Dec 15, 2010

ग़ज़ल

तितलियों का ज़िक्र हो

प्यार का, अहसास का, ख़ामोशियों का ज़िक्र हो,
महफिलों में अब जरा तन्हाइयों का ज़िक्र हो।


मीर, ग़ालिब की ग़ज़ल या, जिगर के कुछ शे‘र हों,
जो कबीरा ने कही, उन साखियों का ज़िक्र हो।


रास्ते तो और भी हैं, वक़्त भी, उम्मीद भी,
क्या जरूरत है भला, मायूसियों का ज़िक्र हो।


फिर बहारें आ रही हैं, चाहिए अब हर तरफ़,
मौसमों का गुलशनों का, तितलियों का ज़िक्र हो।


गंध मिट्टी की नहीं ,महसूस होती सड़क पर,
चंद लम्हे गांव की, पगडंडियों का ज़िक्र हो।


इस शहर की हर गली में, ढेर हैं बारूद के,
बुझा देना ग़र कहीं, चिन्गारियों का ज़िक्र हो।


दोष सूरज का नहीं है, ज़िक्र उसका न करो,
धूप से लड़ती हुई परछाइयों का ज़िक्र हो।

                                                                            -महेन्द्र वर्मा                                            

28 comments:

shekhar suman said...

sundar rachna.....

ashish said...

वाह साहब खूबसूरत ग़ज़ल . जरूरत तो यही है की हम मिटटी से जुड़े रहे और इसकी खुशबू को अपने जेहन से कभी ना जाने दे .

Kailash C Sharma said...

दोष सूरज का नहीं है, ज़िक्र उसका न करो,
धूप से लड़ती हुई परछाइयों का ज़िक्र हो।

बहुत सुन्दर गज़ल..हरेक शेर दिल को छू जाता है.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

महेंद्र जी! अब कौन से शेर को बेहतर कहूँ, हर एक शेर पिछले वाले शेर से बेहतर नज़र आता है... कमाल की गज़ल है!!

shalini kaushik said...

इस शहर की हर गली में ढेर हैं बारूद के,

बुझा देना गर कहीं चिंगारियों का जिक्र हो.

बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति.

Sunil Kumar said...

इस शहर की हर गली में, ढेर हैं बारूद के,
बुझा देना ग़र कहीं, चिन्गारियों का ज़िक्र हो।
आपने तो आज कल के हालात को बयां कर दिया, मुबारकबाद

JHAROKHA said...

aadar sir
aaj ke smay me aapki is rachna ki tarah hi samaj ka swarup ban jaye to kitna achha ho.

फिर बहारें आ रही हैं, चाहिए अब हर तरफ़,
मौसमों का गुलशनों का, तितलियों का ज़िक्र हो।


गंध मिट्टी की नहीं ,महसूस होती सड़क पर,
चंद लम्हे गांव की, पगडंडियों का ज़िक्र हो।
bahut hi shandaar avamprerak prastuti
dhanyvaad
poonam

ZEAL said...

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आपकी रचनाओं में आपका ज्ञान , आपके वृहत अनुभव, तथा आपका सरल एवं spiritual व्यक्तित्व दृष्टिगोचर होता है । उम्दा ग़ज़ल महेंद्र जी ।
तारीफ के लिए शब्द कम हैं मेरे पास।
आभार।

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mridula pradhan said...

ekdam bemisaal.shabd hi nahin hain kuch kahne ke liye.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मीर, ग़ालिब की ग़ज़ल या, जिगर के कुछ शे‘र हों,
जो कबीरा ने कही, उन साखियों का ज़िक्र हो।

गंध मिट्टी की नहीं ,महसूस होती सड़क पर,
चंद लम्हे गांव की, पगडंडियों का ज़िक्र हो।

बहुत खूबसूरत गज़ल ...सारे शेर एक से बढ़ कर एक ..

Bhushan said...

मीर, ग़ालिब की ग़ज़ल या, जिगर के कुछ शे‘र हों,
जो कबीरा ने कही, उन साखियों का ज़िक्र हो।
रास्ते तो और भी हैं, वक़्त भी, उम्मीद भी,
क्या जरूरत है भला, मायूसियों का ज़िक्र हो।

आप बहुत अच्छे ग़ज़लगो हैं. इसमें संदेह नहीं. सभी शे'र उम्दा हैं.

Shah Nawaz said...

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल है, हर एक शेअर ज़बरदस्त है!



प्रेमरस.कॉम

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

दोष ्सूरज का नही उसका ज़िक्र न करो,
धूप सेलड़ती हुई परछाइयों का ज़िक्र हो।

बेहतरीन शे'र , ख़ूबसूरत ग़ज़ल।
वर्मा जी अब आपको उपर वाले की रहमत हासिल हो गई है।

रश्मि प्रभा... said...

गंध मिट्टी की नहीं ,महसूस होती सड़क पर,
चंद लम्हे गांव की, पगडंडियों का ज़िक्र हो
waah , har katra laajawab

वन्दना said...

दोष सूरज का नहीं है, ज़िक्र उसका न करो,
धूप से लड़ती हुई परछाइयों का ज़िक्र हो।

गज़ब की गज़ल है हर शेर नायाब्।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

mahendrji!
mukammal gazal..
har sher umda..
atisundar!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

आदरणीय महेन्‍द्र जी, जि़न्‍दगी के जि़क्र ने गजल को वज़नदार बना दिया है। बधाई स्‍वीकारें।

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प्रेत साधने वाले।
रेसट्रेक मेमोरी रखना चाहेंगे क्‍या?

Kunwar Kusumesh said...

हमेशा की तरह सुन्दर ग़ज़ल.इस शेर के तो कहने ही क्या:-

रास्ते तो और भी हैं, वक़्त भी, उम्मीद भी,
क्या जरूरत है भला, मायूसियों का ज़िक्र हो

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

har nazm behatareen............ magar aapki nazar in par oadi jo kabiletareef hai.......
गंध मिट्टी की नहीं ,महसूस होती सड़क पर,
चंद लम्हे गांव की, पगडंडियों का ज़िक्र हो।

rashmi ravija said...

रास्ते तो और भी हैं, वक़्त भी, उम्मीद भी,
क्या जरूरत है भला, मायूसियों का ज़िक्र हो।
बड़ी ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है.

अनुपमा पाठक said...

bahut sundar!
har pankti baar baar duhrayi jaane wali!!!!
जो कबीरा ने कही, उन साखियों का ज़िक्र हो।
waah!

सतीश सक्सेना said...

गंध मिट्टी की नहीं ,महसूस होती सड़क पर,
चंद लम्हे गांव की, पगडंडियों का ज़िक्र हो।

बहुत सुंदर रचना ...एक एक शेर बार बार पढने लायक है भाई जी ! हार्दिक शुभकामनायें !

Apanatva said...

bahut sunder bhavo aur sandesho ko sahej rakha hai ise gazal ne apane har ek sher me......... lajawab.......

Majaal said...

रास्ते तो और भी हैं, वक़्त भी, उम्मीद भी,
क्या जरूरत है भला, मायूसियों का ज़िक्र हो।

गंध मिट्टी की नहीं ,महसूस होती सड़क पर,
चंद लम्हे गांव की, पगडंडियों का ज़िक्र हो।

बहुत खूब साहब, लिखते रहिये ....

Vijai Mathur said...

संक्षेप में गहन बात कहने की आपकी कला अद्भुत है.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

गंध मिट्टी की नहीं ,महसूस होती सड़क पर,
चंद लम्हे गांव की, पगडंडियों का ज़िक्र हो।
इस शहर की हर गली में, ढेर हैं बारूद के,
बुझा देना ग़र कहीं, चिन्गारियों का ज़िक्र हो।

ओह ! क्या कहूँ ! बेहतरीन ग़ज़ल और हर शेर दिल को छुं लेने वाला ...

विजय प्रताप सिंह राजपूत (निकू ) said...

नमस्कार जी,
बहुत ही अच्छी,सुंदर प्रस्तुति

monali said...

Very optiistic lines.. i too m inspired to write something positive.. :)