा है लेकिन सर्वप्रथम इस विषय का शिक्षण उत्तरप्रदेश के विद्यालयों में सन् 1992 में प्रारंभ हुआ ।

1993 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के गणितज्ञ डॉ. एस.जी.दानी का अंग्रेज़ी में एक लेख फ्रंटलाइन पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। अपने विस्तृत लेख में एक स्थान पर वे लिखते हैं - ‘‘स्वामी जी की पुस्तक में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे वैदिक गणित कहा जाए । यहां तक कि इस में परवर्ती काल की भारतीय गणितीय सिद्धांतों और प्रक्रियाओं की समृद्ध परंपरा का भी वर्णन नहीं है ।’’ डॉ. दानी की इस टिप्पणी ने मुझे मूल पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित किया ।

मैंने मूलतः अंग्रेज़ी में लिखित  Vedic Mathematics का अध्ययन-मनन प्रारंभ किया । स्वामी जी पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं - ‘‘हम यह जान कर आश्चर्यचकित हुए कि अथर्ववेद के परिशिष्ट में उल्लेखित सूत्रों की सहायता से गणित के कठिन प्रश्नों को बहुत आसानी से हल किया जा सकता है ।’’ किंतु इसी पुस्तक में स्वामी जी की एक शिष्या श्रीमती मंजुला त्रिवेदी अपने वक्तव्य में लिखती हैं - ‘‘ये सूत्र अथर्ववेद के किसी परिशिष्ट में नहीं हैं, वास्तव में ये सूत्र अथर्ववेद में  यत्र-तत्र बिखरी हुई सामग्री से  स्वामी जी के द्वारा सहजबोध से पुनर्सृजित किए गए हैं ।’’

श्री वी. एस. अग्रवाल, जो इस पुस्तक के संपादक हैं, अपने संपादकीय लेख में इस से भिन्न बात लिखते हैं-‘‘स्वामी जी की यह कृति अपने आप में एक नया परिशिष्ट माने जाने का अधिकार रखती है और इसीलिए आश्चर्य नहीं कि यहां दिए गए सूत्र वेदों के किसी भी ज्ञात परिशिष्ट में उपलब्ध नहीं होते ।’’
उपर्युक्त तीनों बातों में कोई सामंजस्य नहीं है ।

पुस्तक के संपादक ने अपने संपादकीय में जिन विद्वानों के प्रति आभार व्यक्त किया है उनमें डॉ. ब्रजमोहन का भी नाम है जो उस समय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के गणित विभाग के अध्यक्ष थे । डॉ. ब्रजमाहन ने संपादक के आग्रह पर ‘वैदिक गणित’ की पाण्डुलिपि की गणनाओं की सत्यता की जांच की थी । मैंने डॉ. ब्रजमोहन की 1965 में प्रकाशित पुस्तक ‘गणित का इतिहास’ में इस का संदर्भ खोजना शुरू किया ।

अपनी पुस्तक की भूमिका में डॉ. ब्रजमोहन ने स्वामी जी के वैदिक सूत्रों के संबंध में यह लिखा है- ‘‘स्वामी जी ने अपने व्याख्यानों और व्यक्तिगत वार्ता में अनेक गणितीय सूत्रों की चर्चा की थी । स्वामी जी ने इन सूत्रों का यह अभिदेश दिया था : अथर्ववेद, परिशिष्ट 1 । मुझे अथर्ववेद के जितने भी संस्करण काशी के पुस्तकालयों में मिल सके,  मैंने सब छान मारे । मुझे उपरिलिखित सूत्र कहीं नहीं मिले । मैंने  स्वामी जी को इस विषय में तीन पत्र लिखे । मुझे कोई उत्तर नहीं मिला । तत्पश्चात मैं वेदों के उद्भट विद्वानों से मिला जैसे, पं. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी, और पंचगंगा घाट काशी के पं. रामचंद्र भट्ट । उन्होंने बताया कि उपरिलिखित सूत्रों की भाषा ही वैदिक संस्कृत से मेल नहीं खाती अतः ये वैदिक सूत्र नहीं हो सकते ।.....हम उक्त सूत्रों का वास्तविक अभिदेश जानने के लिए उत्सुक हैं । किंतु जब तक यथार्थ अभिदेश न मिल जाए तब तक हम इतनी अप्रमाणित बात अपनी पुस्तक में नहीं दे सकते ।’’

अस्तु, ‘वैदिक गणित’ के संपादक ने डॉ. ब्रजमोहन के उक्त जिज्ञासा का समाधान संपादकीय में यह लिखकर कर दिया था कि ये सूत्र अथर्ववेद के किसी भी परिशिष्ट में उपलब्ध नहीं हैं ।

‘वैदिक गणित’ के वैदिक न होने के संबंध में सन् 1993 से 2000 तक कई गणितज्ञों और वैज्ञानिकों के लेख अंग्रेज़ी अख़बारों में प्रकाशित हुए । इन के प्रत्युत्तर में सन् 2000 में वार्षिक शोध पत्रिका ‘संबोधि’ में संपादक डॉ. एन.एम.कंसारा ने  Vedic Sources of Vedic Mathematics शीर्षक से 30 पृष्ठों का एक लेख लिखा । किंतु इस लेख में वे ‘वैदिक गणित’ को वैदिक सिद्ध नहीं कर सके और लेख के अंत में उन्होंने निष्कर्ष लिखा कि ये सूत्र वेदों में एक स्थान पर नहीं है बल्कि यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं । श्री कंसारा इस ‘यत्र-तत्र’ का एक भी संदर्भ नहीं दे पाए ।

अब यह निश्चित हो गया कि ‘वैदिक गणित’ के किसी भी अंश का वैदिक साहित्य में कोई संदर्भ नहीं है । अब मैंने ‘यत्र-तत्र’ को ध्यान में रखते हुए पांचवी शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक के मध्यकालीन भारतीय गणितज्ञों के प्राचीन ग्रंथों में इसका संदर्भ खोजना प्रारंभ किया ।

अपने अध्ययन के दौरान मुझे कुछ संदर्भ मिले । ‘वैदिक गणित’ में एक सूत्र है- ‘ऊर्ध्व तिर्यग्भ्याम्’, इस सूत्र का पुस्तक में व्यापक प्रयोग हुआ है । इस सूत्र में जिस एल्गोरिद्म का प्रयोग हुआ है वह महान भारतीय गणितज्ञ महावीराचार्य (9वीं शताब्दी ई).की प्रसिद्ध पुस्तक ‘गणित सार संग्रह’ (2.31) में है ।
स्वामी जी का एक उपसूत्र ‘यावदूनम्’ का एल्गोरिद्म ब्रह्मगुप्त (7 वीं श,) के ‘ब्राह्मस्फुट सिद्धांत’ (12.55,64) में तथा भास्कराचार्य द्वितीय की  प्रसिद्ध पुस्तक ‘लीलावती’ (सू. 13.9) में है । बोधायन के शुल्व सूत्र के प्रसिद्ध प्रमेय, जिसे अब पायथोगोरस का प्रमेय कहा जाता है, की जो उपपत्ति ‘वैदिक गणित’ में दी गई है वह वास्तव में भास्कराचार्य द्वितीय द्वारा दी गई उपपत्ति है ।

इतना अवश्य है कि स्वामी जी ने अपनी पुस्तक में गणितीय नियमों को ‘ट्रिक्स’ और ‘शार्टकट्स’ में परिवर्तित किया है ।
मेरे संदेह का समाधान हो चुका है । आपको भी इस लेख के शीर्षक-प्रश्न का उत्तर प्राप्त हो गया होगा ।

-महेन्द्र वर्मा

झूठ का सच



यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति यदा-कदा अनेक कारणों से झूठ बोलता है किंतु जब यह किसी व्यक्ति के लिए आदत या लत बन जाती है तो समाज में वह निंदा का पात्र बन जाता है । कोई भी व्यक्ति नहीं चाहता कि कोई उसे झूठ बोलकर धोखा दे । आदतन झूठा वह आदमी होता हे जो पहले भी झूठ बोलता था, अभी भी झूठ बोल रहा है और आगे भी झूठ बोलेगा ।

यदि कोई ऐसी बात कहता है जिसके बारे में बोलने वाले को भी विश्वास नहीं होता कि यह सच है फिर भी इस इरादे से बोलता है कि सुनने वाले उस बात को सच मान लें, झूठ बोलने का यही तात्पर्य है । स्पष्ट है कि झूठ में बेइमानी और धोखा दोनों शामिल हैं ।


चूंकि ‘झूठ बोलना’ मानव व्यवहार से संबंधित है इसलिए मनावैज्ञानिकों ने इस विषय पर भी पर्याप्त अध्ययन किया है । झूठ के संबंध में पहले जो चिंतन था वह नैतिकता और धार्मिकता पर आधारित था और उपदेशपरक था । लेकिन हाल के वर्षों में मनोवैज्ञानिकों ने यह जानने की कोशिश की है कि मनुष्य झूठ बोलता क्यों है और कौन-सी चीज उसे झूठ बोलने के लिए प्रेरित करती है।

झूठ बोलने के संबंध में सबसे पहले व्यवस्थित रूप से अध्ययन कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के समाज मनोविज्ञानी बेला डे पाउलो और उसके साथियों ने दो दशक पहले प्रारंभ किया था । पाउलो ने अपनी पुस्तक The Psychology of Lying में झूठ बोलने के कारणों का उल्लेख किया है ।  A  National Geographic  पत्रिका के जून 2017 के अंक में इस विषय पर कवर स्टोरी प्रकाशित की थी । मनोवैज्ञानिकों के अनुसार लोग अलग-अलग कारणों से झूठ बोलते हैं -
 1. अपनी गलती और अपराध को छिपाने के लिए, 2. स्वयं को इच्छित मुकाम में प्रतिष्ठित करने के लिए, 3. दूसरों को भ्रमित कर प्रभावित करने के लिए, 4. व्यक्तिगत लाभ के लिए, 5. सच्चाई को उपेक्षित करने के लिए 6. कुछ लोगों को नुकसान पहुंचाने के लिए, 7. मज़ाक करने के  लिए, 8. अन्य कारणों से ।

American Journal of Forensic Psychiatry  में प्रकाशित एक लेख और टेक्सास यूनीवर्सिटी की मनावैज्ञानिक जैकलीन इवान्स और उनके सहयोगियों के अनुसार झूठ बोलने वालों के कुछ लक्षण इस प्रकार हैं -
1.उनकी सोच अस्थिर होती है, 2. स्वयं के बारे में संक्षिप्त जानकारी देते हैं या छिपाते हैं, 3.‘क्यों’ का उत्तर देने से बचते हैं, 4. उत्तर देने के पूर्व सवाल को दुहराते हैं, 5. बोलते समय ‘पिच’ में असाधारण परिवर्तन होता रहता है,  6.ऐसा प्रदर्शित करते हैं जैसे वे बहुत परिश्रम करते हैं, 5. उनके कथन निरर्थक और विरोधाभासी होते हैं, 7. वे चिंतित और तनावग्रस्त रहते हैं, 6. उनमें हीन भावना होती है ।

मनोविज्ञानी शेली टेलर के अनुसार, झूठ बोलने वाले आत्ममुग्ध होते हैं । भाषा पैटर्न पर शोध करने वाले मनोविज्ञानी डायना बेरी के अनुसार झूठ बोलने और लिखने वाले प्रायः अपनी बातों में ‘प्रथम पुरुष’ का प्रयोग करते हैं । डे पाउलो ने अपने शोध में पाया कि ऐसे लोग अक्सर विवादित रहते हैं । हार्वर्ड में मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ. ग्राम्ज़ो के अनुसार झूठ बोलना मूल रूप से स्वयं को एक लक्ष्य की ओर स्वयं को प्रोजेक्ट करने और अपनी इच्छाओं को पोषित करने की कवायद है ।

Nature Neuroscience  में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि झूठ बोलते समय व्यक्ति के मस्तिष्क का ‘प्रोत्साहन केन्द्र’ सक्रिय हो जाता है । इससे प्रेरित होकर वह अपने व्यवहार में निरंतर झूठ बोलने या धोखा देने का पैटर्न जारी रखता है । टेक्सास विश्वविद्यालय की विभागीय पत्रिका Personality and Social Psychology  की एक रिपोर्ट के अनुसार झूठे लोग जोड़-तोड़ करने वाले और ‘मेकियावेलियन’ होते हैं । मनोविज्ञान में ‘मेकियावेलियन’ शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए किया जाता है जो स्वयं की इच्छा और लक्ष्य की पूर्ति के लिए दूसरों के साथ धोखा, छल-कपट और हिंसा तक का व्यवहार करता है ।

चिकित्सा मनोविज्ञान में Pseudologia Fantastica मनुष्य की ऐसी असामान्य मनःस्थिति को कहा जाता है जब व्यक्ति झूठ बोलने का आदी हो या बाध्य हो । इसी तरह की एक और स्थिति को Mitomanía  कहते हैं जिसमें व्यक्ति की अतिशयोक्तिपूर्ण झूठ बोलने की असामान्य प्रवृत्ति होती है । मनोचिकित्सकों के अनुसार ये मानसिक रोग कुण्ठा और हीनभावनाग्रस्त व्यक्ति को होने की अधिक संभावना होती है। ऐसे लोग स्वयं की झूठी प्रतिष्ठा के लिए चतुराई से इस तरह बार-बार झूठ बोलते हैं कि लोग उसका विश्वास करें ।

लगभग 200 वर्ष पूर्व आयरलैंड के प्रसिद्ध साहित्यकार जोनाथन स्विफ्ट ने  Essay on the Art of Political Lying   में एक विचित्र बात लिखी है- ‘‘ जिस प्रकार एक बड़ा लेखक अपने पाठकों को नापसंद करता है उसी प्रकार एक बड़ा झूठा अपने ही विश्वासियों को नापसंद करता है ।’’

-महेन्द्र वर्मा

सच क्या है


आज से तीन-चार लाख वर्ष पूर्व, जब मनुष्य अपने विकास की प्रारंभिक अवस्था में था, तब किसी समय एक घटना घटित हुई । इस घटना की प्रतिक्रिया दो रूपों में व्यक्त हुई ।

उस घटना को पहले जान लें -

जंगल में दो मनुष्य भोजन की तलाश में जा रहे थे । उन्होंने देखा कि कुछ दूरी पर एक मनुष्य कंदमूल खोज रहा था तभी झाड़ियों में छिपे एक शेर ने उस पर आक्रमण कर दिया और उसे मार डाला । दोनों मनुष्य भयभीत हो गए । वे तत्काल अपनी गुफा में लौट आए ।

चूंकि उनमें अन्य प्राणियों की तुलना में कुछ अधिक सोचने की क्षमता विकसित हो गई थी इसलिए उन दोनों के मन में भयजनित सोच की एक प्रक्रिया शुरू हुई कि शेर किसी दिन उन पर भी आक्रमण कर देगा और उन्हें खा जाएगा । वे सोचने लगे कि शेर की भयकारक शक्ति से बचाव कैसे किया जाए । आत्मरक्षा की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से उनमें थी ।

उन दोनों की सोचने की दिशा अलग-अलग थी । एक ने सोचा, शेर किसी अदृश्य शक्ति द्वारा प्रेरित है । यदि उस शक्ति को किसी तरह प्रसन्न कर दिया जाए तो उसके द्वारा प्रेरित वह शेर मुझ पर आक्रमण नहीं करेगा । उस मनुष्य ने अदृश्य शक्ति को प्रसन्न करने के लिए मन ही मन एक ‘प्रार्थना’ बनाई । अगले दिन कुछ कंदमूल लेकर वह एक स्थान पर गया, कंदमूल उस अदृश्य को समर्पित करते हुए प्रार्थना की कि आप इस भयानक शेर से मेरी रक्षा करें । वह निश्चिंत हो गया कि शेर अब मुझ पर आक्रमण नहीं करेगा । मनुष्य के मन में कुछ शांति की अनुभूति हुई ।

लेकिन दूसरा मनुष्य कुछ अलग सोच रहा था । वह शेर को ही पराजित करने का उपाय सोच रहा था । जंगल में घूमते समय उसे अनुभव हुआ था कि जब शरीर पर कांटा चुभता है तो कष्ट होता है । फिसल कर गिर जाएं तो नुकीले पत्थरों से चोट लग जाती है । इसी अनुभव से प्रेरित होकर उसने सोचा कि यदि शेर पर भी नुकीले पत्थर से वार किया जाए तो शेर भयभीत हो सकता है । अपने इस विचार पर उसने ‘प्रयोग’ किया । लकड़ी के  सीघे टुकड़े के एक छोर पर उसने एक नुकीला पत्थर लताओं से बांध दिया । उसे एक पेड़ की तरफ जोर से फेंका । वह यह देखकर संतुष्ट हुआ कि पत्थर का टुकड़ा पेड़ के तने में घंस गया है ।

दोनों अगले दिन जंगल में जा रहे थे । वह शेर फिर दिखा । शेर ने उन दोनों को देख लिया और उनकी तरफ तेजी से दौड़ा । पहला मनुष्य आंख बंद कर ‘प्रार्थना’ करने लगा । दूसरे ने अपना स्वनिर्मित साधन शेर की ओर फेंका । शेर को चोट लगी । वह डरकर भाग गया । पहले मनुष्य ने आंखें खोलीं, देखा, शेर वहां नहीं था । अदृश्य शक्ति के प्रति उसके मन में ‘आस्था’ उत्पन्न हुई । उसे विश्वास हुआ कि उसकी ‘अदृश्य शक्ति से प्रार्थना’ के कारण ही शेर डर गया । लेकिन सत्य क्या है, ये दूसरा मनुष्य ही जानता था जिसे अपनी ‘तार्किक शक्ति’ पर विश्वास था ।


विज्ञान और धर्म का ‘रोपण’ आदिम मनुष्यों के द्वारा एक ही समय में हुआ ।

पहले मनुष्य ने जिस पौधे का रोपण किया उसके वंशजों ने उसे सिंचित किया, बड़ा किया । लेकिन पांच हजार वर्ष पूर्व उस वृक्ष की कलमें काट-काट कर लोग अपने-अपने क्षेत्र में लगाने लगे और उसे भिन्न-भिन्न नाम भी देने लगे।  । ‘प्रार्थनाएं‘ भी अलग-अलग बन गईं और अलग-अलग ‘कंदमूल’ भी ।

दूसरे मनुष्य ने जो पौधा रोपा उसे भी उसके वंशजों ने सिंचित किया । लेकिन उसकी कलमें काट कर किसी ने अलग पौधा नहीं उगाया । आज भी संसार के सभी लोग उसी आदिम वृक्ष की छांव में एक साथ खड़े हैं ।
धर्म भेदभाव करता है, विज्ञान नहीं ।

उस मनुष्य ने जो ‘प्रार्थना’ की वह कौन-सी थी, आज कोई नहीं जानता । लेकिन दूसरे मनुष्य ने जो साधन बनाया वह वास्तव में आज के यांत्रिक भौतिकी के छः मूलभूत सरल मशीनों में से दो के प्रयोग की शुरुआत थी जिनको 
विज्ञान का प्रत्येक विद्यार्थी जानता है ।

सत्य की ‘कलमें’ नहीं लगाई जा सकतीं ।

-महेन्द्र वर्मा

धूप, चांदनी, सीप, सितारे




सच्चाई की बात करो तो, जलते हैं कुछ लोग,
जाने कैसी-कैसी बातें, करते हैं कुछ लोग।

धूप, चांदनी, सीप, सितारे, सौगातें हर सिम्त,
फिर भी अपना दामन ख़ाली, रखते हैं कुछ लोग।

उसके आँगन फूल बहुत है, मेरे आँगन धूल,
तक़दीरों का रोना रोते रहते हैं कुछ लोग।

इस बस्ती से शायद कोई, विदा हुई है हीर,
उलझे-उलझे, खोए-खोए, दिखते हैं कुछ लोग।

ख़ुशियाँ लुटा रहे जीवन भर, लेकिन अपने पास,
कुछ आँसू, कुछ रंज बचाकर, रखते हैं कुछ लोग।

इतना ही कहना था मेरा, बनो आदमी नेक,
हैराँ हूँ , यह सुनते ही क्यूँ , हँसते हैं कुछ लोग।

जुल्म ज़माने भर का जिसने, सहन किया चुपचाप,
उसको ही मुज़रिम ठहराने लगते हैं कुछ लोग।


                                                                -महेंद्र वर्मा

भविष्यकथन - एक दृष्टि









आजकल टेलीविज़न के चैनलों में भविष्यफल या भाग्य बताने वाले कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है । स्क्रीन पर विचित्र वेषभूषा में राशिफल या लोगों की समस्याओं के समाधान बताते ये लोग भविष्यवक्ता कहे जाते हैं । क्या ये सचमुच भविष्य की घटनाओं को पहले से जान लेते हैं ? क्या इनके पास सचमुच कोई ऐसी विद्या है जिससे ये लोगों के भविष्य को जानकर उसमें आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए उपाय भी बता सकें ?

इन प्रश्नों के उत्तर मनुष्य की प्रकृति और स्वभाव में निहित हैं।

अपने भविष्य के बारे में जानने की इच्छा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है ।  वह यह देखता आया है कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन में सुख और दुख, शांति और अशांति जैसी सकारात्मक और नकारात्मक स्थितियां अनिवार्य रूप से आती जाती रहती हैं । किंतु वह सुख की चाह की अपेक्षा इस बात की कामना अधिक करता है कि उसके जीवन में दुख न आए । उसके अवचेतन मन में भविष्य में आ सकने वाले दुख और अशांति के प्रति भय और चिंता बनी रहती है । यही भय उसे यह जानने के लिए प्रवृत्त करता है कि उसका भविष्य कैसा होगा, सुख-शांति की स्थितियां अधिक होंगी या दुख-अशांति की ।

हज़ारों साल पहले से मनुष्य पशु-पक्षी की आवाजों के साथ भविष्य में होने वाली घटनाओं का संबंध जोड़ने लगे थे । फिर जैसे-जैसे उसकी समझ, साथ ही नासमझी भी, बढ़ती गई वैसे-वैसे भविष्य जानने के नए-नए तरीके भी ईजाद होने लगे । आज पूरी दुनिया में भविष्य जानने के सैकड़ों तरीके प्रचलन में हैं । भारत में ही भविष्य बताने के 150 से अधिक विधियां प्रचलित हैं । जन्म कुंडली, हस्तरेखा, रमल, टैरो कार्ड, क्रिस्टल बॉल, अंक ज्योतिष, स्वप्न, मुखाकृति आदि से लेकर तोता, बैल, उल्लू, गधा आदि के माध्यम से भी भविष्यफल बताए जाते हैं ।

भविष्यफल बताने के ये तरीके तब और फलने-फूलने लगे जब भविष्यवक्ताओं ने अशुभ फलों को दूर करने या कम करने के उपाय भी बताना शुरू किया । हज़ारों साल पहले टोटेम के रूप में शुरू हुई इस परम्परा को बाद में भविष्यवक्ताओं ने शास्त्र कहा और अब वे इसे विज्ञान कहने लगे हैं । लेकिन वैज्ञानिकों ने इस ‘विद्या’ को कभी विज्ञान मानने लायक नहीं समझा क्योंकि यह विज्ञान है ही नहीं ।

भविष्यकथन विज्ञान न होने के बावजूद लोगों को क्यों कुछ भविष्यफल बिल्कुल सही प्रतीत होते हैं । इसका कारण है -भविष्य कथन की भाषा । इसकी भाषा कुछ इस प्रकार की होती है कि पढ़ने-सुनने वाला  उस कथन के अर्थों की  संगति स्वयं के साथ  आसानी से स्थापित कर लेता है । कुछ उदाहरण देखिए - आपका व्यक्तित्व आकर्षक है/आप अपनी ज़िंदगी अपने अंदाज़ में जीना चाहते हैं/व्यापार में सावधानी बरतें/बाधाएं आएंगी किंतु प्रयास करेंगे तो सफलता निश्चित है/अमुक अवधि में आपको अकस्मात धनलाभ होगा/व्यय पर नियंत्रण रखें/किसी परिजन के बीमार होने के कारण आप चिंतित रहेंगे/इस महीने व्यय की अधिकता रहेगी, आदि ।

ये ऐसे कथन हैं जिन्हें दुनिया का कोई भी व्यक्ति पढ़ेगा या सुनेगा तो उसे लगेगा कि ये उसके बारे में बिल्कुल सही कहा जा रहा है । आप में से जो भविष्यफल पढ़ने में रुचि रखते हैं वे कभी सभी बारह राशियों का भविष्यफल पढ़ कर देखें, आपको लगेगा कि सभी कथन आप पर भी लागू हो सकते हैं । भविष्यवक्ताओं द्वारा जानबूझ कर ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाता है ।

कुछ भविष्यकथन बिल्कुल सही होते देखे गए हैं । इसका कारण है संभाव्यता, अर्थात किसी घटना के घटित होने की संभावना । यदि किसी भविष्यवक्ता ने अपने 100 ग्राहकों को यह बताया कि अगले वर्ष आपके विवाह का योग है तो इस स्थिति में प्रत्येक के लिए केवल दो संभावनाएं हैं - विवाह होगा या नहीं होगा, इनमें से एक सही होगा ही । अर्थात 2 संभावनाओं में से 1 निश्चित ही घटित होगा । यानी 100 में से 50 या 50 प्रतिशत । इसी संभाव्यता के कारण कुछ भविष्यकथन सही होते पाए गए हैं । लेकिन इसमें ज्योतिषी के ज्ञान की कोई भूमिका नहीं है । साधारण शब्दों में ये तीर-तुक्का वाली बात है ।

यदि कोई भविष्यफल नकारात्मक हो तो उसके निवारण के लिए कई प्रकार के उपाय भविष्यवक्ताओं के द्वारा बताए जाते हैं । जो लोग उपाय करते हैं उनमें से कुछ को सफलता मिल जाती है, इसके पीछे भी संभाव्यता और संयोग का सिद्धांत लागू होता है । एक कारण और है- उपाय करने के बाद लोग आश्वस्त हो जाते हैं, उनका आत्मविश्वास और आत्मबल बढ़ जाता है । फलस्वरूप वे कार्य की सफलता या लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अधिक प्रयास  करते हैं और कुछ को सफलता मिल भी जाती है । इस सफलता में उपाय की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती बल्कि व्यक्ति द्वारा किया गया प्रयास ही मुख्य कारक होता है ।

स्वामी विवेकानंद ने कुछ सोचकर ही ये कहा होगा - ‘‘फलित ज्योतिष को  महत्व देना  अंधविश्वास है, इसने मनुष्यों को बहुत हानि पहुंचाई है (The Complete Works of Swami Vivekananda/Volume 8/Notes Of Class Talks And Lectures/Man The Maker Of His Destiny ) ।’’

-महेन्द्र वर्मा

समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की दुर्दशा






आम तौर पर यह समझा जाता है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का संबंध केवल वैज्ञानिकों से है,  ऐसा बिल्कुल नहीं है । वास्तव में वैज्ञानिक दृष्टिकोण जीवन जीने का एक तरीका है ( सोचने की एक व्यक्तिगत और सामाजिक प्रक्रिया ) जो वैज्ञानिक विधि का उपयोग करता है और जिसके परिणामस्वरूप, प्रश्न पूछना, वास्तविकता का अवलोकन, परीक्षण, विश्लेषण, परिकल्पना, समीक्षा और निष्कर्ष तय करना शामिल होता है । “वैज्ञानिक दृष्टिकोण“ एक ऐसे दृष्टिकोण का वर्णन करता है जिसमें तर्क का उपयोग शामिल है। चर्चा, तर्क और विश्लेषण वैज्ञानिक दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण भाग हैं। निष्पक्षता, समानता और लोकतंत्र के तत्व इसमें समाहित हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सत्य और नए ज्ञान की खोज करने, परीक्षण करने, परीक्षण के बिना कुछ भी स्वीकार करने से इनकार करने, नए साक्ष्य के सामने पिछले निष्कर्षों को बदलने,  पूर्व-अनुमानित सिद्धांत को नहीं बल्कि तार्किक तथ्य को स्वीकार करने और मष्तिष्क को अनुशासित करने के लिए आवश्यक है । यह केवल विज्ञान के लिए ही नहीं बल्कि जीवन के लिए और इसकी कई समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक है ।

इसीलिए हमारे संविधान में भी ( भाग 4क, मूल कर्तव्य, 51क ) उल्लेखित है - ‘‘भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे ।’’ यह संविधान के उसी अनुच्छेद में उल्लेखित है जिसमें संविधान का पालन करने, उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करने की बात कही गई है ।

अब प्रश्न यह है कि क्या हम ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ संदर्भ में संविधान का पालन कर रहे हैं ?

इस प्रश्न का उत्तर जानने का प्रयास करें कि इस संबंध मे हम आज क्या कर रहे हैं-
   

जब विज्ञान की प्रगति होने लगी, दुनिया भर के वैज्ञानिक नए-नए आविष्कार और खोज करने लगे तो हमारे देश में कुछ लोगों ने यह कहना शुरू किया कि अमुक खोज या आविष्कार का वर्णन तो हमारे प्राचीन ग्रंथों में पहले से ही है । कुछ ने कहा कि हमारे प्राचीन ग्रंथों को पढ़कर ही वैज्ञानिक खोज करते हैं और अपना नाम दे देते हैं । आजकल यह प्रवृत्ति कुछ अधिक दिखाई दे रही है । मीडिया के सभी साधनों में इस तरह की चर्चाएं आम बात हो गई है।

अभी हाल ही में सोशल मीडिया में एक लेखक-पत्रकार ने एक पोस्ट में लिखा - ‘‘काश, स्कूली पाठ्यक्रम में वेद-शिक्षा पर ज़ोर दिया जाता तो समझ में आता कि दुनिया की प्रगति का आधार वेद है ।’’आगे उन्होंने फिर लिखा - ‘‘आज दुनिया जितनी विकसित नज़र आ रही है उसका आधार वेद है ।’’

एक प्रसिद्ध वक्ता ( इनका निधन हो चुका है, इनके भाषणों के वीडियो इंटरनेट पर मौज़ूद हैं ) ने कहा है- ‘‘सम्राट हर्षवर्धन पहले वैज्ञानिक था, बाद में राजा हुआ । इस वैज्ञानिक राजा ने कृत्रिम बर्फ़ बनाने की तकनीक का आविष्कार किया ।’’ वक्ता के अनुसार, ‘‘संस्कृत कवि बाणभट्ट के ‘हर्षचरित’ में कृत्रिम बर्फ़ बनाने की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन है ।’’
उक्त वक्ता का यह कथन नितांत असत्य है। हर्षचरित में इस तरह का कोई उल्लेख नहीं है । हर्ष वैज्ञानिक नहीं थे और न ही उसने कृत्रिम बर्फ बनाई ।

तथाकथित लेखक और  पत्रकार ही नहीं, हमारे देश के कुछ नीति-नियामक भी इस संबंध में ऐसी बातें कहते रहे हैं, जो लोगों के बीच खूब चर्चित हुए । वैज्ञानिक खोजों के संदर्भ में इनके कुछ कथन देखिए-

"भारतीय ऋषि अपनी योगविद्या के द्वारा दिव्यदृष्टि प्राप्त कर लेते थे, इसमें कोई संदेह नहीं कि टेलीविज़न के आविष्कार का संबंध इससे है/डार्विन का सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से गलत है । हमारे पूर्वजों सहित किसी ने भी मौखिक या लिखित रूप से यह नहीं कहा कि उन्होंने बंदर को आदमी के रूप में बदलते देखा है/गाय ऑक्सीजन छोड़ती है/महर्षि कणाद ने अपने समय में एक परमाणु परीक्षण किया था/ज्योतिष सबसे बड़ा विज्ञान है, हमें इसे विज्ञान से भी ज्यादा प्रोत्साहित करना चाहिए/महाभारत कहता है कि कर्ण अपनी माता के गर्भ से उत्पन्न नहीं हुआ था, इसका अर्थ यह है कि उस समय जेनेटिक साइंस मौज़ूद था/सकारात्मक चिंतन के द्वारा बीजों की क्षमता को बढ़ाना- यौगिक खेती के पीछे यही अवधारणा है/गाय के गोबर और गोमूत्र से कैंसर की चिकित्सा की जा सकती है ।"

इन बातों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संविधान में प्रावधान के संदर्भ में विचार करें तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि इस तरह के विचार अवैज्ञानिक हैं, समाज हितकारी नहीं हैं और संविधान की भावना का उल्लंघन है ।
समाज का कोई जिम्मेदार व्यक्ति जब ऐसी सोच को प्रचारित करता है तो एक आम व्यक्ति तो उसका अनुकरण करेगा ही । इस तरह के विचारों के अलावा और भी बहुत से ऐसे अंधविश्वास हैं जिसे मीडिया प्रश्रय दे रहा है जो समाज को पांच हजार साल पीछे ले जाने की कोशिश कर रहा है । यह समाज के हर वर्ग के लिए धीमा जहर है जो घातक है ।

वास्तव में जिन भारतीय वैज्ञानिकों और गणितज्ञों ने अपनी खोजों से विश्व-समुदाय को महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिन पर हम गर्व करना चाहिए,  उनकी चर्चा प्रायः नहीं होती कि वे कौन थे , उन्होंने कौन से आविष्कार किये, उनके आविष्कार का क्या महत्व है, उनका समाज के प्रति क्या दृष्टिकोण था आदि । यह एक अलग आलेख का विषय है ।

यदि हम एक स्वस्थ समाज चाहते हैं तो हमें अवैज्ञानिक प्रवृत्ति से छुटकारा पाना ही होगा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तथ्यों को समझना होगा क्योंकि यह हमारा संवैधानिक और लोकतांत्रिक  कर्तव्य है और इसलिए मानवीय भी।

-महेन्द्र वर्मा










अंधविश्वास का मनोविज्ञान






एक वाक्य में अंधविश्वास को परिभाषित करना मुश्किल है क्योंकि इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है । मोटे तौर पर कह सकते हैं कि ‘तर्कहीन विश्वास’ अंधविश्वास है । अपने विकास क्रम में जब मनुष्य थोड़ा सोचने-समझने लायक हुआ तब ज्ञान और तर्क का जन्म नहीं हुआ था । इन के अभाव में घटनाओं की मनमानी व्याख्या की जाती थी। आश्चर्य है कि आज पचास हज़ार साल बाद भी यह परंपरा जारी है।

गत तीन-चार सदियों में ज्ञान के अप्रत्याशित विस्फोट के बावज़ूद घटनाओं की तर्कहीन व्याख्या के पीछे मनुष्य की आदिम प्रवृत्तियां रही हैं। लोभ, स्वार्थ, सुख की चाह, दुख की चिंता, अस्तित्व की असुरक्षा का भय जैसी प्रवृत्तियां अंधविश्वास के जनक और पोषक हैं । इन प्रवृत्तियों से कुछ द्वितीयक प्रवृत्तियां विकसित होती हैं, जैसे -  परंपराओं से चिपके रहने का मोह, सदियों पुराने तथाकथित तर्कहीन ‘ज्ञान’ को ही अंतिम सत्य मानने की जड़ता, नए तार्किक ज्ञान की उपेक्षा, किसी अज्ञात शक्ति का भय आदि।

पिछले सौ वर्षों में मनोविज्ञान ने काफ़ी प्रगति की है । अंधविश्वास के कारणों पर बहुत सारी नई जानकारियां उद्घाटित हुई हैं । यह जानने की कोशिश की गई है कि कुछ लोग अंधविश्वासी क्यों होते हैं ? क्या कुछ अंधविश्वास लाभ भी पहुंचाते हैं ? कुछ पढे-लिखे लोग भी अंधविश्वासी क्यों होते हैं ?

मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोधों के कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष इस प्रकार हैं -

1.    मनुष्य अपने पूर्वज्ञान के आधार पर घटनाओं की व्याख्या करता है । यदि उसका पूर्वज्ञान सीमित होगा तो उसका निष्कर्ष भी त्रुटिपूर्ण होगा । व्यापक अध्ययन की कमी लोगों को अंधविश्वासी बनाती है ।
2.    कुछ लोग स्वभाव से अतार्किक होते हैं । किसी घटना के कारण को जानने के लिए  तर्क का प्रयोग नहीं करते । अपने संस्कारगत स्वाभाविक जानकारी के आधार पर निष्कर्ष तय कर लेते हैं । ये संस्कार पीढ़ियों पुराने होते हैं ।
3.    स्वयं के भविष्य के प्रति अनिश्चितता पर  नियंत्रण रखने की कोशिश, असहाय होने की भावना को, तनाव और चिंता को कम करने का प्रयास जैसे कारक भी अंधविश्वास के पोषक हैं ।
4.    यदि किसी व्यक्ति के मन को ‘वर्तमान में जितना है उससे अधिक पाने की लालसा’ उद्वेलित करती रहती है तो उसके अंधविश्वासी होने की संभावना अधिक होती है ।
5.    स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य, शुभ-अशुभ जैसी धारणाएं भी मनुष्य को अंधविश्वासी बना सकती हैं ।
6.    कुछ व्यक्तियों के लिए किसी सर्वोच्च अदृश्य शक्ति पर सच्ची आस्था मनोवैज्ञानिक रूप से लाभदायक हो सकती है किंतु ऐसी अवस्था में भी यदि मन में अंधविश्वास प्रवेश करता है तो इसका कारण अज्ञानता और भय ही है । अंधविश्वासी व्यक्ति जिज्ञासु नहीं होता ।
7.    प्रत्येक ‘कार्य’ का ‘कारण’ अवश्य होता है, यदि कोई व्यक्ति कार्य के पीछे का कारण नहीं समझ पाता तो उस व्यक्ति में अंधविश्वास का प्रवेश हो सकता है ।

ज्ञान की निरंतर प्रगति के बावजू़द अंधविश्वास का कम न होना मानव सभ्यता के लिए चिंताजनक है । प्राचीन ज्ञान के वे अंश जो मानव मूल्यों को पोषित करते हैं निस्संदेह आज भी उपयोगी हैं, किंतु उन पर विश्वास और अमल  नहीं के बराबर हो रहा है । इसके विपरीत उन रूढिवादी और कट्टर मान्यताओं का प्रचार अधिक हो रहा है जो मानव मूल्यों के विपरीत हैं । अंधविश्वास की आड़ में व्यक्ति से लेकर देश और विश्व के स्तर तक बढ़े पैमाने पर ठगी का व्यापार फल-फूल रहा है ।

एक अंधविस्वासी सच्चे ज्ञान पर विश्वास नहीं कर पाता । स्वामी विवेकानंद ने कहा था - ‘‘अंधविश्वासी मूर्ख होने की बजाय अनीश्वरवादी होना ज़्यादा अच्छा है । अंधविश्वास कमजोर लोगों की पहचान है। इसलिए इससे सावधान रहो, सक्षम बनो ।’’







  
-महेन्द्र वर्मा