Oct 14, 2010

अल्प अहार सुल्प सी निद्रा

गुरु गोविंदसिंह जी का एक पद


गुरु गोविंदसिंह जी सिख धर्म के दसवें गुरु थे। इनका जन्म 15 दिसंबर सन् 1666 ई. को बिहार के पटना नगर में हुआ था। आप नौवें गुरु तेगबहादुर जी के पुत्र थे। आपको संस्कृत, फारसी, ब्रज आदि भाषाओं का ज्ञान था। अपने जन्म तथा प्रारंभिक वर्षों का गुरुजी ने अपने आत्मकथात्मक काव्य विचित्र नाटक में वर्णन किया है। गुरु गोविंदसिंह जी निरंजन, निराकार परमात्मा में विश्वास करते थे। इन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की। इस पंथ में जात-पात का बंधन नहीं है। गुरुजी ने मनुष्य शरीरधारियों को गुरु बनाने की परम्परा समाप्त कर दी और आदेश दिया कि आदिग्रंथ साहिब को ही गुरु मानें। उन्होंने 40 रचनाओं का सृजन किया। वे स्वयं तो काव्य रचना करते ही थे, अपने संरक्षण में रहने वाले कवियों को भी काव्य सृजन के लिए प्रोत्साहित करते थे। आप एक सच्चे समाज सुधारक, और दूरदर्शी संत थे। गुरु गोविंदसिंह जी ने जीवन भर संघर्ष कर अन्याय और अत्याचार से लोगों को मुक्ति दिलाई। उनके चारों बेटे सच्चे धर्म के नाम पर बलिदान हो गए। उन्होने सन् 1708 ई. में देह त्याग दिया। प्रस्तुत है गुरु गोविंदसिंह जी का एक पद-

रे मन ऐसो करि सन्यास।
बन से सदन सबै करि समझहु,
मन ही माहिं उदास।
जत की जटा जोग की मंजनु,
नेम के नखन बढ़ाओ।
ग्यान गुरु आतम उपदेसहु,
नाम विभूति लगाओ।
अल्प अहार सुल्प सी निद्रा,
दया छिमा तन प्रीत।
सील संतोख सदा निरबाहिबो,
व्हैबो त्रिगुन अतीत।
काम क्रोध हंकार लोभ हठ,
मोह न मन सो ल्यावै,
तब ही आत्म तत्त को दरसै
परम पुरुष कहं पावै।

11 comments:

सुज्ञ said...

ज्ञानवंत गुरूओं को प्रणाम!!

काम क्रोध हंकार लोभ हठ,
मोह न मन सो ल्यावै,
तब ही आत्म तत्त को दरसै
परम पुरुष कहं पावै।

ZEAL said...

.

काम क्रोध हंकार लोभ हठ,
मोह न मन सो ल्यावै,
तब ही आत्म तत्त को दरसै
परम पुरुष कहं पावै।...


सुन्दर संकलन !

आभार !

.

हरकीरत ' हीर' said...

सब कुछ तो कह दिया गुरु जी इस शब्द में ...
जीवन जीने का ढंग ,रहने का ढंग .खाने का ढंग ....
पर हम फिर भी इस मायामी संसार से निकल नहीं पाते ....
ये शब्द फिल्म ''नानक नाम जहाज़ है ''में बहुत ही मधुर कंठ से गया गया है ....!!

shikha kaushik said...

reapected sir; aap jo bhi pad pratut karte hai krapiya uska hindi anuvaad-bhav sahit pratut karye.

डॉ. मोनिका शर्मा said...

काम क्रोध हंकार लोभ हठ,
मोह न मन सो ल्यावै,
तब ही आत्म तत्त को दरसै
परम पुरुष कहं पावै।...
आदर्श जीवन का पूरा सार .... बहुत सुंदर
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परवाज़ पर ...
क्यूँकि मैं एक पिता हूँ......!

निर्मला कपिला said...

अल्प अहार सुल्प सी निद्रा,
दया छिमा तन प्रीत।
गुरूग्रंथ साहिब तो जीवन दर्शन से भरा पडा है। सुन्दर शब्द के लिये धन्यवाद।

राजेश उत्‍साही said...

अच्‍छा लगा।

Kailash C Sharma said...

रे मन ऐसो करि सन्यास।
बन से सदन सबै करि समझहु,
मन ही माहिं उदास।

सुन्दर संकलन...आभार..

mahendra verma said...

आप सब के प्रति हृदय से आभार।

Shekhar Suman said...

बहुत ज्ञान की बातें बताई आपने...

मेरे ब्लॉग में इस बार...ऐसा क्यूँ मेरे मन में आता है....

Vijai Mathur said...

Mahendraji,
aapka sampoorn blog GYAN KA KHAZANA hai.Padh kar santosh hua,yadi sarahna karne vale aapki bhavna samajh kar in seekhon per vyavaharik AMAL bhi kar saken to bahaut achcha ho .