Jan 16, 2011

ग़ज़ल

ख़ाक है संसार

बुलबुले सी ज़िदगानी, या ख़ुदा,
है कोई झूठी कहानी, या ख़ुदा।


वक़्त की फिरकी उफ़क पर जा रही,
छोड़ती अपनी निशानी, या ख़ुदा।


पांव धरती पर गड़े सबके मगर,
ख़्वाब बुनते आसमानी, या ख़ुदा।


फूल मुरझाने लगे हैं चमन के,
खो गई है रुत सुहानी, या ख़ुदा।


उल्लुओं ने पंख नोचे हंसिनी के,
दुश्मनी लगती पुरानी, या ख़ुदा।


हंस रहे होगे हमारे हाल पर,
आपकी है मेहरबानी, या ख़ुदा।


ख़ाक है संसार, माज़ी के सिवा, 
है यहां हर चीज़ फ़ानी, या ख़ुदा।

                                                -महेन्द्र वर्मा
-----------------
उफ़क - क्षितिज, उल्लू - लक्ष्मी का वाहन
हंसिनी /हंस - सरस्वती का वाहन
माज़ी - अतीत, फ़ानी - नश्वर

40 comments:

अजय कुमार said...

शानदार गजल , बधाई

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

वक्त की फिरकी उफ़क पर जा रही,
छोड़ती अपनी निशानी या ख़ुदा।

ख़ाक है संसार माज़ी के सिवा,
है यहां हर चीज़ फ़ानी या ख़ुदा।

लाज़वाब अशआर , बेहतरीन ग़ज़ल, क्या बात है वर्मा जी, इरशाद।

रश्मि प्रभा... said...

पांव धरती पर गड़े सबके मगर,
ख़्वाब बुनते आसमानी, या ख़ुदा।
unke ehsaason ki udaanen hain jabardast
hogi kayamat yaa khuda !

सुशील बाकलीवाल said...

पांव धरती पर गड़े सबके मगर,
ख़्वाब बुनते आसमानी, या ख़ुदा।

बढिया गजलें । आभार...

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बुलबुले सी ज़िदगानी, या ख़ुदा,
है कोई झूठी कहानी, या ख़ुदा।
पांव धरती पर गड़े सबके मगर,
ख़्वाब बुनते आसमानी, या ख़ुदा।

वाह दोनों शेर गजब के बन पड़े हैं ... बेहतरीन अभिव्यक्ति ...
पूरी ग़ज़ल सुन्दर है !

Bhushan said...

शानदार और बेहतरीन ग़ज़ल.
बुलबुले सी ज़िदगानी, या ख़ुदा,
है कोई झूठी कहानी, या ख़ुदा।
क्या बात है. पूरा भारतीय दर्शन इसमें समाया हुआ है.

mark rai said...

ख़ाक है संसार, माज़ी के सिवा,
है यहां हर चीज़ फ़ानी, या ख़ुदा....
....बेहतरीन!

Vijai Mathur said...

सच्चाई का बयां बखूबी किया है.धन्यवाद.

ehsas said...

बेहतरीन गजल। हर शेर दाद के काबिल।

निर्मला कपिला said...

वक़्त की फिरकी उफ़क पर जा रही,
छोड़ती अपनी निशानी, या ख़ुदा।


पांव धरती पर गड़े सबके मगर,
ख़्वाब बुनते आसमानी, या ख़ुदा।
ये दोनो शेर तो लाजवाब हैं पूरी गज़ल ही बहुत अच्छी लगी । बधाई इस गज़ल के लिये।

वन्दना said...

वाह बेहद शानदार ग़ज़ल ..........हर शेर लाजवाब.

'उदय' said...

... behatreen ... prasanshaneey gajal !!

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

बहुत ही गहरे एहसास है हर नज़्म में ...... सुंदर प्रस्तुति.

मनोज कुमार said...

पांव धरती पर गड़े सबके मगर,
ख़्वाब बुनते आसमानी, या ख़ुदा।
जो बात मुझे अच्छी लगी कि आप न तो ज़्यादा क्रांति की बात करते हैं, न चालू इश्किया शायरी की। इंसान और इंसानियत ही आपकी शायरी की बुनियादी लय है।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

पांव धरती पर गड़े सबके मगर,
ख़्वाब बुनते आसमानी, या ख़ुदा।

शानदार ग़ज़ल...

girish pankaj said...

aap bhi achchhe sher kahate hain...badhai...shubhkamnaye....

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

आद.महेंद्र जी,
पहले सोचा सबसे बढ़िया शेर लिख कर फिर अपनी बात कहूँ मगर ग़ज़ल में से सबसे बढ़िया शेर चुनना नामुमकिन है !
सभी शेर एक से बढ़ कर एक हैं !
इस ग़ज़ल की जितनी भी तारीफ़ की जाय कम है !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

'उल्लुओं ने पंख नोचे हंसिनी के

दुश्मनी लगती पुरानी या खुदा '

बेहतरीन शेर ..

पूरी ग़ज़ल मुकम्मल... बहुत अच्छी |

दिगम्बर नासवा said...

पांव धरती पर गड़े सबके मगर,
ख़्वाब बुनते आसमानी, या ख़ुदा। ...

बहुत लाजवाब ... क्या अंदाज़ है ग़ज़ल का ... सुभान अल्ला ... मज़ा आ गया ..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना आज मंगलवार 18 -01 -2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.uchcharan.com/2011/01/402.html

Swarajya karun said...

बहुत उम्दा गज़ल. बधाई .

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पांव धरती पर गड़े सबके मगर,
ख़्वाब बुनते आसमानी, या ख़ुदा।

फूल मुरझाने लगे हैं चमन के,
खो गई है रुत सुहानी, या ख़ुदा।

बहुत शानदार गज़ल ...

nilesh mathur said...

या खुदा! बहुत शानदार ग़ज़ल!

ZEAL said...

हर शेर में एक सम्पूर्ण जीवन दर्शन छुपा हुआ है।

संजय भास्कर said...

........बेहतरीन ग़ज़ल, क्या बात है वर्मा जी

संजय भास्कर said...

...हर शेर लाजवाब.

Patali-The-Village said...

बेहद शानदार ग़ज़ल| हर शेर लाजवाब|

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

पांव धरती पर गड़े सबके मगर,
ख़्वाब बुनते आसमानी, या ख़ुदा।

बहुत उम्दा कलाम पढ़ने को मिला है
वर्मा जी, बहुत बहुत मुबारकबाद.

Kunwar Kusumesh said...

पांव धरती पर गड़े सबके मगर,
ख़्वाब बुनते आसमानी, या ख़ुदा।

वाह वाह क्या शेर है.
बहुत प्यारी ग़ज़ल.

'साहिल' said...

ख़ाक है संसार, माज़ी के सिवा,
है यहां हर चीज़ फ़ानी, या ख़ुदा।

ग़ज़ब के शेर, खूबसूरत ग़ज़ल.......

anupama's sukrity ! said...

पांव धरती पर गड़े सबके मगर,
ख़्वाब बुनते आसमानी, या ख़ुदा।

बहुत गहरे भाव -
बधाई एवं शुभकामनाएं

रचना दीक्षित said...

पांव धरती पर गड़े सबके मगर,
ख़्वाब बुनते आसमानी, या ख़ुदा।
शानदार गजल, हर शेर लाजवाब

Harman said...

bouth he aacha post hai ji


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ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

महेन्‍द्र जी, जीवन की निस्‍सारता को आपने बखूबी समझा है। बहुत सुंदर।


---------
ज्‍योतिष,अंकविद्या,हस्‍तरेख,टोना-टोटका।
सांपों को दूध पिलाना पुण्‍य का काम है ?

राकेश कौशिक said...

वाह वाह वर्मा जी - जीवन सार प्रस्तुत करती लाजवाब ग़ज़ल

Prem Farrukhabadi said...

Ek behtareen rachna ke liye Badhai!!

हरकीरत ' हीर' said...

वक़्त की फिरकी उफ़क पर जा रही,
छोड़ती अपनी निशानी, या ख़ुदा।

हर शे'र नया सा लगा ....

बहुत खूब .....!!

POOJA... said...

बुलबुले सी ज़िदगानी, या ख़ुदा,
है कोई झूठी कहानी, या ख़ुदा।
bahut khoob...
bahut hi steek gazal hai...

जयकृष्ण राय तुषार said...

bahut hi khobsorat si ghazal badhai bhai mahendraji

रंजना said...

वाह...वाह...वाह...

और क्या कहूँ ???

रचना के स्तर का प्रसस्ति शब्द संधान सरल है क्या ?