Dec 18, 2011

दोहे


समर भूमि संसार है, विजयी होते वीर,
मारे जाते हैं सदा, निर्बल-कायर-भीर।


मुँह पर ढकना दीजिए, वक्ता होए शांत,
मन के मुँह को ढाँकना, कारज कठिन नितांत।


दुख के भीतर ही छुपा, सुख का सुमधुर स्वाद,
लगता है फल, फूल के, मुरझाने के बाद।


भाँति-भाँति के सर्प हैं, मन जाता है काँप,
सबसे जहरीला मगर, आस्तीन का साँप।


हो अतीत चाहे विकट, दुखदायी संजाल,
पर उसकी यादें बहुत, होतीं मधुर रसाल।


विपदा को मत कोसिए, करती यह उपकार,
बिन खरचे मिलता विपुल, अनुभव का उपहार।


प्राकृत चीजों का सदा, कर सम्मान सुमीत,
ईश्वर पूजा की यही, सबसे उत्तम रीत।

                       
                                                                             -महेन्द्र वर्मा





37 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

विपदा को मत कोसिए, करती यह उपकार,
बिन खरचे मिलता विपुल, अनुभव का उपहार।

Bahut Hi Sunder Dohe....

Rajesh Kumari said...

bahut sundar,umda dohe hain ek se badhkar ek.

Kunwar Kusumesh said...

सभी दोहे उत्तम

कुश्वंश said...

bahut hi sundar dohe padhkar kabeerdas ji yaad aa gaye.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

अद्भुत दोहे आपके, जीवन भर का ज्ञान,
हीरे पाए जात हैं ज्यूं कोयले की खान!

वन्दना said...

दुख के भीतर ही छुपा, सुख का सुमधुर स्वाद,
लगता है फल, फूल के, मुरझाने के बाद।

सार्थक सीख देते उत्तम दोहे।

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

दुख के भीतर ही छुपा, सुख का सुमधुर स्वाद,
लगता है फल, फूल के, मुरझाने के बाद।

हर दोहा उत्तम दोहा ,नीति परक और नीक
अनुभव-अध्ययन संतुलन, सोलह आने ठीक.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

वाह! बहुत बढ़िया दोहे हैं सर....
सादर बधाई...

Urmi said...

बहुत सुन्दर और शानदार दोहे लिखे हैं आपने ! हर एक दोहे एक से बढ़कर एक है! बधाई!
मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
http://seawave-babli.blogspot.com/

रेखा said...

दुख के भीतर ही छुपा, सुख का सुमधुर स्वाद,
लगता है फल, फूल के, मुरझाने के बाद।

लाजबाब और बेमिसाल दोहे ...

Suman said...

विपदा को मत कोसिए, करती यह उपकार,
बिन खरचे मिलता विपुल, अनुभव का उपहार।
सच है विपदा से अनुभव मिलता है ....
हर पंक्ति सुंदर सिख देती है !
आभार मेरे ब्लॉग पर आने का !

Suman said...
This comment has been removed by the author.
Monika Jain "मिष्ठी" said...

bahut hi achche dohe...aabhar

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 19-12-2011 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

vandana said...

दुख के भीतर ही छुपा, सुख का सुमधुर स्वाद,
लगता है फल, फूल के, मुरझाने के बाद।
विपदा को मत कोसिए, करती यह उपकार,
बिन खरचे मिलता विपुल, अनुभव का उपहार।

बहुत अच्छे दोहे

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया दोहे!

रश्मि प्रभा... said...

विपदा को मत कोसिए, करती यह उपकार,
बिन खरचे मिलता विपुल, अनुभव का उपहार।
...bahut hi badhiyaa

Bharat Bhushan said...

सभी दोहे बहुत सुंदर बन पड़े हैं. यह तो हर मन प्यारा लग रहा है-
विपदा को मत कोसिए, करती यह उपकार,
बिन खरचे मिलता विपुल, अनुभव का उपहार।
क्या बात है!!

सदा said...

वाह ...बहुत खूब ।

Kailash Sharma said...

बहुत सुंदर दोहे...हरेक दोहा एक सुंदर सीख देते हुए..

Sunil Kumar said...

समर भूमि संसार है, विजयी होते वीर,
मारे जाते हैं सदा, निर्बल-कायर-भीर।
सार्थक दोहे................

ZEAL said...

विपदा को मत कोसिए, करती यह उपकार,
बिन खरचे मिलता विपुल, अनुभव का उपहार...

---

Fantastic couplets Mahendra ji . Sweet fragrance of your indepth knowledge is quite evident in this creation. Each couplet is providing an effective solution in difficult situations.

.

ऋता शेखर 'मधु' said...

सभी दोहे बहुत ही सुन्दर सीख देते हुए..

aniruddh said...

इन दोहों के साथ आपकी अन्य कविताएं भी पढ डालीं हैं । गीतिका --दिन ,क्षणिकाएं बहुत अच्छी लगीं ।

Navin C. Chaturvedi said...

आ. वर्मा जी आप के ये सात दोहे, सात दोहे न हो कर सात समंदरों से निकले हुए रत्नों के समान हैं। हर दोहा किसी न किसी सिद्धान्त की सम-सामयिकता को अधिक प्रासंगिक बना रहा है। आप के ब्लॉग पर आना एक बार फिर सुकार्थ हुआ। नमन। इस बार मैं किसी एक दोहे को कोट नहीं कर पा रहा, फिर भी ईश्वर पूजा वाला दोहा पढ़ कर अत्यधिक गदगद हुआ जा रहा हूँ।

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

दोहे अच्छे लगे । पीछे वाली भी कुछ पोस्ट देखी हैं । दिन कविता ,क्षणिकाएं आदि शानदार रचनाएं हैं ।

Latest Bollywood News said...

Very Nice post our team like it thanks for sharing

Rakesh Kumar said...

विपदा को मत कोसिए, करती यह उपकार,
बिन खरचे मिलता विपुल, अनुभव का उपहार।

बहुत ही शिक्षाप्रद,प्रेरक व अनूठी प्रस्तुति है आपकी.
पढकर मन प्रसन्न हो गया है.

बहुत बहुत आभार.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,महेंद्र भाई.

Ashok Bajaj said...

अच्छी रचना .

veerubhai said...

दुख के भीतर ही छुपा, सुख का सुमधुर स्वाद,
लगता है फल, फूल के, मुरझाने के बाद।
जीवन का सार तत्व तात्विक विवेचना लिए हैं ये दोहे .

अमित शर्मा said...

@ प्राकृत चीजों का सदा, कर सम्मान सुमीत,
ईश्वर पूजा की यही, सबसे उत्तम रीत।

# सार्थक रचना द्वारा अनुपम सन्देश !

दिगम्बर नासवा said...

सुन्दर भाव लिए ... लाजवाब हैं सभी दोहे ....

Kailash Sharma said...

भाँति-भाँति के सर्प हैं, मन जाता है काँप,
सबसे जहरीला मगर, आस्तीन का साँप।

....सभी दोहे बहुत सुंदर और सार्थक...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

दुख के भीतर ही छुपा, सुख का सुमधुर स्वाद,
लगता है फल, फूल के, मुरझाने के बाद।

sundar dohe.

dheerendra said...

बेहतरीन दोहे,मुझे ऐसा लगा कि कबीर दास जी के दोहे पढ़ रहा हूँ,..लाजबाब रचना,...बधाई

मेरी नई पोस्ट के लिए काव्यान्जलि मे click करे

Apanatva said...

Anmol motee fir bikhara hee diye aapne .

Reena Maurya said...

सभी दोहे अति उत्तम है...
खासकर ये...
विपदा को मत कोसिए, करती यह उपकार,
बिन खरचे मिलता विपुल, अनुभव का उपहार।...