Oct 2, 2011

देहि सिवा बर मोहि इहै


 गुरु गोविंदसिंह जी विरचित सुविख्यात ग्रंथ ‘श्री दसम ग्रंथ‘ एक अद्वितीय आध्यात्मिक और धार्मिक साहित्य है। इस ग्रंथ में गुरु जी ने लगभग 150 प्रकार के वार्णिक और मात्रिक छंदों में भारतीय धर्म के ऐतिहासिक और प्रागैतिहासिक पात्रों के जीवन-वृत्तों की जहाँ एक ओर पुनर्रचना की है, वहीं देवी चंडी के प्रसंगों एवं चैबीस अवतारों के माध्यम से लोगों में धर्म-युद्ध का उत्साह भी भरा है।


 ‘जापु‘, ‘अकाल उसतति‘, ‘तैंतीस सवैये‘ आदि रचनाएँ आध्यात्मिक विकास एवं मानसिक उत्थान के मार्ग में आने वाले अवरोधों और उनके निराकरण का मार्ग प्रस्तुत करते हुए प्रेम को भगवद्प्राप्ति का सबल साधन मानती हैं।


‘चंडी चरित‘, ‘चंडी दी वार‘ स्त्री शक्ति को स्थापित करते हुए समाज में स्त्री को उचित सम्मान दिलाने का संकेत करती हैं।


प्रस्तुत है, ‘श्री दसम ग्रंथ‘ के अंतर्गत ‘चंडी चरित्र उकति बिलास‘ से उद्धरित आदिशक्ति देवी शिवा की अर्चना-

देहि सिवा बर मोहि इहै, सुभ करमन ते कबहूँ न टरौं।
न डरौं अरि सों जब जाई लरौं, निसचै करि आपनि जीत करौं।।
अरु सिखहों आपने ही मन को, इह लालच हउ गुन तउ उचरौं।
जब आव की अउध निदान बनै, अति ही रन में तब जूझ मरौं।।

अर्थ- हे परम पुरुष की कल्याणकारी शक्ति ! मुझे यह वरदान दो कि मैं शुभ कर्म करने में न हिचकिचाऊँ। रणक्षेत्र में शत्रु से कभी न डरूँ और निश्चयपूर्वक युद्ध को अवश्य जीतूँ। अपने मन को शिक्षा देने के बहाने मैं हमेशा ही तुम्हारा गुणानुवाद करता रहूँ तथा जब मेरा अंतिम समय आ जाए तो मैं युद्धस्थल में धर्म की रक्षा करते हुए प्राणों का त्याग करूँ।

30 comments:

जयकृष्ण राय तुषार said...

धर्म ,अध्यात्म गुरुगोविन्द सिंह जी सभी के बारे में आपकी सुंदर और प्रवाहपूर्ण लेखनी से लिखा यह आलेख बहुत ही सार्थक और वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिक भी है |आपका आभार

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

बहुमूल्य जानकारी प्रदान करने के लिये आभार.

मनोज कुमार said...

बहुत ही प्रेरक प्रसंग और पंक्तियां हैं।

दर्शन कौर said...

दसवी पातशाही श्री गुरु गोविन्द सिंह जी की कई उत्कृष्ठ रचनाए हैं जिनमें से एक ---'चंडी दी वार' महिलाओ के त्याग और बलिदान का सरूप हैं वही ओरतो के शोर्य का भी वर्णन हैं ..उन्होंने हमेशा ओरतो को प्रोत्साहन दिया ---आज भी हमारे समाज में ओरतो को बराबर का हक मिला हुआ हें ---जहाँ पुरुष को 'सिंह' (शेर ) वही ओरतो को ' कौर' (शेरनी) का नाम दिया हैं ..आपका बहुत -बहुत धन्यवाद महेंदर जी ..

ZEAL said...

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हे परम पुरुष की कल्याणकारी शक्ति ! मुझे यह वरदान दो कि मैं शुभ कर्म करने में न हिचकिचाऊँ। रणक्षेत्र में शत्रु से कभी न डरूँ और निश्चयपूर्वक युद्ध को अवश्य जीतूँ। अपने मन को शिक्षा देने के बहाने मैं हमेशा ही तुम्हारा गुणानुवाद करता रहूँ तथा जब मेरा अंतिम समय आ जाए तो मैं युद्धस्थल में धर्म की रक्षा करते हुए प्राणों का त्याग करूँ।

यदि हम धर्म समझ सकें और उसका पालन कर सकें अंतिम समय तक , तो जीवन सार्थक हो जाए।

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रविकर said...

अथ आमंत्रण आपको, आकर दें आशीष |
अपनी प्रस्तुति पाइए, साथ और भी बीस ||
सोमवार
चर्चा-मंच 656
http://charchamanch.blogspot.com/

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

वर्मा साहब,
ये पंक्तियाँ मुर्दों में जान फूंक देने का काम करती हैं... आभार इस प्रस्तुति के लिए!!

Dr Varsha Singh said...

‘चंडी चरित‘, ‘चंडी दी वार‘ स्त्री शक्ति को स्थापित करते हुए समाज में स्त्री को उचित सम्मान दिलाने का संकेत करती हैं।

अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई तथा शुभकामनाएं !

मदन शर्मा said...

सुन्दर और ज्ञान वर्धक जानकारी ... शुक्रिया ...
आपको नव रात्री की बहुत बहुत शुभकामनाएं .

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सुन्दर जानकारी देती प्रस्तुति के लियी सादर आभार बड़े भईया....

Bhushan said...

गुरु जी ने अपने समय में कई क्रांतिकारी कार्य किए थे. उनके पाँच प्यारे निम्न जातियों से थे. चमकौर का गढ़ जीतने वाली सेना में इन्हीं जातियों के लोग थे. गुरु जी के कार्य का तथ्यपरक आकलन अभी भी अपेक्षित है. गुरु गोविंद सिंह के जुझारू रूप को रूपायित करती रचना देने के लिए आभार.

रेखा said...

सार्थक और ज्ञानवर्धक पोस्ट ..

Maheshwari kaneri said...

बहुत ही प्रेरक और सार्थक पोस्ट .. आपको नव रात्री की बहुत बहुत शुभकामनाएं .

रचना दीक्षित said...

सुंदर जानकारी देती बढ़िया प्रस्तुति.

Rajesh Kumari said...

चंडी के रूप में नारी के सम्मान में ग्रंथों की अच्छी जानकारी दी है देवी शिवा की अर्चना बहुत पसंद आई !वर्ना किसी कवी का यह दोहा तो मुझे आज तक समझ नहीं आया वो मन की भावना थी ये व्यंग .......ढोल गंवार ,शूद्र पशु नारी .......

veerubhai said...

भाषिक एवं भाव सौन्दर्य से भरपूर प्रस्तुति राष्ट्रीयता से सिंचित सच्चे हृदय की रचना .आभार इस अप्रतिम प्रस्तुति के लिए .

Babli said...

बहुत सुन्दर लगा! बेहतरीन प्रस्तुती!
दुर्गा पूजा पर आपको ढेर सारी बधाइयाँ और शुभकामनायें !
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

mark rai said...

bahut hi achchi jaankari...indian culture aur literature ko improvment aise hi rachnao se milta hai...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति महेंद्र जी !
गुरु जी के छंद बहुत ही अच्छे और प्रभावशाली हैं |

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

behad rocha chand...amooman is tarah ke sahitya se parichit karana ,,hame hamari dharohar se milana,,, ek kabile tarif prayas hai...gyan vardhak in tathyon tak pahuchaane ke liye aapko hardik dhanyawad,,,sadar pranam ke sath

Dr (Miss) Sharad Singh said...

गुरु गोविंदसिंह जी विरचित सुविख्यात ग्रंथ ‘श्री दसम ग्रंथ‘ की बढ़िया प्रस्तुति.
सादर निवेदन-
मेरी पुस्तक - सिख कथाएं - भी प्रकाशनाधीन है.

Amrita Tanmay said...

जीवन का बीजमंत्र..अति सुन्दर.

Kailash C Sharma said...

बहुत ही प्रेरक और सार्थक प्रस्तुति..आभार

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सुंदर प्रेरणादायी पंक्तियाँ .....

प्रेम सरोवर said...

आपके पोस्ट पर बहुत ही अचछी जानकारी मिली । मेरी ओर से नवमी एवं दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं । धन्यवाद .

दिगम्बर नासवा said...

ये पंक्तियाँ महेंद्र कपूर जी ने गई हैं और हमेशा बाजुओं में जोश पैदा कर देती हैं ... नमन है सच्चे गुरु को ...

Navin C. Chaturvedi said...

विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं। बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक यह पर्व, सभी के जीवन में संपूर्णता लाये, यही प्रार्थना है परमपिता परमेश्वर से।
नवीन सी. चतुर्वेदी

ashish said...

बहुत ही प्रेरक प्रसंग . दशहरा की शुभकामनायें

Babli said...

आपको एवं आपके परिवार को दशहरे की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें !

Gopal Krishan Bhardwaj said...

गुरु ग्रन्थ साहिब में 7 सिख गुरुओं और 18 हिंदू संतों की बानी है | राम शब्द चार हज़ार बार , परब्रह्म तीन हज़ार बार , हरी शब्द दो हज़ार बार , विष्णु शब्द एक हज़ार से अधिक बार और बहुत से हिंदू शब्द भगवान , ईश्वर , जगदीश , कृष्ण , आदि का उपयोग हजारों बार हुआ है | पर कुछ मुर्ख अपने ही गुरु ग्रन्थ साहिब की बाणी की व्याख्या बदलते हुए यह दावा करते हैं की ये वो राम या वो कृष्ण नहीं हैं जिनकी पूजा हिंदू करते हैं , पर जब गुरु ग्रन्थ साहिब में जिन हिंदू संतों की बाणी हैं उन्होंने तो इन्ही के गुण गाये हैं | तो उसका मतलब कैसे बदल गया ??
जब गुरु गोबिंद सिंह जी "चंडी दी वार " लिखते हैं तो सीधा उसमें माँ दुर्गा की आराधना है कटटर सिख कह देता है की चंडी का मतलब तलवार है पर "महिषासुर " शब्द फिर जो है उसमें वो कहाँ से आया ??? "दे शिवा वर मोहे एहे " सीधे सीधे महादेव की आराधना है