Jan 8, 2012

ग़ज़ल

रोज़-रोज़  यूं बुतख़ाने न जाया कर,
दिल में पहले बीज नेह के बोया कर।

वक़्त लौट कर चला गया दरवाज़े से,
ऐसी बेख़बरी से अब ना सोया कर।

तू ही एक नहीं है दुनिया में आलिम,
अपने फ़न पर न इतना इतराया कर।

औरों के चिथड़े दामन पर नज़रें क्यूं,
पहले अपनी मैली चादर धोया कर।

लोग देखकर मुंह फेरेंगे झिड़केंगे,
सरे आम ग़म का बोझा न ढोया कर।

मैंने तुमसे कुछ उम्मीदें पाल रखी हैं,
और नहीं तो थोड़ा सा मुसकाया कर।

नीचे भी तो झांक जरा ऐ ऊपर वाले,
अपनी करनी पर थोड़ा पछताया कर।

                                   
                                                             -महेन्द्र वर्मा      

50 comments:

संजय भास्कर said...

क्या बात है...बहुत ही अर्थपूर्ण ग़ज़ल...

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

वक़्त लौट कर चला गया दरवाज़े से,
ऐसी बेख़बरी से अब ना सोया कर।

तू ही एक नहीं है दुनिया में आलिम,
अपने फ़न पर न इतना इतराया कर।

वाह !!! क्या बात है, सुबह खुशगवार हो गई.हर अश'आर वजनदार,शानदार.

Ramakant Singh said...

गंभीर आत्‍मचिंतन की सहज अभिव्‍यक्ति.

वन्दना said...

गज़ब के अशरार्……………सभी एक से बढकर एक्…………शानदार गज़ल्।

ajit gupta said...

वक़्त लौट कर चला गया दरवाज़े से,
ऐसी बेख़बरी से अब ना सोया कर।
बहुत उम्‍दा है। बधाई।

अनुपमा त्रिपाठी... said...

वक़्त लौट कर चला गया दरवाज़े से,
ऐसी बेख़बरी से अब ना सोया कर।
sunder shayari ...

रश्मि प्रभा... said...

वक़्त लौट कर चला गया दरवाज़े से,
ऐसी बेख़बरी से अब ना सोया कर।... गया वक़्त फिर लौटता नहीं

मनीष सिंह निराला said...

बेहतरीन लफ्जों से सजी ये गजल....बहुत सुन्दर एवं सार्थक प्रस्तुति !

Bharat Bhushan said...

बहुत बढ़िया ग़ज़ल है महेंद्र जी. ये पंक्तियाँ तो जैसे दिल की गहराई को नाप लेती हैं-
नीचे भी तो झांक ज़रा ऐ ऊपर वाले,
अपनी करनी पर थोड़ा पछताया कर।
वाह!!

Amrita Tanmay said...

उपरवाले को क्या खूब सुनाया है..अति सुन्दर..

Naveen Mani Tripathi said...

तू ही एक नहीं है दुनिया में आलिम,
अपने फ़न पर न इतना इतराया कर।

औरों के चिथड़े दामन पर नज़रें क्यूं,
पहले अपनी मैली चादर धोया कर।

Vah verma ji , ..... bahut hi sundar gazal hr sher men ak sandesh ....lajbab prastuti ...badhai

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत ख़ूब...
आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 09-01-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

आशा जोगळेकर said...

मैंने तुमसे कुछ उम्मीदें पाल रखी हैं,
और नहीं तो थोड़ा सा मुसकाया कर।

नीचे भी तो झांक जरा ऐ ऊपर वाले,
अपनी करनी पर थोड़ा पछताया कर।

क्या बात है महेन्द्र जी अच्छी डांट लगाई ईश्वर को वह भी इतने खूबसूरत शेरों से

vidya said...

बहुत बढ़िया ...
औरों के चिथड़े दामन पर नज़रें क्यूं,
पहले अपनी मैली चादर धोया कर।

लाजवाब,,,

दिगम्बर नासवा said...

औरों के चिथड़े दामन पर नज़रें क्यूं,
पहले अपनी मैली चादर धोया कर...

बहुत खूब ... आपका हर शेर कुछ नया सन्देश दे जाता है ... बहुत ही लाजवाब गज़ल है ..

Amit Chandra said...

नीचे भी तो झांक जरा ऐ ऊपर वाले,
अपनी करनी पर थोड़ा पछताया कर।

क्या बात है. बहुत खूब.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सभी अशार बहुत ही अच्छे है आदरणीय महेंद्र भईया...

औरों के चिथड़े दामन पर नज़रें क्यूं,
पहले अपनी मैली चादर धोया कर।


वाह! वाह! शानदार ग़ज़ल के दिली दाद कुबूल फरमाएं...
सादर.

वर्ज्य नारी स्वर said...

शानदार ग़ज़ल...

Sanju said...

बहुत ही बेहतरीन........
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

रेखा said...

हर -एक पंक्तियाँ शानदार और लाजबाब हैं ..

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

aik se bad kar aik She'r /... bahut sundar arthpurn gazal.. NavVarsh par haardik shubhkaamnayen

ब्लॉग बुलेटिन said...

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - सचिन का सेंचुरी नहीं - सलिल का हाफ-सेंचुरी : ब्लॉग बुलेटिन

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पूरी गज़ल शानदार ... सार्थक सन्देश देती हुई

Kailash Sharma said...

बहुत खूब! हरेक शेर गहन अर्थ समाये...आभार

chirag said...

bahut khoob sir
aakhari 2 line ne to dil jit liya sir

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

एक एक शेर अनमोल मोती की तरह.. सहेजकर रखने के लिए नहीं, बांटने के लिए!! प्रणाम आपको!!

veerubhai said...

लोग देखकर मुंह फेरेंगे झिड़केंगे,
सरे आम ग़म का बोझा न ढोया कर।

मैंने तुमसे कुछ उम्मीदें पाल रखी हैं,
और नहीं तो थोड़ा सा मुसकाया कर।
बहुत सुन्दर ग़ज़ल .इतना बोझा बे -मतलब मत ढ़ोया कर .

ZEAL said...

Excellent creation!

रजनी मल्होत्रा नैय्यर said...

वक़्त लौट कर चला गया दरवाज़े से,
ऐसी बेख़बरी से अब ना सोया कर।

तू ही एक नहीं है दुनिया में आलिम,
अपने फ़न पर न इतना इतराया कर।.......

बहुत ही छूती हुई और सच्ची पंक्तियाँ.......

रविकर said...

बहुत खूबसूरत ||

सम्वेदना के स्वर said...

आपकी गज़लें, दोहे, कवितायें और संत कवियों के परिचय (और उनकी रचनाएं) सब सुभाषित हैं...! कई बार तो लगता है कि बच्चों को स्कूल में पढाई जानी चाहिए ये रचनाएं, जो अब लुप्त हो चुकी हैं!!

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') said...

हमेशा की तरह एक लाजवाब करती गजल।

------
मुई दिल्‍ली की सर्दी..
... बुशरा अलवेरा की जुबानी।

आशा said...

बहुत शानदार गजल
आशा

उपेन्द्र नाथ said...

गहरे भावों के साथ सुंदर प्रस्तुति.....अच्छी सीख

देवेन्द्र पाण्डेय said...

एक मुकम्मल गज़ल है। हर शेर लाज़वाब। बहुत बधाई।

ऋता शेखर 'मधु' said...

वक़्त लौट कर चला गया दरवाज़े से,
ऐसी बेख़बरी से अब ना सोया कर।

बहुत खूबसूरत और अर्थपूर्ण गजल...

Urmi said...

बेहद ख़ूबसूरत एवं उम्दा ग़ज़ल! बधाई!

रश्मि प्रभा... said...

http://urvija.parikalpnaa.com/2012/01/blog-post_11.html

avanti singh said...

बहुत ही लाजवाब गज़ल है ..नीचे भी तो झांक जरा ऐ ऊपर वाले,
अपनी करनी पर थोड़ा पछताया कर...क्या बात है..

दिगम्बर नासवा said...

वक़्त लौट कर चला गया दरवाज़े से,
ऐसी बेख़बरी से अब ना सोया कर ...

दुबारा आने पे भी उतना ही मज़ा देती है ये गज़ल ...

दीपिका रानी said...

बहुत खूबसूरत लिखते हैं आप महेंद्र जी.. वटवृक्ष से आपके ब्लॉग का लिंक मिला। अब पढ़ते रहेंगे..

sushma 'आहुति' said...

मैंने तुमसे कुछ उम्मीदें पाल रखी हैं,
और नहीं तो थोड़ा सा मुसकाया कर।बेहतरीन ग़ज़ल....बहुत खूब.....

मेरे भाव said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !

dheerendra said...

बहुत अच्छी सुंदर प्रस्तुति,बढ़िया अभिव्यक्ति रचना अच्छी लगी.....
new post--काव्यान्जलि : हमदर्द.....

Naveen Mani Tripathi said...

तू ही एक नहीं है दुनिया में आलिम,
अपने फ़न पर न इतना इतराया कर।
kya khoob likha hai ak gahra chintan aur gambheerata ko samete huye ....badhai Verma ji

Naveen Mani Tripathi said...

तू ही एक नहीं है दुनिया में आलिम,
अपने फ़न पर न इतना इतराया कर।
kya khoob likha hai ak gahra chintan aur gambheerata ko samete huye ....badhai Verma ji

vandana said...

नीचे भी तो झांक जरा ऐ ऊपर वाले,
अपनी करनी पर थोड़ा पछताया कर।

बहुत बढ़िया गज़ल

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

शानदार!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

कमाल की गज़ल है! आपकी लेखना को शत शत नमन।