दोहे : गूँजे तार सितार


कभी सुनाती लोरियाँ, कभी मचातीं शोर,
जीवन सागर साधता, इन लहरों का जोर।


कटुक वचन अरु क्रोध में, चोली दामन संग,
एक बढ़े दूसर बढ़े, दोनों का इक रंग।


साथ न दे जो कष्ट में, दुश्मन उसकों जान,
दूरी उससे उचित है, मन में लो यह ठान।


 द्वेषी मानुष आपनो, कहे न मन की बात,
केवल पर के हृदय में, पहुँचाए आघात।


ज्यों मिजरब की चोट से, गूँजे तार सितार,
तैसे नेहाघात से, हृदय ध्वनित सुविचार।


जो मनुष्य कर ना सके, नारी का सम्मान,
दया क्षमा अरु नेह का, नहीं पात्र वह जान।


मान प्रतिष्ठा के लिए, धन आवश्यक नाहिं,
सद्गुण ही पर्याप्त है, गुनिजन कहि-कहि जाहिं।


                                                                            -महेंद्र वर्मा

49 comments:

जयकृष्ण राय तुषार said...

आदरणीय भाई महेंद्र जी बहुत ही सुंदर सामयिक दोहे बधाई

अजित गुप्ता का कोना said...

अच्‍छे और सार्थक दोहे हैं।

संतोष त्रिवेदी said...

दोहे सामयिक हैं पर आदर्श स्थिति के लिए ही मुफ़ीद हैं !

मनोज कुमार said...

जो मनुष्य कर ना सके, नारी का सम्मान,
दया क्षमा अरु नेह का, नहीं पात्र वह जान।
सारे दोहे काफ़ी अर्थवान। सटीक और सार्थक।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सारे दोहे सार्थक सीख देते हुए ...

देवेन्द्र पाण्डेय said...

वाह! बढ़िया दोहे।

अजय कुमार said...

संदेशप्रद दोहे

Sunil Kumar said...

गांठ बांधने योग्य सार्थक दोहे, आभार ........

डा श्याम गुप्त said...

मान प्रतिष्ठा के लिए, धन आवश्यक नाहिं,
सद्गुण ही पर्याप्त है, गुनिजन कहि-कहि जाहिं।...

---सुंदर सार्थक दोहे...बधाई

Bharat Bhushan said...

सुंदर दोहे. आपके दोहों में नीति का सागर हिलोरें ले रहा है.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

“सत्य, बराबर सत्य है, हर दोहों की बात.
जैसे हरकर रात को, आये नित्य प्रभात”

सार्थक, शिक्षाप्रद दोहे हैं भईया....
सादर....

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 26-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

www.navincchaturvedi.blogspot.com said...

दोहों के माध्यम से जीवन मूल्यों को बखानती यह पोस्ट संग्रहणीय है। खास कर क्रोध-कटुक वचन, मिजरब और नारी महत्ता वाले दोहे अद्भुत लगे।

Dr Varsha Singh said...

बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी दोहे ! हार्दिक शुभकामनायें !

Kunwar Kusumesh said...

सभी दोहे एक से बढ़कर एक. पढ़कर मज़ा आ गया.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

मुग्ध हो जाता हूँ यहाँ आकर, आपकी गज़लें हों, दोहे हों या संतों की वाणी!! कुछ कहना है इसलिए कहना होता है, वरना सब कहा छोटा लगता है!!

S.N SHUKLA said...

बहुत सुन्दर , सार्थक रचना , सार्थक तथा प्रभावी भावाभिव्यक्ति , ब धाई

Kailash Sharma said...

सार्थक सन्देश देते बहुत सुन्दर दोहे...आभार

रविकर said...

प्रस्तुति स्तुतनीय है, भावों को परनाम |
मातु शारदे की कृपा, बनी रहे अविराम ||

vandan gupta said...

बहुत ही शिक्षाप्रद दोहे।

virendra sharma said...

महेंद्र वर्मा जी के दोहे और नवगीत संस्कृति के तमाम रंगों से संसिक्त रहतें हैं .प्रकृति के रंग और तमाम उपादान उनकी रचना में माँ के आँचल से सुकून देते हैं .

रेखा said...

हर एक दोहा अर्थपूर्ण और अनुकरणीय ....

Rahul Singh said...

गुणीजनों की अनुकरणीय बातें.

Maheshwari kaneri said...

सार्थक सन्देश देते अर्थपूर्ण और अनुकरणीय दोहे ...आभार

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

चाहे दोहा हो, या फिर गजल, आप जो भी लिखते हो कमाल लिखते हो।

------
मनुष्‍य के लिए खतरा।
...खींच लो जुबान उसकी।

Anamikaghatak said...

kamal ka leakhan.....sari bate shikshaprad va amal yogya hai

KANTI PRASAD said...

जो मनुष्य कर ना सके, नारी का सम्मान,
दया क्षमा अरु नेह का, नहीं पात्र वह जान।

सार्थक सन्देश देते, दोहे

Smart Indian said...

सुन्दर और मनन योग्य दोहे, आभार!

रचना दीक्षित said...

बहुत सुंदर दोहे और अच्छा सन्देश देते हुए . बधाई.

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

बेहतरीन दोहे , अंतिम दोहा तो लाज़वाब लगा ।

नीरज द्विवेदी said...

बहुत अच्छा लगा आपके दोहे पढकर, मैं पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ ... आगे भी नियमित रहूँगा.
My Blogs:
Life is just a Life
My Clicks...
.

ashish said...

वाह , हर दोहा अर्थप्रद. आभार .

girish pankaj said...

सुन्दर दोहे आपके, ज्यों कबिरा के रंग.
इसी तरह साधे रहें, हर पल नई उमंग.
हर इक दोहे में दिखे, अनुभव का संसार
वर्माजी की भावना, देती नव उपहार...
बधाई.

Urmi said...

सभी दोहे बहुत सुन्दर है! एक से बढ़कर एक! बेहतरीन प्रस्तुती!

mark rai said...

मान प्रतिष्ठा के लिए, धन आवश्यक नाहिं,
सद्गुण ही पर्याप्त है, गुनिजन कहि-कहि जाहिं।
... बेहतरीन प्रस्तुती.... बधाई.

mark rai said...

Mahendra verma ji....bahut hi achche lage ye dohe...mai inhe facebook par share kar raha hoon...

mark rai said...

साहित्य और संगीत मेरी ज्ञानेन्द्रियां हैं, इन्हीं के द्वारा मैं दुनिया को देखता और महसूस करता हूं.........
aapki rachnao se ham sabhi ko aisa hi pratit hota hai....aapki rachna aur aap dono apne dhang se hi is khubsoorat duniya ko dekhte hai...

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

प्रत्येक दोहा सुखी जीवन का एक मंत्र है.

ZEAL said...

श्रद्धा से नतमस्तक हूँ आपके आगे।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

साथ न दे जो कष्ट में, दुश्मन उसकों जान,
दूरी उससे उचित है, मन में लो यह ठान।

बहुत सुन्दर सीख देते दोहे ! हरेक दोहा सुन्दर जीवन का मंत्र है !

नीरज गोस्वामी said...

इन कमाल के दोहों के लिए ढेरों बधाई स्वीकारें

नीरज

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...





आपको सपरिवार
नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

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दोहे बहुत सुंदर हैं … आभार और बधाई !

प्रेम सरोवर said...

मान प्रतिष्ठा के लिए, धन आवश्यक नाहिं,
सद्गुण ही पर्याप्त है, गुनिजन कहि-कहि जाहिं।

काबिले तारीफ । मेरी कविता 'मौन समर्थन' पर आपने गलत टिप्पणी दिया है । आपने नासवा जी को धन्यवाद दिया है जबकि यह मेरी कविता है । कृपया एक और टिप्पणी देकर संशोधन करें । धन्यवाद ।

रंजना said...

अमूल्य वचन...स्तुत्य ग्रहणीय....
काव्य सौन्दर्य की तो बात ही क्या कहूँ....
अद्वितीय...

Amrita Tanmay said...

गुनिजन का कहा मनन करने योग्य ही होता है ..आपका भी है.अच्छी लगी ..

Rajesh Kumari said...

जो मनुष्य कर ना सके, नारी का सम्मान,
दया क्षमा अरु नेह का, नहीं पात्र वह जान।


मान प्रतिष्ठा के लिए, धन आवश्यक नाहिं,
सद्गुण ही पर्याप्त है, गुनिजन कहि-कहि जाहिं।
sabhi dohe laajabaab ek se badhkar ek hain.

Anonymous said...

bahut bahut badhiya dohe....

Unknown said...

bahoot khoob

द्वेषी मानुष आपनो, कहे न मन की बात,
केवल पर के हृदय में, पहुँचाए आघात।