Feb 5, 2011


गीत

गीत मैं गाने लगा हूं,
स्वप्न फिर बुनने लगा हूं।


तमस से मैं जूझता था,
कुछ न मन को सूझता था,
हृदय के सूने गगन में,
सूर्य सा जलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।


आंसुओं के साथ जीते,
वर्ष कितने आज बीते,
भूल कर सारी व्यथाएं,
स्वयं को छलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।


भावनाओं ने उकेरे,
चित्र सुधियों के घनेरे,
कंटकों के बीच सुरभित-
सुमन सा खिलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।

                                              -महेन्द्र वर्मा

43 comments:

स्वप्निल तिवारी said...

ek geet gaane ke kram men vyakti ke mann men aane wale kuch bhavon ka bahut accha citran kiya hai aapne... wah

POOJA... said...

वाह... ये गीत न जाने कितनो का ह्रदय-गीत होगा...

vandan gupta said...

वाह! बहुत ही प्रवाहमय गीत दिल मे उतर गया।

Anupama Tripathi said...

भावनाओं ने उकेरे,
चित्र सुधियों के घनेरे,
कंटकों के बीच सुरभित-
सुमन सा खिलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।

बहुत सुंदर रचना -
गीत्मायी,प्रवाहमयी ,सुखमयी....!!
बधाई एवं शुभकामनाएं

Shikha Kaushik said...

bahut sundar bhavabhivyakti ke liye hardik shubhkamnaye .

Kailash Sharma said...

आंसुओं के साथ जीते,
वर्ष कितने आज बीते,
भूल कर सारी व्यथाएं,
स्वयं को छलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।

बहुत सुन्दर भावपूर्ण गीत..गीत का प्रवाह अपने साथ बहा ले जाता है और मन गुनगुनाने के लिए मज़बूर हो जाता है..

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

HRIDAY KE SOONE GAGAN ME
SURY SA JALNE LAGA HOON
SUNDAR GEET.

Shalini kaushik said...

kantkon ke beech surbhit suman sa khilne laga hoon .shabdon se bhavon ko bahut sundar roop se abhivyakt kiya hai aapne.bahut pasand aayee

शारदा अरोरा said...

यूं ही गीत गाते गाते सफ़र रुचिपूर्ण हो जाता है , बढ़िया गीत ..

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

भावनाओं ने उकेरे,
चित्र सुधियों के घनेरे,
कंटकों के बीच सुरभित-
सुमन सा खिलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।

आद. वर्मा जी,
इतने सुन्दर गीत के बारे में अपना अभिमत लिखने लिए शब्द कहाँ से लाऊं समझ नहीं पा रहा हूँ !
इस गीत के शब्दों के बीच जो धड़क रहा है उसकी अनुगूँज मेरे हृदय को तरंगित कर रही है !
शब्द ,भाव और प्रवाह सब कुछ है इस गीत में !
आभार !

Sunil Kumar said...

आंसुओं के साथ जीते,
वर्ष कितने आज बीते,
भूल कर सारी व्यथाएं,
स्वयं को छलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।
.गीत गाने का कारण जो आप ने बताये उसे पढ़ कर मै निशब्द हो गया हूँ

Sushil Bakliwal said...

कंटकों के बीच सुरभित-
सुमन सा खिलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।

आपका यह शास्वतगान यूंही सदा चलता रहे.

मनोज कुमार said...

आपकी इस कविता भाषा की लहरों में जीवन की हलचल साफ देख सकते हैं।

रचना दीक्षित said...

भावनाओं ने उकेरे,
चित्र सुधियों के घनेरे,
कंटकों के बीच सुरभित-
सुमन सा खिलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।

वर्मा जी बहुत सुंदर कविता रची है, भाव और लय का अद्भुत संगम, ढेर सारी बधाइयाँ.

Rakesh Kaushik said...

भूल कर सारी व्यथाएं
मैं इसे गाने लगा हूँ
धन्यवाद् वर्मा जी - आभार

विशाल said...

बहुत ही बढ़िया अभिव्यक्ति.

शुभ कामनाएं

जयकृष्ण राय तुषार said...

बहुत सुन्दर गीत बधाई भाई महेन्द्रजी

Patali-The-Village said...

बहुत ही प्रवाहमय गीत|बढ़िया अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

Prem Farukhabadi said...

सुन्दर गीत बधाई
भावनाओं ने उकेरे,
चित्र सुधियों के घनेरे,
कंटकों के बीच सुरभित-
सुमन सा खिलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

तिमिर के बीच सूर्य बनकर, व्यथा के बीच मुस्कान बनकर और कंटकों में सुरभित पुष्प बनकर जो गीत आपने गाया है वह ऊर्जा और स्फूर्ति का अनंत स्रोत है..
आपकी रचनाओं में नूतन भावों के साथ साथ संदेश और शब्द माधूर्य भी दिखाई देता है!!

Dorothy said...

सहज तरल प्रवाहमयी रचना में छिपा मौन संगीत मन में देर तक गूंजता रहता है. आभार.
सादर,
डोरोथी.

vijai Rajbali Mathur said...

.गीत प्रेरणास्पद है.
आपके सुझावानुसार लेख १० ता. को प्रकाशित होगा.

mark rai said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति....

Arvind Jangid said...

बहुत ही सुन्दर लगा आपके ब्लॉग में आकर, सुन्दर रचना, साधुवाद स्वीकार करें.

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" said...

आंसुओं के साथ जीते,
वर्ष कितने आज बीते,
भूल कर सारी व्यथाएं,
स्वयं को छलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।

geet gaane ki sunder kalpana..........zarur gaiye koi madhur geet..........

संजय भास्‍कर said...

वर्मा जी बहुत सुंदर कविता रची है, बहुत अच्छी प्रस्तुति....ढेर सारी बधाइयाँ.

संजय भास्‍कर said...

वसंत पंचमी की ढेरो शुभकामनाए...वर्मा जी

कुछ दिनों से बाहर होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका
माफ़ी चाहता हूँ

ZEAL said...

भूल कर सारी व्यथाएं,
स्वयं को छलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।

बेहतरीन रचना !

.

'साहिल' said...

आंसुओं के साथ जीते,
वर्ष कितने आज बीते,
भूल कर सारी व्यथाएं,
स्वयं को छलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।

बहुत ही खूबसूरत गीत बुना है आपने........

डॉ. मोनिका शर्मा said...

आंसुओं के साथ जीते,
वर्ष कितने आज बीते,
भूल कर सारी व्यथाएं,
स्वयं को छलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।

जीवंत ....प्रवाहमयी गीत....

संजय भास्‍कर said...

वसंत पंचमी की ढेरो शुभकामनाए

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

भूल कर सारी व्यथायें , ख़ुद को मैं छलने लगा हूं।

शाश्वत सार्थक सामयिक सुन्दर शीरीं गीत के लिये महेन्द्र भाई को मुबारकबाद।

हरकीरत ' हीर' said...

गीत मैं गाने लगा हूं,
स्वप्न फिर बुनने लगा हूं।

बधाई ....
इसकी कोई न कोई ख़ास वजह होगी .....

Amrita Tanmay said...

भूल कर सारी व्यथाएं,
स्वयं को छलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।

सार्थक ..बहुत सुन्दर .अच्छा लगा....

वसंत पंचमी की ढेरो शुभकामनाए

Dorothy said...

आपको वसंत पंचमी की ढेरों शुभकामनाएं!
सादर,
डोरोथी.

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

सुंदर गीत के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं

आभार

सदा said...

गीत मैं गाने लगा हूं,
स्वप्न फिर बुनने लगा हूं।

बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

VIVEK VK JAIN said...

i liked d positivity in the poem.
geet me gaane laga hoon, swapn mei bunne laga hoon. lovely.

उपेन्द्र नाथ said...

भावनाओं ने उकेरे,
चित्र सुधियों के घनेरे,
कंटकों के बीच सुरभित-
सुमन सा खिलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।
bahut hi sunder evam bhavpurna kavita .... behatarin prastuti.

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

बहुत प्‍यारा गीत।

---------
ब्‍लॉगवाणी: एक नई शुरूआत।

Kunwar Kusumesh said...

आंसुओं के साथ जीते,
वर्ष कितने आज बीते,
भूल कर सारी व्यथाएं,
स्वयं को छलने लगा हूं,
गीत मैं गाने लगा हूं।

बहुत सुन्दर,सही और सार्थक अभिवक्ति है .
वाह वाह , क्या बात है.

रंजना said...

आह...मन खिल गया इस अप्रतिम रचना को पढ़...

ह्रदयहारी मुग्धकारी अद्वितीय गीत...

Anonymous said...

bohot pyaara sa geet hai.....goonj raha hai zehn mein ab tak.....bohot sundar :)