तानाशाहों की मानसिक प्रवृत्तियाँ





19 वीं शताब्दी तक दुनिया के अधिकांश देशों में राजतंत्र था तब राज्य के प्रमुख शासक को राजा, सम्राट आदि कहा जाता था । अपनी असीमित शक्तियों का प्रयोग करने वाले इनमें से कुछ राजा निरंकुश और अत्याचारी भी हुए । राज और राजा तो अब नहीं रहे किंतु कुछ आधुनिक शासकों में निरंकुशता आज भी देखी जा सकती है । इन आधुनिक शासकों को तानाशाह कहा जाता है। 20 वीं सदी में ऐसे ही कुछ तानाशाहों ने सत्ता के मद में मानवजाति के साथ नृशंस अत्याचार किया । इनके सनकीपन के कारण राजनीतिक हत्याओं और महायुद्धों में लाखों निर्दोष लोगों की जानें गईं । पिछली शताब्दी में जर्मनी के एडोल्फ हिटलर, इटली के बेनिटो मुसोलिनी, स्पेन के फ्रांसिस्को फ्रैंको, युगांडा के ईदी अमीन, ईराक के सद्दाम हुसैन जैसे दर्जनों तानाशाहों ने अपने क्रूर कारनामों से मानवता को कलंकित किया है । आखिर वे कौन से गुण, बल्कि दुर्गुण हैं जो एक शासक को तानाशाह बनाते हैं, इसे जानने के लिए अनेक इतिहासकारों, राजनैतिक विश्लेषकों और मनोवैज्ञानिकों ने शोध किया है । इन पर अनेक लेख, शोध-पत्र और किताबें प्रकाशित हुई हैं । प्रस्तुत लेख में इन्हीं पर आधारित कुछ ऐसे तथ्यों का उल्लेख किया गया है जो एक तानाशाह की मानसिक प्रवृत्तियों का खुलासा करते हैं ।
 
 
तानाशाहों की मानसिक प्रवृत्तियों के संबंध में शोधकर्ताओं ने कुछ मुख्य लक्षणों का विवरण दिया है । इस संबंध में ‘टाइम’ पत्रिका के प्रतिष्ठित लेखक जॉन क्लाउड लिखते हैं- ‘‘नए शोधों ने हमें यह समझने के लिए पहले से कहीं अधिक स्पष्ट व्याख्या प्रस्तुत की है कि नेता निरंकुश कैसे बनते हैं । शोध करने वाले मनोवैज्ञानिकों ने तानाशाही व्यवहार के लिए कम-से-कम तीन स्पष्टीकरण दिया है : 1. तानाशाह असामाजिक व्यक्तित्व विकार से ग्रस्त होते हैं । ये न केवल दूसरों से झूठ बोलते हैं बल्कि स्वयं से भी झूठ बोलते हैं । 2. तानाशाह नार्सीसिस्ट होते हैं । मनोविज्ञान की भाषा में नार्सीसिस्ट उन्हें कहा जाता है जो आत्ममुग्धता से ग्रस्त होते हैं । ये स्वयं और दूसरों के साथ अपने संबंधों को वास्तविक रूप में देखने की क्षमता खो देते हैं । वे खुद को एक वीर के रूप में देखते हैं । वे आसपास की वास्तविकताओं को अनदेखा करते हैं । ऐसे नेता उन उपलब्धियों का श्रेय खुद लेने के इच्छुक होते हैं जिन्हें दूसरों ने हासिल किया हो । 3. तानाशाह प्रारंभ में सामान्य व्यक्ति होते हैं किंतु सत्ता प्राप्ति के बाद उनमें मानसिक विकार उत्पन्न होने लगते हैं । चूँंकि तानाशाह झूठ बोलते हैं और ऐसा करने के लिए उन्हें कई जरूरी बातों की अनदेखी करनी पड़ती है जैसे, सच्चाई, सामाजिक मानदंड, दूसरों के हितों का विचार आदि । इन बातों का दमन उनमें मानसिक विकार उत्पन्न करता है ।’’
 
 
‘सायकोलॉजी टुडे’ पत्रिका में मनोविश्लेषक डॉ. जेम्स फालन ने तानाशाहों को मानसिक विकार से ग्रस्त बताते हुए एक लेख में लिखा है- ‘‘तानाशाह सत्ता के असीम भूखे होते हैं । वे बेहद आत्मसम्मोहित, झूठ बोलने में माहिर और संकीर्ण मानसिकता के होते हैं । वे अपने विरोध को बिल्कुल सहन नहीं कर पाते और उस विरोध का विरोध करने के लिए निरंतर सक्रिय रहते हैं । यह घातक मनोरोग मेगालोमैनिया का स्पष्ट संकेत है जिसके रोगियों को संतुष्ट करना लगभग असंभव होता है । ऐसे तानाशाह इन लक्षणों को भी प्रदर्शित करते हैं- जीवन शैली में भव्यता और कृत्रिम आकर्षण, घमंड और दूसरों को कष्ट पहुँचाना ।’’ इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार, ‘‘तानाशाह आमतौर पर निरंकुश राजनीतिक शक्ति हासिल करने के लिए धोकाधड़ी और झूठ का सहारा लेते हैं । वे डराने-धमकाने, आतंक और बुनियादी नागरिक स्वतंत्रता के दमन के माध्यम से अपनी निरंकुशता को बनाए रखते हैं ।’’

 
फासिज्म पर शोध करने वाले कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ए. जेम्स ग्रेगोर सामाजिक और व्यावहारिक विज्ञान के अंतर्राष्ट्रीय विश्वकोष में आधुनिक तानाशाही के संबंध में लिखते हैं- ‘‘आधुनिक तानाशाही स्वभाव में लोकलुभावन होती है । वे नियंत्रित चुनावों के माध्यम से अपने लिए जनमत संग्रह की पुष्टि चाहते हैं । ये अपने नेतृत्व को ‘करिश्माई’ दर्शाते हुए सत्तासुख का आनंद लेते हैं । उत्तर कोरिया ऐसी प्रणाली का एक उदाहरण है । आधुनिक तानाशाही ने एक सशक्त राष्ट्रवाद की विशेषताओं को ग्रहण किया है । उदाहरण के लिए रूस के लेनिन और जर्मनी के हिटलर ने यही किया । उन्होंने वर्ग पर आधारित अपनी विचारधारा की प्रतिबद्धता को लोकप्रिय बनाए रखने के लिए ‘देशभक्ति’ का सहारा लिया ।’’
 
 
टिलबर्ग विश्वविद्यालय, नीदरलैंड के प्रोफेसर डॉ. ए.जे.ए. बिज्स्टरवेल्ड ने अपने एक शोधपत्र में तानाशाह, अतिराष्ट्रवाद और नस्लवाद के संबंधों के विषय में लिखा है- ‘‘इटली के तानाशाह मुसोलिनी के विचारों का अधिकांश हिस्सा अतिराष्ट्रवाद से संचालित है । मुसोलिनी का मानना था कि इतालवी जाति अन्य जातियों से श्रेष्ठ है । उसने इतावली लोगों के संबंध में कहा कि ये दुनिया के अन्य लोगों के लिए शिक्षा और संस्कृति के स्रोत हैं । हिटलर एक कुशल वक्ता था । उसके मोहक भाषण राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द ही बुने हुए होते थे । मुसोलिनी की तरह हिटलर ने भी जर्मन जाति को सर्वोच्च बताया । उसने न केवल इस बात पर जोर दिया कि वह जर्मनी को उसकी पूर्व महानता में कैसे वापस लाएगा बल्कि इस पर भी कि अन्य लोगों ने जर्मनी को उस महानता तक पहुँचने के लिए कैसे रोका । अपने दुश्मनों के खिलाफ आक्रामक भाषा का प्रयोग कर उक्त विचारों को प्रचारित करने में वह सफल रहा । इन तानाशाहों ने सत्ता में आने के लिए चुनावों में भी हेर-फेर किया । सत्ता में आने से पहले और बाद में विपक्ष को पंगु बनाने के लिए हिंसा का इस्तेमाल किया ।
 
 
तानाशाहों की मानसिक स्थिति का विश्लेषण करने वाले मनोवैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि सत्ता में अपनी सर्वशक्तिमानता के बावजूद वे अत्यधिक चिंता से पीड़ित होते हैं । वेन स्टेट विश्वविद्यालय के डॉ. डेविन नारहोम और डॉ. सैमुअल हनले ने ‘तानाशाहों का मनोविज्ञान : शक्ति, भय और चिंता’ शीर्षक से प्रकाशित अपने एक लेख में लिखा है- ‘‘तानाशाह अधिकतर नागरिक विद्रोह अथवा स्वयं पर आ सकने वाले किसी अज्ञात खतरे से चिंतित रहते हैं । उनकी यह चिंता उनके व्यवहार से प्रदर्शित होती है, जैसे ईराक का सद्दाम हुसैन दूसरों को भ्रमित करने के लिए अपने डुप्लीकेट प्रतिरूपों का उपयोग करता था । एक बर्मी तानाशाह थान श्वे ने अपनी राजधानी सुनसान जंगल में बना ली थी । इसी चिंता से बचने के लिए वे स्वयं के अद्वितीय होने का भ्रम भी रचते हैं, जैसे, सद्दाम हुसैन ने खुद को ईराक का उद्धारकर्ता घोषित किया, लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी ने खुद को अफ्रीका के ‘राजाओं का राजा’ कहा ।’’ लेखकद्वय आगे लिखते हैं- ‘‘तानाशाह संकीर्ण सोच वाले होते हैं । संकीर्णतावादी लोग उन व्यक्तियों को दंडित करने की तीव्र भावना रखते हैं जो उनके काम का नकारात्मक मूल्यांकन करते हैं । ऐसे तानाशाह विरोधियों की हत्या करवा देते हैं या उन्हें जेल में डाल देते हैं । वे विरोध सहन नहीं कर सकते, खुश रहने के लिए उन्हें अत्यधिक प्रशंसा और समर्थन की चाह होती है ।’’
 
 
डच इतिहासकार फ्रैंक डिकोटर की लिखी पुस्तक ‘हाउ टू बी ए डिक्टेटर’ में तानाशाहों के व्यक्तित्व, चरित्र और व्यवहार का विस्तृत वर्णन है । ऊपर की पंक्तियों में जो तथ्य हैं वे सभी इस पुस्तक में तो हैं ही, तानाशाह के स्वभाव से संबंधित कुछ और तथ्यों का भी विवरण है । डिकोटर लिखते हैं- ‘‘ज्यादातर तानाशाह अपनी भावनाओं को छिपाने में माहिर होते हैं । मुसोलिनी ने खुद को इटली के बेहतरीन अभिनेता के रूप में देखा । हिटलर ने भी खुद को यूरोप का सबसे महान कलाकार कहा । तानाशाह के समर्थक उनकी पूजा करते हैं । वे विरोधियों की निगरानी करते हैं और तानाशाह के कार्यों की आलोचना करने वालों की निंदा करते हैं, उनकी गरिमा को कुचलते हैं । ये समर्थक व्यापक जन-सहमति का भ्रम पैदा करते हैं । प्रायः तानाशाह लोगों की धार्मिक भावनाओं का भी शोषण करते हैं । हिटलर ने जनता के साथ अर्धधार्मिक रूप से जुड़ते हुए खुद को एक मसीहा के रूप में प्रस्तुत किया । मुसोलिनी ने जानबूझ कर ईसाई धर्मनिष्ठा की भक्ति और पूजा की भावनाओं को प्रोत्साहित किया ।’’ डिकोटर ने यह भी लिखा है- ‘‘हिटलर के पास खुद को छोड़कर राष्ट्रवाद और यहूदी विरोधी अपील के अलावा  और कुछ नहीं था । 
 
तानाशाहों के सोचने और कार्य करने के तरीकों के संबंध में उपर दिए गए विवरण यह स्पष्ट करते हैं कि तानाशाह मानवता और निरापद जीवन जीने के अधिकारों का हनन करते हैं । ऐसी मानसिकता वाले शासक प्रजातंत्र को कमजोर करते हैं । इसका विपरीत कथन भी उतना ही सही है, यदि प्रजातंत्र कमजोर होता है तो ऐसे तानाशाह सत्ता पर कब्जा कर लेते हैं । नोबल पुरस्कार प्राप्त नाइजीरियाई साहित्यकार सोयिन्का ने कहा था- ‘‘एक तानाशाही के तहत राष्ट्र का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, जो कुछ बचता है वह एक जागीर है और केवल गुलामों की दुनिया ।''  
 
-महेन्द्र वर्मा


जिज्ञासा और तर्क - मनुष्य के धर्म



 

मनुष्य और अन्य प्राणियों में महत्पूर्ण अंतर यह है कि मनुष्य में सोचने, तर्क करने और विकसित भाषा का प्रयोग करने की क्षमता होती है । शेष कार्य तो सभी प्राणी न्यूनाधिक रूप से करते ही हैं । उक्त विशेष गुणों के कारण ही मनुष्य में जिज्ञासा की प्रवृत्ति होती है । 16 वीं शताब्दी के फ्रांसीसी गणितज्ञ-दार्शनिक रेने दकार्त का प्रसिद्ध वाक्य है- ‘‘मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ ।’’ दकार्त को सबसे पहले स्वयं के अस्तित्व के संबंध में ही जिज्ञासा हुई । उसने कहा कि चूँकि में सोच सकता हूँ, तर्क कर सकता हूँ इसलिए बिना संदेह के मेरा अस्तित्व है । इस कथन में यह तात्पर्य भी छिपा हुआ है कि यदि कोई मनुष्य तर्क नहीं करता, जिज्ञासा नहीं करता, सोचता नहीं है तो उसे अपने मनुष्य होने पर संदेह करना चाहिए ।
 

मनुष्य जब अपने विकास की प्रारंभिक अवस्था में था तब उसकी बुद्धि विकसित चौपायों से किंचित ही अधिक थी । समय के साथ-साथ प्रकृति के नियमों के आधार पर मनुष्य के शरीर और बुद्धि में विकास हुआ फलस्वरूप भावनाओं का भी विकास हुआ । अब वह प्राकृतिक  और घटनाओं को देख कर आश्चर्यचकित और भयभीत भी होने लगा । बुद्धि का जब और विकास हुआ तब मनुष्य में  जो एक नई प्रवृत्ति जागृत हुई वह थी जिज्ञासा, प्रकृति में हो रही विभिन्न घटनाओं को और अधिक जानने-समझने की जिज्ञासा, कार्य के पीछे छिपे कारण को जानने की जिज्ञासा । इस जिज्ञासा को प्रेरित किया आश्चर्य और भय ने । यहीं से शुरुआत होती है मनुष्य की चिंतन-प्रक्रिया और उसके द्वारा किए जाने वाले आविष्कारों की । पत्थर का औजार मनुष्य द्वारा आविष्कृत और निर्मित पहला जीवनोपयोगी साधन या ‘यंत्र’ था । इस साधन के निर्माण में केवल जिज्ञासा का योगदान नहीं था बल्कि बुद्धि का एक और गुण ‘तर्क’ का भी योगदान था । फिर तो हज़ारों-लाखो वर्षों की अवधि में मनुष्य ने जिज्ञासा और तर्क के सहारे तीर-कमान, आग, नाव, पहिया, झोपड़ी, वस़्त्र, कृषि, वाद्ययंत्र, भाषा आदि से लेकर कृष्ण विवर, ईश्वरीय कण, तंतु सिद्धांत, जीनोम, कृत्रिम बौद्धिकता आदि तक की खोज कर ली।
 

यह स्वयंसिद्ध है कि सभी मनुष्यों में जिज्ञासा और तर्क की क्षमता एक समान नहीं होती । आदिम मनुष्यों में से कुछ की जिज्ञासा और तार्किक क्षमता ने खोज और आविष्कार की बजाय एक अलग रास्ते का वरण किया । प्राकृतिक घटनाओं से वे भी चकित और भयभीत हुए । उन्होंने भी ‘कार्य और कारण’ के संबंध में ही विचार किया किंतु अधिक तर्क न कर सीधे निष्कर्ष पर पहुँच गए । उन्होंने प्रकृति की शक्तियों पर देवत्व का आरोपण किया । दुनिया के अनेक प्राचीन सभ्यताओं के विविध अवशेषों में इसके साक्ष्य मिलते हैं । प्रारंभ में प्राकृतिक शक्तियों को देवता माना जाना भावनात्मक निष्कर्ष है, तार्किक नहीं । क्योंकि ये सभी शक्तियांँ, जैसे, सूर्य, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वनस्पति आदि सभी प्राणियों के जीवन का पोषण करती हैं इसलिए इन्हें देवतुल्य सम्मान देना तब स्वाभाविक ही था । इस तरह मनुष्य की जिज्ञासा  और तर्क ने दो विचारधाराओं को जन्म दिया जो  मनुष्य की चिंतन-संस्कृति की नींव बनीं । आज ये दोनों विचार धाराएँ विज्ञान और दर्शन के नाम से जानी जाती हैं।
 

दर्शन के विषय-वस्तुओं में जिज्ञासा के बहुत सारे विषय थे । उनमें से जिनका उत्तर प्रत्यक्ष रूप से दिया जा सकता था वे सब विज्ञान के हिस्से में आ गए । जैसे, सृष्टि की रचना कैसे हुई, पदार्थ के मूल तत्व क्या हैं, परम तत्व (उर्जा) क्या है, समय और आकाश क्या है आदि प्रश्नों के उत्तर वैज्ञानिक देने लगे हैं । दर्शन में कुछ प्रश्न ऐसे थे जिनका उत्तर तार्किक रूप से देना संभव ही नहीं है, जैसे, ईश्वर का अस्तित्व, स्वर्ग-नर्क, आत्मा आदि । ऐसे प्रश्नों को आस्था का आधार मिला और इनके तर्क से परे उत्तरों को धर्म की संज्ञा दी गई । इस प्रकार दर्शन का विचार-क्षेत्र धर्म और विज्ञान में विभाजित हो गया । सुकरात और उपनिषदों से प्रारंभ हुई दार्शनिक चिंतन की परंपरा हीगेल और आदि शंकराचार्य तक आकर समाप्त हो जाती है । हीगेल ने तो ‘दर्शन की मृत्यु’ भी घोषित कर दी थी ।

 

भारतीय चिंतन प्रारंभ में प्रत्यक्ष और तर्क पर आधारित था । वैदिक संहिताओं में सर्वत्र पर्यावरणीय घटकों को जीवन का आधार माना गया है । बौधायन, चरक, सुश्रुत, नागार्जुन, आर्यभट आदि भारतीय वैज्ञानिकों की जिज्ञासा, उनके प्रयोग और तर्क आधारित विश्वास ने उन्हें गणितज्ञ और वैज्ञानिक बनाया । जिज्ञासा और तर्क की यह परंपरा ऋग्वेद से ही प्रारंभ हो जाती है । दसवें मंडल के नासदीय सूक्त में सूक्त के रचयिता तथ्य और तर्क प्रस्तुत करते हुए विभिन्न प्रश्न करते हैं और अंत में अपना संदेह और  जिज्ञासा भी इन शब्दों में व्यक्त करते हैं- ‘‘इन विभिन्न सृष्टियों को किसने रचा ? इन  सृष्टियों के जो स्वामी दिव्यधाम में निवास करते हैं, वही इनकी रचना के विषय में जानते हैं । यह भी  संभव है कि उन्हें भी यह सब बातें ज्ञात न हों ।’’  इस सूक्त में आस्था निर्बल है जबकि जिज्ञासा और तर्क प्रबल हैं ।डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन इसी सूक्त पर टिप्पणी करते हुए 'ए सोर्स बुक इन इंडियन फिलॉसफी' में लिखते हैं - "प्रश्न पूछने की भावना उन में बार-बार बलवती होती थी । चारों ओर संशय का वातावरण था । इस काल का भारतीय अपने देवताओं और समस्त वस्तुओं के अंतिम स्रोत के बारे में जानने की अभिलाषा से ओत-प्रोत था । उसने आस्था तक के लिए प्रार्थना की । और, आस्था के लिए प्रार्थना तब तक संभव नहीं होती जब तक आस्था में ही विश्वास डिग न जाए ।"

 

प्रारंभिक उपनिषदों में भी जिज्ञासा और तर्क की प्रधानता है, आस्था की नहीं । ‘न्याय दर्शन’ के प्रवर्तक महर्षि गौतम ने प्रमाण और तर्क का विस्तृत विवेचन किया है । किंतु इसके बाद के चिंतकों ने जिज्ञसा और तर्क की बजाय आस्था को अधिक महत्व दिया और दर्शन को धार्मिक विचारों में परिवर्तित कर दिया । इन विचारों का प्रभाव इतना अधिक था कि 11वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक  भारत में विज्ञान मृतप्राय  अवस्था में रहा । जिज्ञासा और तर्क ज्ञान-विज्ञान के भूखे होते हैं । एक जिज्ञासु भिन्न-भिन्न तरह से प्रश्न करता है, स्वयं से भी और दूसरों से भी । उसकी जिज्ञासा तभी संतुष्ट होती है जब उसे वांछित ज्ञान-विज्ञान प्राप्त हो जाता है । ‘द जंगल बुक’ के लेखक, नोबल पुरस्कार विजेता साहित्यकार रुडयार्ड किपलिंग ने एक महत्वपूर्ण बात लिखी है- ‘‘मैं छह ईमानदार सेवक अपने पास रखता हूँ । इन्होंने मुझे हर वह चीज सिखाई है, जो मैं जानता हूँ । इनके नाम हैं- क्या, क्यों, कब, कैसे, कहाँ और कौन ।’’ किपलिंग का जन्म भारत में हुआ था । उन्होंने लिखा है- ‘‘प्रश्न और तर्क करना मैंने भारतीय दर्शन से सीखा है ।’’ आस्था प्रश्न नहीं करती क्योंकि उसे ज्ञान-विज्ञान की आवश्यकता नहीं होती । आज यह स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि दुनिया के जिन क्षेत्रों में अतिशय आस्था है वहाँ ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा सप्रयास की जा रही है ।
 

प्रारंभ में धर्म का अर्थ कर्तव्य था । मनीषियों के द्वारा जो धर्मशास्त्र लिखे गए उनमें तत्कालीन समाज व्यवस्था के अनुरूप मनुष्यों के लिये करणीय नैतिक कर्तव्यों का ही विवरण है । इसीलिए उस समय वर्णधर्म, आश्रम धर्म, राजधर्म, गृहस्थधर्म जैसी अवधारणाएँ विकसित हुईं । गौतम धर्मसूत्र में ‘आत्मगुणोः धर्मः’ कहा गया है अर्थात किसी का स्व-गुण ही उसका धर्म कहलाता है । मनुष्य में जिज्ञासा और तर्क का गुण जन्मजात होता है इसलिए प्रकृति प्रदत्त ये दोनों गुण मनुष्य के धर्म हैं ।  यह गुण बचपन में अत्यधिक सक्रिय होता है । बाद में परिवार और समाज द्वारा प्रदत्त रूढ़िजनित संस्कारों के फलस्वरूप उसमें न्यूनता आ जाती है जिससे उसे अपने व्यावहारिक जीवन में अनेक बार असफलताओं का सामना भी करना पड़ता है । जिज्ञासा और तर्क से दूर रहने वालों के लिए अंत में एक बात और- गीता (7.17) में अर्जुन के एक प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘‘मुझे जिज्ञासु और ज्ञानी सबसे अधिक प्रिय हैं ।’’
 

-महेन्द्र वर्मा


प्राचीन संस्कृत साहित्य में होली

     


               

होली की मान्यता लोकपर्व के रूप में अधिक है किन्तु प्राचीन संस्कृत-शास्त्रों में इस पर्व का विपुल उल्लेख मिलता है । भविष्य पुराण में तो होली को शास्त्रीय उत्सव कहा गया है । ऋतुराज वसंत में मनाए जाने वाले रंगों के इस पर्व का प्राचीनतम सांकेतिक उल्लेख यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक (1.3.5) में मिलता है- भाष्यकार सायण लिखते हैं- “वसंत ऋतु में देवता के वस्त्र हल्दी से रँगे हुए हैं ।" होली शब्द की उत्पत्ति ‘होलाका’ शब्द से हुई है । अथर्व वेद के परिशिष्ट (18,12.1) में फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को होलाका कहा गया है- “फाल्गुनां पौर्णिमास्यां रात्रौ होलाका” । प्राचीन संस्कृत साहित्य में वसंतोत्सव का विस्तृत वर्णन है । यह उत्सव वसंत पंचमी से प्रारंभ हो कर चैत्र कृष्ण त्रयोदशी तक संपन्न होता था । होली इसी वसंतोत्सव के अंतर्गत एक विशेष पर्व है जिसका उल्लेख प्राचीन संस्कृत साहित्य में विभिन्न नामों से मिलता है, यथा- फाल्गुनोत्सव, मधूत्सव, मदनोत्सव, चैत्रोत्सव, सुवसंतक, दोलोत्सव, रथोत्सव, मृगयोत्सव, अनंगोत्सव, कामोत्सव, फग्गु (प्राकृत) ।

 

पहली ईस्वी शती में कवि हाल द्वारा संकलित प्राकृत ग्रन्थ ‘गाथा सप्तशती’ में होली में एक-दूसरे पर रंगीन चूर्ण और कीचड़ फेंके जाने का वर्णन है- “नायिका अपनी हथेलियों में गुलाल ले कर खड़ी ही रह गई, नायक पर रंग डालने की उसकी योजना असफल हो गई (4.12) । किसी ने फाल्गुनोत्सव में तुम पर बिना विचारे जो कीचड़ डाल दिया है उसे धो क्यों रही हो (4.69) ।’’ चौथी-पाँचवीं शताब्दी के महाकवि कालिदास की कृति ‘अभिज्ञानशाकुंतलम’ में दो दासियों के वार्तालाप में वसंतोत्सव की चर्चा है- “कृपा कर बताइए कि राजा ने वसंतोत्सव मनाए जाने पर प्रतिबन्ध क्यों लगाया है ? मनुष्यों को राग-रंग सदा से प्रिय है इसलिए कोई बड़ा ही कारण होगा ।’’ कालिदास की ही रचना ‘मालविकाग्निमित्र’ के अंक 3 में विदूषक राजा से कहता है- “रानी इरावती जी ने वसंत के आरम्भ की सूचना देने वाली रक्ताशोक की कलियों की पहले-पहल भेंट भेज कर नए वसंतोत्सव के बहाने निवेदन किया है कि आर्यपुत्र के साथ मैं झूला झूलने का आनंद लेना चाहती हूँ ।" 7 वीं शती के कवि दंडी रचित 'दशकुमारचरित' में होली का उल्लेख 'मदनोत्सव' के रूप में किया गया है। इसी काल में हर्ष ने ‘रत्नावली’ नाटक लिखा । इस के पहले अंक में विदूषक राजा से होली की चर्चा इस प्रकार करता है- “इस मदनोत्सव की शोभा तो देखिए, युवतियाँ अपने हाथों में पिचकारी ले कर नागर पुरुषों पर रंग डाल रहीं हैं और वे पुरुषगण कौतूहल से नाच रहे हैं । उडाए गए गुलाल से दसों  दिशाओं के मुख पीत वर्ण के हो रहे  हैं ।“

 

कतिपय पुराणों में भी होली या फाल्गुनोत्सव का वर्णन है । माना जाता है कि पुराणों की रचना पहली से दसवीं शताब्दी तक होती रही है । भविष्य पुराण के फाल्गुनोत्सव नामक अध्याय 132 में होली के संबंध में श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर का रोचक संवाद देखिए- युधिष्ठिर पूछते हैं- “जनार्दन, फाल्गुन मास के अंत में पूर्णिमा के दिन गाँव-गाँव में प्रत्येक घर में जिस समय उत्सव मनाया जाता है, लड़के लोग क्यों प्रलाप करते हैं, होली क्यों और कैसे जलाई जाती है ? इसके संबंध में विस्तार से बताइए ।" उत्तर में श्रीकृष्ण होली पर्व के प्रारंभ होने की कथा सुनाते हैं । कथा के अंतर्गत शिव जी और वशिष्ठ का संवाद है । अंत में शिव जी  कहते हैं- “आज फाल्गुन मास की पूर्णिमा है, शीतकाल की समाप्ति और ग्रीष्म का आरंभ हो रहा है । अतः आप लोक को अभय प्रदान करें जिससे सशंकित मानव पूर्व की भांति हास्य-विनोद से पूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें । बालकवृन्द हाथ में डंडे लिए समर के लिए लालायित योद्धा की भांति हँसी-खेल करते हुए बाहर जाकर सूखे लकड़ियाँ और ऊपले एकत्र करें तथा उसे जलाएँ तत्पश्चात राक्षस नाशक मन्त्रों के साथ सविधान उस में आहुति डाल कर हर्सोल्लास से सिंहनाद करते और मनोहर ताली बजाते हुए उस अग्नि की तीन परिक्रमा करें । सभी लोग वहाँ एकत्रित हों और निःशंक हो कर यथेच्छ गायन, हास्य और मनोनुकूल प्रलाप करें ।‘’

 

बंगाल में होली के अवसर पर दोलोत्सव मनाया जाता है । इस का उल्लेख भी भविष्य पुराण के अध्याय 133 में है । पार्वती शिव जी से कहती है- “प्रभो ! झूला झूलती हुई इन स्त्रियों को देखिए । इन को देख कर मेरे  मन में कौतूहल उत्पन्न हो गया है । अतः मेरे लिए भी एक सुसज्जित हिंडोला बनाने की कृपा करें । त्रिलोचन ! इन स्त्रियों की भाँति मैं भी  आपके साथ हिंडोला झूलना चाहती हूँ ।‘’ तब शिव जी ने देवों को बुला कर हिंडोला बनवाया और पार्वती की मनोकामना पूर्ण हुई । इस के बाद हिंडोला बनाने-सजाने और दोलयात्रा की प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन है । भविष्य पुराण में दोलोत्सव की तिथि चैत्र शुक्ल चतुर्दशी दी गई है किन्तु आजकल यह उत्सव फाल्गुन पूर्णिमा और चैत्र शुक्ल द्वादशी को मनाया जाता है । इस के अतिरिक्त अध्याय 135 में मदन महोत्सव का भी वर्णन है ।

 

नारद पुराण (1.124) में फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका-पूजन और दहन का उल्लेख है । साथ ही यह भी कहा गया है कि इस पर्व को संवत्सर दहन या मतान्तर से कामदहन के रूप में भी मनाया जाता है- “संवत्सरस्य दाहोsयम, कामदाहो मतान्तरे ।’’ संवत्सर दहन का आशय ‘बीत रहे वर्ष की विदाई और नए वर्ष का स्वागत’ है । नील मुनि द्वारा रचित ‘नीलमत पुराण’ के श्लोक संख्या 647 से 650 में होली मानाने की विधि का वर्णन इस प्रकार है- “फाल्गुन पूर्णिमा को उदय होते पूर्णचंद्र की पूजा करनी चाहिए । रात्रि के समय गायन, वादन, नृत्य और अभिनय का आयोजन किया जाना चाहिए जो चैत्र कृष्ण पंचमी तक निरंतर रहे । पाँच दिनों तक पर्पट नामक औषधीय पौधे के रस का सेवन करना चाहिए ।’’

 

भोजदेव की 11 वीं शताब्दी की रचना सरस्वती कंठाभरणममें लिखा है कि सुवसंतक वसंतावतार के दिन को कहते हैं। वसंतावतार अर्थात बसंत का आगमन, यह दिन वसंत पंचमी का ही है। दक्षिण भारत के संस्कृत कवि अहोबल ने 15 वीं शताब्दी में ‘विरूपाक्ष वसंतोत्सव चम्पू’ नामक ग्रन्थ की रचना की । इस में वसंतोत्सव की विस्तार से चर्चा की गई है । इन सब के अतिरिक्त भारवि, राजगुरु मदन, वात्स्यायन, माघ, भवभूति आदि की कृतियों में भी वसंतोत्सव का उल्लेख मिलता है ।

 

उपर्युक्त विवेचन से यह निश्चित होता है कि होली का पर्व प्राचीन काल से ही सम्पूर्ण भारतीय समाज में उल्लास और उमंग का महत्वपूर्ण उत्सव रहा है । परम्पराओं का निर्माण पहले लोक के द्वारा लोक में होता है तत्पश्चात वह शास्त्रों में अंकित हो कर सांस्कृतिक विरासत का रूप ले लेती हैं । आज भी हमारी यह गरिमामयी सांस्कृतिक विरासत भारतीय जन-मानस को सद्भाव, एकता और समानता का सन्देश दे रही है ।

-महेन्द्र वर्मा 

                                                                                                                                                                            

छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ

 


लोकसंस्कृति को जानने-समझने का प्रमुख जरिया लोकसाहित्य  है। लोकसाहित्य का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितनी कि मानवजाति। लोक मानस की अभिव्यक्ति का एक माध्यम वह गेय रचना-साहित्य है जिसमें लोक जीवन के अनुभूत चित्र अपने सरलतम और नैसर्गिक रूप में मिलते हैं। लोक के लिए, लोक में प्रचलित, लोक मन के द्वारा सृजित गीत ‘लोकगीत’ कहलाते हैं। लोकमन के हृदय से प्रस्फुटित होकर स्मृति के सहारे जीवित रहने वाला लोकसाहित्य अनेक कण्ठों से गुजरता हुआ सर्वमान्य लोक-स्वीकृत, लोक-व्यवहृत रूप पा लेता है। अनेकानेक के सान्निध्य से गुज़रते हुए भी सामाजिक एकता की भावना से ओत-प्रोत लोक-साहित्य जन-जन को जोड़ने की क्षमता रखता है। कहा जाता है कि लोक संस्कृति की आत्मा लोकगीतों में बसती है इसलिये लोकगीत लोक संस्कृति के सच्चे संवाहक माने जाते है और इसी कारण लोक गीतों को सामाजिक चेतना का प्रहरी कहा जा सकता है। लोकसाहित्य का सामाजिक मूल्यों के पोषण में सदैव ही अविस्मरणीय योगदान रहा है। लोकसाहित्य के प्राणतत्त्व ‘लोकगीत’ का इस क्षेत्र में विशिष्ट योगदान रहा है। लोकगीतों की इन
विशिष्टताओं के संदर्भ में छत्तीसगढ़ के लोकगीत भी समृद्ध हैं ।
 


छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में जन-मानस विविध रंगों में प्रतिबिंबित होता है। इन लोकगीतों की एक प्रमुख विशेषता यह है कि गीत लोक द्वारा निर्मित होने पर भी इसे किसी व्यक्ति विशेष से जोड़ा नहीं जाता है इन में वसुधैव कुटुम्बकम् की धारणा समाहित रहती है । खेत-खलिहानों में गाया जाने वाला ददरिया हो या उत्सवों में गाया जाने वाला पंथी हो, शिशु के जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला सोहर हो या विवाह के अवसर पर गाया जाने वाला भड़ौनी-गीत हो, ये सभी लोकगीत सामाजिक जीवन को अपने में समेटे हुए हैं और सामाजिक मूल्यों के पोषण में विशिष्ट भूमिका निभाते हैं। आइए, छत्तीसगढ के लोकगीतों के कुछ उदाहरणों में देखें कि कैसे ये गीत लोकजीवन की परंपराएँ, प्रथाएँ, रीति-रिवाज, संस्कृति, इतिहास, दर्शन और अध्यात्म को समाहित कर, सामाजिक मूल्यों के पोषण में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं।
 

छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में विवाह संस्कार के गीतों का विशिष्ट स्थान है । विवाह एक सामाजिक उत्सव है जिसमें न केवल परिवार-जनों की बल्कि गाँव-समाज के विभिन्न वर्गों की महत्वपूर्ण सहभागिता होती है । समाज में अपनापन और एकता की भावना का चित्रण विवाह गीतों में देखा जा सकता है । विभिन्न व्यवसाय वाले लागों की सहभागिता को सम्मान देने के लिए तेल-हल्दी चढ़ाने के समय गाए जाने वाले इस विवाह गीतमें वर्णित प्रश्नोत्तर  देखिए- ऐ हल्दी, तुम्हारा जन्म कहां हुआ है और तुम्हारा अवतार कहां हुआ है ? मेरा जन्म मरार की बाड़ी में हुआ है और मेरा अवतार पंसारी की दुकान में हुआ है । ऐ पर्रा, तुम्हारा जन्म कहां हुआ है और तुम्हारा अवतार कहां हुआ है ? मेरा जन्म सिया पहाड़ में हुआ है और मेरा अवतार कँडरा के घर में हुआ है-
 

कहवाँ रे हरदी, भई तोर जनामन,
कहवाँ रे लिए अवतार ?
मरार बारी, दीदी मोर जनामन,
बनिया दुकाने दीदी लिएँव अवतार ।
कहवाँ रे पर्रा भई तोर जनामन,
कहवाँ रे पर्रा तैं लिए अवतार ?
सिया पहारे दीदी मोर जनामन,
कँड़रा के घरे मैं लिएँव अवतार ।


विवाह के अवसर पर बारातियों के स्वागत में गाए जाने वाले भड़ौनी गीत में समधी-समधिन और दूल्हे को हँसी-मजाक के लहजे में उलाहना दिया जाना वास्तव में उनके प्रति व्यक्त किया गया सम्मान ही होता है जो निश्छल  सामाजिक संबंधों को और प्रगाढ़ बनाता है- पहला उदहारण समधी, दूसरा समधिन और तीसरा दूल्हे को संबोधित है -


बने बने तोला जानेंव समधी, मड़वा में डारेंव बाँस रे,
झालापाला लुगरा लाने, जरय तुँहर नाक रे ।
लाम लाम तोर मेंछा हावय, मुँहू हावय करिया रे,
समधी बिचारा का करय, पहिरे हावय फरिया रे ।

बरा खाहूँ कहिथव समधिन, कहाँ के बरा पाबे रे,
हात गोड़ के बरा बना ले, टोर टोर के खाबे रे ।
पातर पातर मुनगा फरय, पातर लुरय डार रे,
पातर हावय समधिन छिनारी, ओकर नइये जात रे ।

सुंदर हाबस कहिके दुलरवा, हम-ला दियेव दगा रे,
बिलवा हावय मुँहू तुँहर, नोहव हमर सगा रे ।
आमा पान के पुतरी, लिमउआ छू छू जाय रे
दुल्हा डउका दुबर होगे, सीथा बिन बिन खाये रे

 

छत्तीसगढ़ियों में सामाजिक बुराई दहेज प्रथा प्रचलित नहीं है किंतु बेटी को घर-गृहस्थी के कुछ सामान भेंट किए जाते हैं । एक गीत में दर्शाया  गया है कि इस भेंट से दूल्हा प्रसन्न नहीं है-

गाय अउ भइँस ले नोनी कोठा तोर भरगे
दुलरू के मन नहीं आय
कि ए वो नोनी सीता ल बिहावय सिरी राम
पइसा अउ कउड़ी ले नोनी सन्दुक भरगे
दुलरू के मन नहीं आय
कि ए वो नोनी सीता ल बिहावय सिरी राम
टठिया अउ लोटा ले नोनी झंपिया तोर भरगे
दुलरू के मन नहीं आय


श्रम के प्रति समर्पण और आलस्य के प्रति तिरस्कार छत्तीसगढ़ का मूल संस्कार है । बाँस गीत के इस उदाहरण में पति-पत्नी के संवाद के माध्यम से श्रम के महत्व के साथ-साथ पारिवारिक और सामाजिक दायित्व के निर्वहन के प्रति समर्पण को इस तरह अभिव्यक्त किया गया है-
 
छेरी ला बेचव, भेंड़ी ला बेचव, बेचव करिया धन,
गाय गोठान ल बेचव धनी मोर, सोवव गोड़ लमाय ।
छेरी ला बेचँव, न भेड़ी ला बेचँव, नइ बेचँव करिया धन,
जादा कहिबे तो तोला बेचँव, एक कोरी खन खन ।
कोन करही तौर राम रसोइया, कोन करही जेवनास,
कोन करही तौर पलंग बिछौना, कोन जोहही तोर बाट ।
दाई करही राम रसोइया, बहिनी हा जेवनास,
सुलखी छेरिया पंलग बिछाही, बंसी जोहही बाट ।
दाई बेचारी तौर मर हर जाही, बहिनी पठोहू ससुरार,
सुलखी छेरिया ल हाट मा बेचँव, बंसी ढीलवँ मँझधार ।
दाई राखेंव अमर खवा के बहिनी राखेंव छै मास,
सुलखी छेरिया ल छाँद के राखेंव, बंसी जीव के साथ ।


छत्तीसगढ के लोकगीतों के निर्माण में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का योगदान अधिक रहा है। लोकगीतों में सदियों से झरते स्त्री मन के अथाह दर्द, पीड़ा, प्रेम, आशा, आकांक्षा, प्रताड़ना आदि को साफ महसूस किया जा सकता है। जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में नारी के कंठ से उसके अपने भाव और अभाव के उद्गार प्रकट होते रहे हैं । सुवागीत इसी भावभूमि में सिरजा गया गीत है । प्रस्तुत सुवा गीत मेंं वर्णन है कि एक नववधू का पति रणक्षेत्र में गया है जो अब तक नहीं लौटा । नववधू सुग्गे से अपने मन की व्यथा को व्यक्त करती है और सुग्गा उत्तर देता है । परिवार-समाज के अनुशासन के साथ-साथ इस गीत में अध्यात्म के स्वर भी मुखरित हैं-

पहिली गवन के मोला देहरी बैठाये,
न रे सुआ हो छाँडि चले बनिजार ।
काकर संग खेलहूँ, काकर संग खाहूँ
काला राखों मन बाँध, न रे सुआ हो छाँडि चले बनिजार ।
खेलबे ननद संग, सास संग खाबे,
छोटका देवर मन बाँध, न रे सुआ हो छाँडि चले बनिजार
पीवरा पात सन सासे डोकरिया, नन्द पठोहूँ ससुरार,
छोटका देवर मोर बेटवा सरीखे
कइसे राखों मन बाँध, न रे सुआ हो छाँडि चले बनिजार ।
तोर अँगना म चौरा बँधा ले, कि तुलसा ल देबे लगाय,
नित नित छुइबे नित नित लीपबे, कि नित नित दियना जलाय
तुलसा के पेड़ ह हरियर हरियर, कि मोर नायक करथे बनिजार
जब मोर तुलसा के पेड़ झुरमुर जाही
कि मोर नायक गये रन जूझ न रे सुआ हो छाँडि चले बनिजार ।

बच्चों के जन्म के समय सोहर गीत गाया जाता है । परिजनों के लिए शिशु  का जन्म खुशी का अवसर होता है । इस सोहर गीत में वर्णित  है कि बच्चे का जन्म माता के मायके में हुआ है । माता के ससुराल से कोई नहीं आया है इसलिए सभी रस्म मायके के लोग ही पूरी करेंगे । परिवार के विविध संबंधियों का उल्लेख यह भी दर्शाता  है कि इनमें परस्पर प्रेम ही सुखी परिवार और स्नेही समाज की बुनियाद है-

ननदी बोलयेंव उहू नइ आइस
ननदी हो हमार का करि लेहव,
बहिनी बलाके काँके मढ़ई बोन
हम छबीली सबे के काम पड़बोन।
ननदोइ बोलयेंव उहू नइ आइस
भाँटो बला के नरियर फोरा ले बोन
हम छबीली सबे के काम पड़बोन।
जेठानी बोलायेंव उहू नइ आइस
जेठानी हो हमार का करि लेहव,
भौजी बला के, सोंहर गवाबोन
हम छबीली सबे के काम पड़बोन।।
जेठ जी बोलायेंव उहू नइ आइस
जेठ हो हमार का करिलेहव,
भाई बला के बन्दुक छुटबई लेबोन
हम छबीली सबे के काम पड़बोन।
ससुर बोलायेंव उहू नइ आइस
ससुर हो हमार का करिलेहव,
बापे बला के नाम धरइ ले बोन
हम छबीली सबे के काम पड़बोन।
सासे बोलायेंव उहू नइ आइस
सासे हो हमार का करिलेहव,
दाई बला के डुठू बँधवइबोन
हम छबीली सबे के काम पड़िबोन।।


पंथी गीत में समाज को सही मार्ग दिखाने वाले गुरु बाबा के उपदेशों  का सुंदर वर्णन मिलता है। एक पंथी गीत में कहा गया है कि मूढ़ के आँगन में दीपक नहीं जलता जबकि ज्ञानवान के आंगन में दीपक जलता रहता है । अंधकार और दीये की तुलना मूर्ख और ज्ञानवान से की गई है-

काकर घर परे निस अँधयरिया
काकर अँगना दियना बरय हो,
मुरख अँगना निस अँधयरिया
ज्ञानी के अँगना दियना बरय हो ।


जात-पात  के संदर्भ में भेदभाव करना एक बड़ी सामाजिक बुराई है । पंथी गीत की इन पंक्तियों में एक सुंदर संदेश  है कि पक्षी भी विविध जाति के होते हैं किंतु वे तो एक ही वृक्ष में अपना नीड़ बनाते हैं । अरे मूर्ख मानव, तुम जात-पात में ही उलझे हुए हो-

तैं तो जात-पात के जाल में अरझ गये रे
जात पंछी म जरूर
सोल्हाई, कोकड़ा अउ मंजूर
ओमन एके पेड़  में खोंधरा बना डरिन रे मानुस मुरख गँवार ।



उपर्युक्त उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में पारिवारिक-सामाजिक मूल्यों का संवर्धन और नैतिकता के स्वर भी गुंजित हैं। विभिन्न प्रकार के छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में यहाँ के सामाजिक-आर्थिक व सांस्कृतिक रूप के साक्षात दर्शन होते हैं। ये लोकगीत आज हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। मनुष्य जन्म से मृत्युपर्यंत लोकगीतों के इर्दगिर्द ही जीता है। सारे संस्कार लोकगीतों के साथ-साथ चलते हैं। मनुष्य के संपूर्ण जीवन को लोकगीत ही तो आच्छादित किए हुए हैं। लोकगीत हमारे सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग है। इन गीतों का उद्देश्य केवल हमारा मनोरंजन करना ही नहीं बल्कि समाज को एक सूत्र में पिरोए रखना भी है।

-महेन्द्र वर्मा
                    





शिक्षा, धार्मिकता और मानव-विकास

 

 


मनुष्य ने पिछली कुछ सदियों में ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में अभूतपूर्व विस्तार किया है । ज्ञान के इस विस्तार ने बहुत सी पारंपरिक मान्यताओं को बदला है जिन्हें मनुष्य हजारों वर्षों तक ज्ञान समझता रहा । गैलीलियो से लेकर स्टीफन हॉकिंग्स तक और कणाद से लेकर आर्यभट्ट तक अनेक ज्ञानऋषियों ने अपनी बौद्धिक क्षमता से दुनिया को अनेक भ्रमात्मक ज्ञान से मुक्त किया है। दो हजार साल पहले तक ज्ञान के मूलतः दो ही क्षेत्र थे- धर्म और दर्शन  । लेकिन दर्शन  पर धर्म हावी था । एक धार्मिक नेता जो कुछ कह देता था वही ज्ञान माना जाता था । ज्ञान का विकास एक गतिशील प्रक्रिया है किंतु धार्मिक ज्ञान अपरिवर्तित रहता है । हजारों साल पहले जो धार्मिक ज्ञान बताया गया या लिखा गया वह आज भी उसी रूप में, बल्कि कई संदर्भों में विकृत रूप में, प्रचलित है और उन समूहों द्वारा स्वीकारा जाता है जो धार्मिक हैं । किंतु ज्ञान के उपासकों ने पाया कि धर्म के अतिरिक्त संसार में जानने के लिए और भी बहुत कुछ है बल्कि ज्ञान का क्षेत्र असीम है । उन्होंने ज्ञान के जो सैकड़ों नए सूरज उगाए उन के तीव्र प्रकाश  से धार्मिक ज्ञान की चमक किंचित धुँधली हुई । प्राथमिक विद्यालयों से लेकर विश्ववविद्यालयों तक ज्ञान के इन नए पूजाघरों में विभिन्न विषयों के बारे में दुनिया भर के लोग सीख रहे हैं । इसी संदर्भ में शोधकर्ताओं ने कुछ शोध किए हैं । इन शोधकर्ताओं ने पाया कि दुनिया के जिन क्षेत्रों में धार्मिकता अधिक है वहां नए ज्ञान को भलीभांति सीखने के प्रति रुचि कम होती है । इस लेख में धार्मिकता और आधुनिक शिक्षा के परस्पर प्रभावगत संबंधों की विवेचना की गई है ।

 

यूनेस्को सहित बहुत सी संस्थाएँ मानव विकास से संबंधित विभिन्न घटकों का वैश्विक  सर्वेक्षण करती रहती हैं । यूनेस्को द्वारा जारी किए गए मानव विकास प्रतिवेदन में 188 देशों के शैक्षिक सूचकांकों की सूची दी गई है । इस सूची के अवलोकन से यह निष्कर्ष निकलता है कि दुनिया के जिन देशों  में धार्मिकता अधिक है वहाँ की साक्षरता का दर भी कम है और जिन देशों में धार्मिकता कम है वहाँ की साक्षरता अधिक है । उदाहरण के लिए अधिक धार्मिकता वाले देश , जैसे- ईथियोपिया, नाइजर, यमन, अफगानिस्तान, सोमालिया आदि में 95 प्रतिशत से अधिक लोग धार्मिक हैं और इन्हीं देशों  में साक्षरता का दर 21 से 35 प्रतिशत के बीच है जो विश्व  में सबसे कम है । कम धार्मिकता वाले देशों की सूची में  जापान, स्वीडन, इज़राइल, ग्रेट ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, जर्मनी आदि  शामिल हैं जहां धार्मिक लोगों की संख्या 13 से 35 प्रतिशत के बीच है । इन देशों  की साक्षरता का दर 98 प्रतिशत से अधिक है ।

 

हमारा देश  धार्मिक मान्यताओं वाला देश  है । यहाँ स्वयं को अधार्मिक कहने वालों की संख्या केवल 30 लाख है जो कुल जनसंख्या के 1 प्रतिशत से भी कम है । यहाँ की साक्षरता का दर 75 प्रतिशत है जो विकसित देशों  की तुलना में बहुत कम है । आश्चर्य  की बात तो यह है कि विश्व  शैक्षिक सूचकांक में भारत 112 वें क्रमांक में है जो थाइलैंड, मलेशिया, तुर्की, और ईरान जैसे देशों से भी नीचे है । उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों की संख्या भी कम धार्मिकता वाले देशों में अधिक है जबकि अधिक धार्मिकता वाले देशों  में बहुत कम है । कनाडा, जापान, आस्ट्रेलिया, कोरिया,  ब्रिटेन, इज़राइल आदि देशों  में स्नातक या उससे उपर तक शिक्षा प्राप्त करने वालों की संख्या 46 से 56 प्रतिशत है जबकि भारत में केवल 9 प्रतिशत है ।

 

वाशिंगटन स्थित प्यू रिसर्च सेंटर ने दुनिया के विभिन्न धर्मों के मानने वाले और उनके शैक्षिक स्तर में संबंध का अध्ययन किया है । इस अध्ययन के अनुसार यहूदी लोग अन्य की तुलना में सबसे अधिक शिक्षित हैं । दूसरे स्थान पर ईसाई समुदाय है जबकि हिन्दू और मुस्लिम समुदाय की शैक्षिक स्थिति सबसे कमजोर  है । आँकड़ों के अनुसार यहूदी समुदाय शिक्षालयों में औसत रूप से 13.4 वर्ष रह कर शिक्षा प्राप्त  करता है जबकि हिंदू औसतन केवल 7.1 वर्ष और मुस्लिम समुदाय 6.7 वर्ष ही व्यतीत करता है । ध्यान रहे कि ये वैश्विक आँकड़े हैं, किसी एक देश  के नहीं । यही आँकड़ा विश्व  भर की जनसंख्या के लिए 7.7 वर्ष है । दुनिया भर के विभिन्न धार्मिक समुदायों के उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले लोगों का प्रतिशत इस प्रकार है- यहूदी 61 प्रतिशत, ईसाई 20 प्रतिशत, हिंदू 10 प्रतिशत और मुस्लिम 8 प्रतिशत । धार्मिकता और शिक्षा के संबंध को ये आँकड़े बेहतर रूप से प्रदर्शित  करते हैं । अमेरिका के लीड्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 82 देशों  में आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों में गणित और विज्ञान में उपलब्धि को जानने के लिए एक अध्ययन किया । इस अध्ययन में भी यही निष्कर्ष निकला कि उच्च धार्मिकता वाले देशों के छात्रों का गणित और विज्ञान में प्रदर्शन  कमजोर है । इसके विपरीत कम धार्मिकता वाले देशों  के छात्रों ने इन विषयों में अच्छे अंक अर्जित किए ।

 

उपरोक्त आँकड़े स्पष्ट रूप से यह दर्शाते हैं कि धार्मिकता शैक्षिक उपलब्धि को नकारात्मक ढंग से प्रभावित करती है । यूनेस्को द्वारा जारी शैक्षिक सूचकांक की सूची को देखें तो यह ज्ञात होता है कि कम शैक्षिक उपलब्धि वाले देश  मुख्यतः अफ्रीका, दक्षिण एशिया और खाड़ी में स्थित हैं । यही वे देश  हैं जहां धार्मिकता अधिक है । एक बात और ध्यान देने योग्य है, अधिक धार्मिकता वाले देशों  की आर्थिक दशा  भी कमजोर है। गरीब, अविकसित और विकासशील देश  भी वही देश  हैं जहाँ के लोग आधुनिक ज्ञान के बजाय धार्मिक परंपराओं में ज्यादा रुचि लेते है । खाड़ी के कुछ देश  तेल के भंडार के कारण अमीर हैं न कि अपनी ज्ञानात्मक क्षमता के कारण ।

 

किसी देश की शैक्षिक, बौद्धिक और  आर्थिक  स्थिति उस देश के मानव-विकास के प्रतिबिम्बक होते हैं l ज्ञान के इतिहास पर गौर करें तो हम पाते हैं कि जिन देशों  में वैज्ञानिक, गणितीय और दार्शनिक  ज्ञान की परंपरा की शुरूआत हुई उनमें भारत और अरब देशों  के  नाम भी शामिल है लेकिन  विडंबना ही है कि आज यही देश  वास्तविक ज्ञान की खोज के संदर्भ में हाशिए पर चले गए हैं । पिछले दो हजार साल के धार्मिक हलचलों ने इन देशों को प्राकृतिक और वास्तविक ज्ञान से विमुख कर दिया है । यद्यपि अफ्रीका, मध्यपूर्व और दक्षिण एशिया के देशों  की शैक्षिक उपलब्धि में  सुधार हो रहा है किंतु यह शेष विश्व  की शैक्षिक उपलब्धि की तुलना में बहुत ही कम है । इनकी वर्त्तमान स्थिति के आधार पर कहा जा सकता है कि ये देश समृद्ध और विकसित देशों से एक सदी पीछे हैं l इन देशों और इनमें रहने वाले समुदायों को अपने पिछड़ेपन के कारणों पर  गंभीरता  से विचार  करने की आवश्यकता है ।

- महेन्द्र वर्मा


सच के झरोखे से - विमोचन

 



मेरी दूसरी पुस्तक ‘सच के झरोखे से ’ का विमोचन

कोई भी कृतिकार अमर नहीं होता किन्तु उसकी कोई अमर हो जाती है। यह विचार व्यक्त किया विद्वान भाषाविद डॉ. चित्तरंजन कर ने। वे महेन्द्र वर्मा की नई पुस्तक सच के झरोखे से के विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि की आसंदी से सभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सत्य तो निरपेक्ष होता है लेकिन सच लौकिक दृष्टिकोण को व्यक्त करता है। इस पुस्तक का शीर्षक और इसकी विषय वस्तु उसी  लौकिक सच को विभिन्न संदर्भों में उद्घाटित करता है। डॉ. कर ने पुस्तक के इस अंश का विशेष उल्लेख किया– ‘ऋग्वैदिककालीन देवताओंद्यु, आपः, मरुत, इंद्रा, अग्नि, पर्जन्य, ऊषा, सोम, सविता, पृथ्वी आदि की विशेषताओं को उन लोगों ने जाना जिन्हें आज हम वैज्ञानिक कहते हैं। यदि ईश्वर की लीला का चिंतन-मनन करने वालों को धार्मिक और आस्तिक कहा जाता है तो ऐसे महान वैज्ञानिक ही सच्चे अर्थों में धार्मिक और आस्तिक हैं क्योंकि वे सृष्टि की सर्वोच्च सत्ता ऊर्जा और उससे निर्मित पदार्थों की निरंतर ‘उपासना’ करते हैं।

 

 

विमोचन समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध छंदकार श्री अरुण निगम ने कहा- ‘इस पुस्तक के सभी आलेख शोध-आलेख हैं लेखक ने परिश्रमपूर्वक विभिन्न आलेखों में संबंधित तथ्यों के मूल कारणों तक पहुंचने का प्रयास किया है छत्तीसगढ़ में गद्य लेखन में यह पुस्तक मील का पत्थर सिद्ध होगी स्वामी स्वरूपनन्द महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. हंसा शुक्ला कार्यक्रम की प्रमुख वक्ता थीं उन्होंने पुस्तक के एक आलेख ‘सच क्या है’ का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि यह आलेख सम्पूर्ण पुस्तक का प्रतिनिधित्व करता है। किसी घटना के कारणों को हम बिना तर्क किए मांलेते है तो यह एक अलग तरह का विश्वास है और यदि तर्कों के द्वारा कारणों को पहचानते है तो यह अलग तरह का विश्वास होता है। साहित्यकार जगदीश देशमुख ने अपने उद्बोधन में पुस्तक के महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखांकित किया

हिन्दी साहित्य भारती के प्रदेशाध्यक्ष श्री बलदाऊ राम साहू के अयोजकत्व में सम्पन्न इस कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों के द्वारा माँ सरस्वती के पूजन-अर्चन से हुआ। बलदाउ राम साहू ने  स्वागत उद्बोधन उद्बोधन में कहा कि पुस्तक में कुल 32 आलेख हैं जो साहित्य, कला, विज्ञानं, धर्म, दर्शन, संगीत, लोक परंपरा आदि विविध विषयों पर लिखे गए हैं I इस के पश्चात अतिथियों का पुष्पहार से स्वागत किया गया। लेखकीय वक्तव्य में महेन्द्र वर्मा ने कहा कि अध्ययनशीलता सच और भ्रम को अलगअलग चिह्नित कर देती है। सामान्यजन-मानस में व्याप्त भ्रम ने इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा दी।

कार्यक्रम के अंत में अतिथियों को स्मृतिचिह्न भेंट किया गया ।लोक- गायक और गीतकार श्री सीताराम साहू ‘श्याम’ ने कार्यक्रम का संचालन किया। उन्होंने विमोचित पुस्तक के शीर्षकों को लेकर लिखी गई स्वरचित कविता भी प्रस्तुत की। विशेष रूप से पधारे श्री मोतीलाल साहू ने बांसुरी वादन प्रस्तुत किया। आभार प्रदर्शन डॉ. बी. रघु ने किया। कार्यक्रम में श्रीमती माधुरी कर, श्री पूनारामसाहू, कु. सुजात, डॉ. आशीष साहू , श्री बागची  आदि उपस्थित थे।

- 'छत्तीसगढ़ आसपास' में प्रकाशित रिपोर्ट