May 21, 2015

कृष्ण विवर

कुछ भी नहीं था
पर शून्य भी नहीं था
चीख रहे उद्गाता ।

जगती का रंगमंच
उर्जा का है प्रपंच,
अकुलाए-से लगते
आज महाभूत पंच,

दिक् ने ज्यों काल से
तोड़ लिया नाता।

न कोई तल होगा
न ही कोई शिखर,
अस्ति और नास्ति को
निगलेगा कृष्ण विवर,

तुम्ही जानते हो
न जानते विधाता।

                    
-महेन्द्र वर्मा

10 comments:

Bharat Bhushan said...

उद्गाता ने जो समझ लिया वह गा दिया. विधाता ने अभी गायन सीखना है. दार्शनिक भाव से भरी कविता.

dj said...

सार्थक प्रस्तुति आदरणीय

Ashutosh said...

सार्थक प्रस्तुतिकरण !
हिंदीकुंज

Kavita Rawat said...

बहुत सुन्दर..

कहकशां खान said...

बहुत शानदार और सार्थक प्रस्‍तुति के लिए धन्‍यवाद।

रचना दीक्षित said...

विधि का विधान तो विधाता ही जनता है. बहुत गूढ़ भाव लिए सुंदर प्रस्तुति.

Shanti Garg said...

सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार...

दिगंबर नासवा said...

गहरा दर्शन समेटे भाव ...

Mithilesh dubey said...

बहुत ही उम्दा।

http://chlachitra.blogspot.in/
http://cricketluverr.blogspot.in/

Kailash Sharma said...

न कोई तल होगा
न ही कोई शिखर,
अस्ति और नास्ति को
निगलेगा कृष्ण विवर,

...वाह...बहुत सुन्दर और गहन अभिव्यक्ति..