Jul 31, 2011

मैं भी इक संतूर रहा हूं।


दिल ही हूं मजबूर रहा हूं,
इसीलिए मशहूर रहा हूं।


चलता आया उसी लीक पर,
दुनिया का दस्तूर रहा हूं।


नए दौर में सच्चाई का,
चेहरा हूं, बेनूर रहा हूं।


वो नज़दीक बहुत हैं मेरे,
जिनसे अब तक दूर रहा हूं।


चोट लगी तो फूल झरे हैं,
मैं भी इक संतूर रहा हूं।


कहते हैं सब कभी किसी की,
आंखों का मैं नूर रहा हूं।


अब मुझको आना न जाना,
मैं तो बस मग़्फ़ूर रहा हूं।

.............................................
संतूर-  एक वाद्ययंत्र
मग़्फ़ूर-जिसे मोक्ष प्राप्त हो गया हो



                                          -महेंद्र वर्मा

37 comments:

Bhushan said...

वाह..वाह..वाह..
यह ग़ज़ल तो सीधी दिल में उतर गई. उम्दा अशआर से भरी...

मनोज कुमार said...

नए दौर में सच्चाई का,
चेहरा हूं, बेनूर रहा हूं।
छोटे बहर की ग़ज़ल का सौन्दर्य ही अलग होता है। उक्त शे’र में आपने कितनी बड़ी सच्चाई को बयान कर दिया है। बहुत पसंद आई यह ग़ज़ल।

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

@चोट लगी तो फूल झरे हैं,
मैं भी इक संतूर रहा हूं।

गजब का शेर बन पड़ा है।
आभार

अनुपमा त्रिपाठी... said...

चोट लगी तो फूल झरे हैं,
मैं भी इक संतूर रहा हूं।

bahut hi umda ...seedhe dil se nikli hai ...
gahbhir..gahan baat karti hui ...sunder ghazal...

अजय कुमार said...

सुंदर गजल ,बधाई

Kunwar Kusumesh said...

गहरे भावों से लबरेज़ सुन्दर और प्रभावी ग़ज़ल है,सभी शेर अच्छे.
वाह,क्या बात है.

संतोष त्रिवेदी said...

मै भी आपको याद ज़रूर रहा हूँ !

बहुत सुन्दर रचना,गागर मे सागर !

veerubhai said...

दिल के मार्फ़त दिल की बात ग़ज़ल में पिरो दी हरेक अशआर सच्चा मोती, ग़ज़ल माला में शैर की हर शैर एक बयाँ हकीकत का -
वो नज़दीक बहुत हैं मेरे ,
जिनसे अब तक दूर रहा हूँ .महेंद्र वर्मा जी स्वत :स्फूर्त दिल से निकले अलफ़ाज़ हैं ये .

राकेश कौशिक said...

"नए दौर में सच्चाई का,
चेहरा हूं, बेनूर रहा हूं।
...
चोट लगी तो फूल झरे हैं,
मैं भी इक संतूर रहा हूं।"

वाह वर्मा जी गजब का लिखा है

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

बेहतरीन ग़ज़ल " अब तो मुझको आना ना जाना,
मैं तो बस मग़्फ़ूर रहा हूं। बेहतरीन शे"र, बधाई वर्मा जी।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

चोट लगी तो फूल झरे हैं,
मैं भी इक संतूर रहा हूं।

Bahut Sunder....Behtreen Gazal

Kajal Kumar said...

वाह एक सुंदर ग़ज़ल.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

वर्मा साहब!!
छोटे बहर में कही गयी आपकी सारी गज़लें मुझे बेहद पसंद हैं.. यह भी उसी का हिस्सा है.. संतूर के मन की बात मन में बस गयी.. याद आया एक पुराना गीत:
जो तार से निकली है वो धुन सबने सुनी है,
जो साज़ पे गुज़री है वो किस दिल को पता है!!
बेहतरीन भावों से सजी गज़ल!!

वन्दना said...

बहुत सुन्दर भावो से सजी गज़ल्।

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri said...

नए दौर में सच्चाई का,
चेहरा हूं, बेनूर रहा हूं।
गहन भाव समेटे बेहतरीन प्रस्तुति ...!!!

vidhya said...

आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें
बहुत ही खुबसूरत शब्दों का समायोजन....
लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

आशा said...

दिल को छूते भाव |बधाई |आप मेरे ब्लॉग पर आए आभार |
आशा

S.M.HABIB said...

नए दौर में सच्चाई का,
चेहरा हूं, बेनूर रहा हूं।

वाह सर, बेहतरीन गज़ल कही आपने....
सादर...

Rachana said...

नए दौर में सच्चाई का,
चेहरा हूं, बेनूर रहा हूं।
bahut sahi baat kahi aapne
चोट लगी तो फूल झरे हैं,
मैं भी इक संतूर रहा हूं।
bahut sunder gazal
rachana

रेखा said...

बेहतरीन और उम्दा गजल

Dorothy said...

चोट लगी तो फूल झरे हैं,
मैं भी इक संतूर रहा हूं।

बेहद खूबसूरत गजल.आभार.
सादर,
डोरोथी.

Babli said...

बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल लिखा है आपने! लाजवाब प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

daanish said...

नए दौर में सच्चाई का
चेहरा हूं, बेनूर रहा हूं

सच्चे और सार्थक भाव लिए हुए
ग़ज़ल का हर शेर अपना प्रभाव छोड़ रहा है
हर छोटी-बड़ी बात को
बड़े सलीक़े से कह दिया गया है ... वाह !!

Amit Chandra said...

शानदार गजल। हर शेर में वजन है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वाह, छोटा बहर और सुन्दर भाव!

Beqrar said...

behad prabhavshali......har sher ko hazaron lakhon daad............naye dour me sachchai ka...........wah kya kahne

Navin C. Chaturvedi said...

छोटी बहर पर ग़ज़ल कहने में अच्छे अच्छों के पसीने छूट जाते हैं, पर आपने तो लगता है इसे आसानी से निभा दिया है| 'संतूर' वाला शेर कालजयी शेर है वर्मा जी - इसे जतन से सँभाल कर रखिएगा| नमन|

shekhar suman said...

ohh !!! bahut hi pyaari si aur sundar gazal....

ZEAL said...

नए दौर में सच्चाई का,
चेहरा हूं, बेनूर रहा हूं।
---

Awesome creation !

I'm falling short of words to praise this excellent creation .

Loving it .

.

Amrita Tanmay said...

बेहतरीन शेर,बेहतरीन ग़ज़ल,हर शेर अर्थपूर्ण !!!

संजय भास्कर said...

वाह
शानदार गजल गजब का लिखा है ..... वर्मा जी

वर्ज्य नारी स्वर said...

बिलकुल सच कहा आपने....

Ehsaas said...

sab ke sab achhe lage...aur alag se...kamaal hai


http://teri-galatfahmi.blogspot.com/

Vijay Kumar Sappatti said...

बहुत ही सुन्दर गज़ल सर जी ..
एक एक शेर मोहब्बत और विरह कि मिसाल है ..

बधाई

आभार
विजय

कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

कम लफ्जों में बडी बात कहना कोई आपसे सीखे।

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कम्‍प्‍यूटर से तेज़!
इस दर्द की दवा क्‍या है....

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

नए दौर में सच्चाई का
चेहरा हूँ , बेनूर रहा हूँ ,
.................सच्चा शेर, वर्मा जी !
छोटी बहर की खूबसूरत ग़ज़ल , हर शेर अर्थपूर्ण

'साहिल' said...

अब मुझको आना न जाना,
मैं तो बस मग़्फ़ूर रहा हूं।

बहुत ही गहरा शेर कहा है आपने, वो भी इतने कम शब्दों में! वाह!
पूरी ग़ज़ल लाजवाब है!