दोहे: तन-मन-धन-जन-अन्न


जहाँ-जहाँ पुरुषार्थ है, प्रतिभा से संपन्न, 
संपति पाँच विराजते, तन-मन-धन-जन-अन्न।


दुख है जनक विराग का, सुख से उपजे राग,
जो सुख-दुख से है परे, वह देता सब त्याग।


ऐसी विद्या ना भली, जो घमंड उपजात,
उससे तो मूरख भले, जाने शह ना मात।


ईश्वर मुझको दे भले, दुनिया भर के कष्ट,
पर मिथ्या अभिमान को , मत दे, कर दे नष्ट।


जो भी है इस जगत में, मिथ्या है निस्सार,
माँ की ममता सत्य है,  करें सभी स्वीकार।


                                                                              -महेन्द्र वर्मा

41 comments:

केवल राम said...

ऐसी विद्या ना भली, जो घमंड उपजात,
उससे तो मूरख भले, जाने शह ना मात।
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जो भी है इस जगत में, मिथ्या है निस्सार,
माँ की ममता सत्य है, करें सभी स्वीकार।
सभी दोहे गहरे भावों से ओतप्रोत हैं ....! अंतिम तो दिल के बहुत करीब से गुजर गया और सोचता रहा मैं ....!

Bharat Bhushan said...

"जहाँ-जहाँ पुरुषार्थ है, प्रतिभा से संपन्न,
संपति पाँच विराजते, तन-मन-धन-जन-अन्न।"

इस विचार-संस्कार की आवश्यकता सारे भारत को है.
"ऐसी विद्या ना भली, जो घमंड उपजात,
उससे तो मूरख भले, जाने शह ना मात।"

यह भाव मन को छू गया क्योंकि यह नीति से भी परे की बात है.

निर्मला कपिला said...

सभी दोहे लाजवाब हैं बधाई।

virendra sharma said...

ऐसी विद्या ना भली, जो घमंड उपजात,
उससे तो मूरख भले, जाने शह ना मात।
जीवन सूत्र पिरो दिए हैं आपने इन दोहों में .

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सार्थक दोहे ... सुन्दर प्रस्तुति

अरुण चन्द्र रॉय said...

सन्देश देते दोहे.... बहुत बढ़िया...

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 31-10-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

आपके दोहे हमेशा बुजुर्गों की सीख और बड़ों के आशीष से लगते हैं!!

vandan gupta said...

दुख है जनक विराग का, सुख से उपजे राग,
जो सुख-दुख से है परे, वह देता सब त्याग।
सुन्दर सीख देते शानदार दोहे।

दिगम्बर नासवा said...

ऐसी विद्या ना भली, जो घमंड उपजात,
उससे तो मूरख भले, जाने शह ना मात।...

वाह महेंद्र जी ... कबीर की याद ताज़ा हो आई ... बहत ही सहजता से बड़ी बात कह दी आपने इन दोहों में ...

समयचक्र said...

bahut badhiya prastuti...mahendra ji ...abhaar

Udan Tashtari said...

बेहतरीन दोहे...आनन्द आया.

मदन शर्मा said...

माँ की ममता से भरी सत्य एवं सार्थक दोहे की रचना की है आपने
आपका बहुत आभार !!
मेरी तरफ से आपको दीपावली तथा भैयादूज पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत सुन्दर दोहे हैं सर,
सादर बधाई...

Human said...

बहुत संदेशपूर्ण दोहे, सार्थक जीवन का आधार बताते

ZEAL said...

शिक्षाप्रद , प्रेरणादायी , बेहतरीन प्रस्तुति।

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

ऐसी विद्या ना भली, जो घमंड उपजात,
उससे तो मूरख भले, जाने शह ना मात।

बेहतरीन दोहे.

डॉ. मोनिका शर्मा said...

प्रेरणादायी प्रस्तुति....लाजवाब दोहे ...

अनुपमा पाठक said...

ऐसी विद्या ना भली, जो घमंड उपजात,
उससे तो मूरख भले, जाने शह ना मात।
बेहतरीन!

मनोज कुमार said...

इन दोहों की बात काफ़ी प्रेरक हैं। जैसे कबीर के दोहे हुआ करते थे।

Amrita Tanmay said...

स्वीकार है..आपकी सुन्दर रचना..सहर्ष

Arun sathi said...

ऐसी विद्या ना भली, जो घमंड उपजात,
उससे तो मूरख भले, जाने शह ना मात।


साधु-साधु
अतिसुन्दर...

विवेक रस्तोगी said...

अति सुन्दर, एक से बढ़कर एक दोहे ।

Urmi said...

सारे दोहे एक से बढ़कर एक है! लाजवाब प्रस्तुती ! बहुत बहुत बधाई!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

बेहद सुन्दर दोहे ...शिक्षाप्रद ...

Kailash Sharma said...

जो भी है इस जगत में, मिथ्या है निस्सार,
माँ की ममता सत्य है, करें सभी स्वीकार।


बहुत सुन्दर और प्रेरक दोहे...

Maheshwari kaneri said...

बेहद सुन्दर और शिक्षाप्रद दोहे .....आभार..

Vandana Ramasingh said...

ऐसी विद्या ना भली, जो घमंड उपजात,
उससे तो मूरख भले, जाने शह ना मात।


ईश्वर मुझको दे भले, दुनिया भर के कष्ट,
पर मिथ्या अभिमान को , मत दे, कर दे नष्ट

गज़ब की सोच को दोहों में बाँधा है आपने ...सादर प्रणाम

Gyan Darpan said...

प्रेरक और शिक्षाप्रद
Gyan Darpan
RajputsParinay

रचना दीक्षित said...

बहुत खूबसूरती से समेटा है इन ज्ञानवर्धक बातों को अपने दोहों में
बधाई

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

जो भी है इस जगत में, मिथ्या है निस्सार,
माँ की ममता सत्य है, करें सभी स्वीकार।
sundar dohe..

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

आदरणीय महेंद्र जी अभिवादन बहुत ही सुन्दर सीख देते आप के लाजबाब दोहे ...काश लोग इन पर गौर कर कुछ तो लाभ लें
शुक्ल भ्रमर ५

जहाँ-जहाँ पुरुषार्थ है, प्रतिभा से संपन्न,
संपति पाँच विराजते, तन-मन-धन-जन-अन्न।

Unknown said...

अतिसुन्दर...वाह!

संजय भास्‍कर said...

प्रेरणादायी ज्ञानवर्धक दोहे बेहतरीन प्रस्तुति....महेंद्र जी

संजय भास्कर
आदत....मुस्कुराने की
पर आपका स्वागत है
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Asha Joglekar said...

जो भी है इस जगत में, मिथ्या है निस्सार,
माँ की ममता सत्य है, करें सभी स्वीकार।

आज तो अध्यात्म का जोर है । सुंदर दोहे महेंन्द्र जी ।

daanish said...

दोहावली में
हर शब्द जीवन-दर्शन से जुडा हुआ है
संदेशात्मक प्रस्तुति !

चंदन said...

बहुत ही शिक्षाप्रद दोहे!

प्रेम सरोवर said...

आपका ब्लॉग भी बहुत ख़ूबसूरत और आकर्षक लगा । अभिव्यक्ति भी मन को छू गई । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद . ।

संतोष त्रिवेदी said...

एक-से-बढ़कर-एक प्रेरणादायक दोहे !

Dr.NISHA MAHARANA said...

सुन्दर प्रस्तुति.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

शायद आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर भी हो!
सूचनार्थ!