विदेशी साज पर देशी राग

 




भारतीय शास्त्रीय संगीत की दोनों पद्धतियों, हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत में एकल वाद्य-वादन का उतना ही महत्वपूर्ण स्थान है जितना एकल गायन का । सदियों पहले शास्त्रीय संगीत में वाद्यों की संख्या सीमित थी । बाद की शताब्दियों में नए-नए वाद्ययंत्रों का निर्माण होता गया । भारतीय शास्त्रीय वाद्य-यंत्रों की संरचना इस तरह होती है कि वे भारतीय संगीत की विशेषताओं का संपूर्ण प्रकटीकरण कर सकें । गुणी संगीतज्ञों ने कुछ लोकवाद्यों को भी शास्त्रीय संगीत में प्रतिष्ठित किया । स्व. पं. पन्नालाल घोष को बाँसुरी और स्व. उस्ताद बिसमिल्लाह ख़ान को शहनाई जैसे लोकवाद्यों को शास्त्रीय संगीत में स्थापित करने का श्रेय जाता है । इन लोकवाद्यों के माध्यम से इन महान संगीतज्ञों ने शास्त्रीय संगीत के भावों और रसों को श्रेष्ठतम रूप में प्रस्तुत किया । इसी प्रकार कुछ ऐसे भी गुणी कलाकार हुए हैं जिन्होंने विदेशी वाद्ययंत्रों को भारतीय शास्त्रीय संगीत में विशिष्ट पहचान दिलाने में सफलता प्राप्त की । इन वाद्यों का भारत में प्रचलन अंग्रेजों के शासन काल में हुआ । ऐसे वाद्ययंत्रों में वायलिन, गिटार, मैंडोलिन, सैक्सोफोन और हारमोनियम प्रमुख हैं । आइए, इन वाद्यों के भारतीय शास्त्रीय संगीत में अपनाए जाने के संबंध में विस्तार से जानें ।

वायलिन- वायलिन दुनिया के सबसे लोकप्रिय वाद्ययंत्रों में से एक है । इटली के आन्द्रे अमाती ने 1555 ई. में आधुनिक वायलिन का निर्माण किया था । भारत में इस वाद्य का आगमन 1790 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के बैण्ड द्वारा हुआ । कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध संगीतकार बालुस्वामी दीक्षितर ने 1806 ई. में मद्रास के फोर्ट सेंट जार्ज में सेना के बैण्ड मास्टर से वायलिन सीखना प्रारंभ किया । उन्होंने वायलिन को कर्नाटक शैली के संगीत के लिए उपयुक्त पाया । शीघ्र ही वे वायलिन वादन में दक्ष हो गए और मंचों पर गायक कलाकारों के साथ संगत करने लगे । इस प्रकार बालुस्वामी दीक्षितर को भारतीय वायलिन का जनक माना जाता है । इनके बड़े भाई प्रसिद्ध संगीतज्ञ, कवि और कृतिकार मुत्तुस्वामी दीक्षितर के शिष्य वादिवेलु ने भी वायलिन को अपनाया और इसे कर्नाटक संगीत में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी ।

उत्तर भारतीय हिंदुस्तानी संगीत में वायलिन का प्रवेश प्रसिद्ध संगीत गुरु उस्ताद अलाउद्दीन ख़ान के माध्यम से 1930 ई. में हुआ । वे अनेक वाद्ययंत्र बजाने में दक्ष थे । उनके एक शिष्य पं वी.जी. जोग प्रसिद्ध वायलिन वादक हुए । उनके एक अन्य शिष्य संगीतकार तिमिर बरन ने वायलिन को फिल्म संगीत में पहली बार शामिल किया । बाद में हिंदुस्तानी और कर्नाटक दोनों शैलियों के अनेक कलाकारों ने वायलिन को अपनाया और प्रसिद्धि प्राप्त की । अब तो वायलिन कर्नाटक संगीत का अभिन्न अंग बन चुका है । एकल वादन के अलावा संगत के लिए अब वायलिन का ही प्रयोग होता है । इसके पहले संगत के लिए वीणा का प्रयोग होता था । वर्तमान में हिंदुस्तानी संगीत में पद्मभूषण विदुषी एन. राजम् और कर्नाटक संगीत में पद्मभूषण विद्वान एल. सुब्रमण्यम् वायलिन के श्रेष्ठ और वरिष्ठ कलाकार एवं संगीतगुरु हैं ।
 

गिटार- सन् 1941 ई. में हवाई द्वीप से एक गिटार कलाकार ताउ मो अपनी टीम के साथ कोलकाता   आया । वे हवाईयन स्लाइड गिटार बजाते थे । उनकी टीम भारत में 8 वर्षों तक रही । इस दौरान वे अपने संगीत का प्रदर्शन करते रहे । वे कोलकाता के संगीत प्रेमियों की माँग पर  गिटार बनाते और बेचते भी थे । एक बार राजस्थान का एक युवा ब्रजभूषण काबरा कोलकाता गए । वहां उन्होंने हवाईयन स्लाइड गिटार की आवाज सुनी और उस पर मोहित हो कर एक गिटार खरीद ली। उन्हें लगा कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को इस वाद्य से बख़ूबी प्रस्तुत किया जा सकता है । प्रसिद्ध़ सरोद वादक उस्ताद अली अकबर ख़ान से ब्रज भूषण काबरा ने संगीत की बारीकियों को सीखा । शीघ्र ही वे रागों को स्लाइड गिटार पर कुशलतापूर्वक बजाने लगे । 1961 ई. से वे शास्त्रीय संगीत के मंचों से अपने वाद्य पर एकल वादन प्रस्तुत करने लगे। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार विजेता पं. काबरा ने गिटार पर तरब के तार लगाकर गिटार का भारतीयकरण किया । इस प्रकार पश्चिमी वाद्य गिटार पर हिंदुस्तानी संगीत के रागों को प्रस्तुत करने वाले पहले भारतीय पं ब्रजभूषण काबरा हैं ।

वर्तमान में भारत में हिंदुस्तानी संगीत के श्रेष्ठ स्लाइड गिटार वादक, ग्रेमी पुरस्कार विजेता पं विश्व मोहन भट्ट हैं । हिंदुस्तानी रागों की शिक्षा पं. भट्ट ने प्रसिद्ध सितार वादक पं. रविशंकर से प्राप्त की है । इन्होंने गिटार के स्वरूप को और परिमार्जित कर उसे ‘मोहन वीणा’ नाम दिया । गिटार को हिंदुस्तानी संगीत में लोकप्रिय बनाने का श्रेय पद्मभूषण पं. विश्व मोहन भट्ट को है । स्लाइड गिटार के एक और प्रसिद्ध संगीतज्ञ पं. देवाशीष भट्टाचार्य हैं जो हिंदुस्तानी संगीत के साथ-साथ पश्चिमी संगीत के दक्ष कलाकार हैं । वे भारतीय गिटार के तीन नए स्वरूपों- चतुरंगी, गंधर्वी और आनंदी के जनक हैं ।

सैक्सोफ़ोन- सैक्सोफ़ोन मूल रूप से बेल्जियम का वाद्य है । 1846 ई. में एडोल्फ़ जोसेफ सैक्स नामक एक संगीत वाद्य निर्माता ने एक वाद्ययंत्र बनाया जिसे निर्माता के नाम पर सैक्सोफोन कहा गया । भारत में यह वाद्य 19 वीं सदी के अंत में ब्रिटिश सेना के बैण्ड के साथ आया । फ़िल्म संगीत में सैक्सोफ़ोन का उपयोग 1960 ई. के आसपास शुरू हुआ । सैक्सोफ़ोन में भारतीय शास्त्रीय संगीत प्रस्तुत करने की शुरुआत कर्नाटक के पं. गोपाल नाथ कादरी ने की । 1957 ई. में पं. कादरी ने मैसूर पैलेस बैण्ड में पहली बार सैक्सोफ़ोन सुना । नादस्वरम् बजाने वाले पं. कादरी को सैक्सोफ़ोन की आवाज़ ने आकर्षित किया । उन्होंने कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध संगीतज्ञ विद्वान टी.वी. गोपालकृष्णन् से संगीत सीखा और सैक्सोफ़ोन वादन में दक्षता प्राप्त की। पद्मश्री से सम्मानित पं. कादरी ने अपनी अनूठी कला का देश-विदेश में अनेक प्रदर्शन किया और ख्याति अर्जित की । भारत में उन्हें ‘सैक्सोफ़ोन चक्रवर्ती’ के रूप में प्रसिद्धि मिली । पं. कादरी के एक शिष्य सैक्सोफ़ोन वादक प्रशांत राधाकृष्णन् उनकी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं ।

मैंडोलिन- वर्तमान में जिस मैंडोलिन का प्रयोग संगीतकार करते हैं उसका निर्माण सबसे पहले 19 वीं शताब्दी में इटली के वाद्य निर्माता पास्कल विनाचिया ने किया था । मैंडोलिन का प्राचीन रूप मैंडोरा 18 वीं शताब्दी में इटली में ही प्रचलित था । 1913 ई. में यह वाद्य अंग्रेजों और पुर्तगालियों के माध्यम से भारत आया । प्रख्यात संगीत गुरु विष्णु दिगंबर पलुस्कर के गंधर्व संगीत विद्यालय में मैंडोलिन वादन भी सिखाया जाता था । फिल्म और सुगम संगीत में वायलिन का प्रयोग 1930 के दशक से होने लगा था किंतु भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए यह वाद्य अनुपयुक्त माना जाता था ।

1940-50 के दशक में सिने संगीतकार सज्जाद हुसैन मैंडोलिन पर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत भी बजाया करते थे। हिंदुस्तानी संगीत के क्षेत्र में कोई भी मैंडोलिन वादक प्रसिद्ध नहीं हुआ लेकिन कर्नाटक संगीत में एक संगीतज्ञ ऐसा हुआ जिसने कर्नाटक संगीत के क्षेत्र में मैंडोलिन को शास्त्रीय वाद्य के रूप में विशिष्ट पहचान दिलाई । ये थे आंध्रप्रदेश के स्व. यू. श्रीनिवास जो ‘मैंडोलिन श्रीनिवास’ नाम से प्रसिद्ध हुए । इनके गुरु श्री रुद्रराजू सुब्बाराजू कर्नाटक संगीत के रागों का गायन करते और श्रीनिवास मैंडोलिन पर बजाते जाते । उन्होंने वासुराव से पाश्चात्य संगीत भी सीखा । 1978 ई. में 9 वर्ष की उम्र में इन्होंने एक समारोह में मैंडोलिन में कर्नाटक संगीत प्रस्तुत किया और प्रशंसा अर्जित की । तब से पद्मश्री यू. श्रीनिवास निरंतर देश-विदेश में कर्नाटक और पाश्चात्य संगीत दोनों का कुशलतापूर्वक प्रदर्शन करते रहे । वर्तमान में हिंदुस्तानी संगीत में श्री स्नेहाशीष मजूमदार और कर्नाटक संगीत में यू. राजेश तथा सुरेश कुमार सुपरिचित शास्त्रीय मैंडोलिन वादक हैं ।
 

हारमोनियम- भारत में हर प्रकार के संगीत के साथ हारमोनियम इतना धुल-मिल गया है कि लगता ही नहीं कि यह कोई विदेशी वाद्य है । यह मूलतः डेनमार्क का वाद्ययंत्र है । 18वीं शताब्दी में कोपेनहेगेन के गॉट्लीब क्रेट्जेंस्टीन ने हारमोनियम का आविष्कार किया था जो शरीर विज्ञान के प्रोफेसर थे । 19वीं सदी में यह पूरे यूरोप में प्रचलित हो गया । इस सदी के अंत में ईसाई मिशनरियों द्वारा हारमोनियम भारत लाया गया । भारत में हारमोनियम का निर्माण 1925 ई. में आरंभ हुआ । गीत, भजन-कीर्तन, फिल्म संगीत आदि के साथ मराठी नाटक मंडलियों में हारमोनियम का व्यापक उपयोग होने लगा । शास्त्रीय संगीत में इसका प्रयोग गायन के साथ संगत वाद्य के रूप में इसी समय प्रारंभ हुआ । इसके पहले शास्त्रीय गायन में संगत वाद्य के रूप में केवल सारंगी का प्रयोग होता था । अब शास्त्रीय गायन में सारंगी या हारमोनियम और कभी-कभी दोनों का प्रयोग होता है ।
 

ग्वालियर घराने के संगीतज्ञ पं. गणपत राव के साथ-साथ कोल्हापुर के पं. गोविंदराव टेंबे को शास्त्रीय संगीत में हारमोनियम का प्रयोग प्रारंभ करने का श्रेय दिया जाता है । यद्यपि  तब हारमोनियम को भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रकृति के अनुकूल वाद्य नहीं माना जाता था । इसीलिए आकाशवाणी ने 1940 से 1971 ई. तक शास्त्रीय संगीत के लिए हारमोनियम को प्रतिबंधित कर दिया था । कर्नाटक संगीत में आज भी हारमोनियम का प्रयोग नहीं किया जाता क्योंकि कर्नाटक संगीत में जिन स्वरों का प्रयोग होता है वे सभी स्वर हारमोनियम में नहीं होते । लेकिन हिंदुस्तानी संगीत में यह अब लोकप्रिय हो चुका है । आर. के. बीजापुरे और पद्मश्री पं. तुलसीदास बोरकर ने हारमोनियम में संगत करने एवं एकल शास्त्रीय संगीत प्रस्तुत करने की परंपरा को आगे बढाया । वर्तमान में मिलिंद कुलकर्णी, सुवेंदु बनर्जी, सुधीर नायक आदि प्रसिद्ध हारमोनियम वादक हैं ।


-महेन्द्र वर्मा

5 comments:

Amrita Tanmay said...

सुखद आश्चर्य हुआ विदेशी साज के विषय में जानकर ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (01-09-2021) को चर्चा मंच   "ज्ञान परंपरा का हिस्सा बने संस्कृत"  (चर्चा अंक- 4174)  पर भी होगी!--सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार करचर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   

मन की वीणा said...

गहन ,रोचक, जानकारी वाद्य यंत्रों पर, देशी और विदेशी वाद्य यंत्रों का सुंदर समायोजन ने शास्त्रिय संगीत को और भी उत्कृष्टता और प्रसिद्धि दी है ।
वृहद जानकारी।
सुंदर पोस्ट।

virendra sharma said...

गहन शोधपरक आलेख है :शाश्वत शिल्प पर दरअसल संगीत की आत्मा एक है जो सभी वाद्यों में मुखरित होती है। संगीत की एक सार्वत्रिक व्याख्या है प्रेम -योग सांख्य भाव सम्मोहन

Zee Talwara said...

महेन्द्र वर्मा जी, वाह ! बड़ा ही सुन्दर लेख लिखा है आपने। इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। Visit Our Blog