ग़ज़ल: पलकों के लिए



आँख में तिरती रही उम्मीद सपनों के लिए,
गीत कोई गुनगुनाओ आज पलकों के लिए।

आसमाँ तू देख रिश्तों में फफूँदी लग गई,
धूप के टुकड़े कहीं से भेज अपनों के लिए।

है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।

ना ज़मीं है ना हवा है और ना तितली कहीं,
आसमाँ भी गुम हुआ है आज शहरों के लिए।

बाँध कर रखिए सभी रिश्ते वगरना यूँ न हो,
छूट जाते साथ हैं कई बार बरसों के लिए।

आम की अमिया कुतरने शाम का सूरज रुका,
बँध गए कोयल युगल हैं सात जनमों के लिए।

है नहीं आसाँ गजल कहना कि मेरे यार सुन,
रूठ जाते हर्फ़ हैं कुछ  ख़ास मिसरों के लिए।

                                                                                     -महेन्द्र वर्मा

44 comments:

ANULATA RAJ NAIR said...

वाह सर!!!!!!!!!!!

बेहतरीन गज़ल....

है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।
लाजवाब शेरों से सजी..

सादर.
अनु

रविकर said...

बहुत बढ़िया भाई जी |

आभार ||

डॉ. मोनिका शर्मा said...

ना ज़मीं है ना हवा है और ना तितली कहीं,
आसमाँ भी गुम हुआ है आज शहरों के लिए।
Sach Kaha ..... Bahut Sunder Gazal

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

है नहीं आसाँ गजल कहना कि मेरे यार सुन,
रूठ जाते हर्फ़ हैं कुछ ख़ास मिसरों के लिए। - उम्दा शेर

रश्मि प्रभा... said...

आसमाँ तू देख रिश्तों में फफूँदी लग गई,
धूप के टुकड़े कहीं से भेज अपनों के लिए।... जिसकी आँच में गांठें जल जाएँ और पहले सी सोंधी खुशबू रह जाए

virendra sharma said...

है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।

ना ज़मीं है ना हवा है और ना तितली कहीं,
आसमाँ भी गुम हुआ है आज शहरों के लिए।
आसमा तू देख रिश्तों में फफूंदी लग गई ,....

वाह क्या बात है .एक तरफ कुदरत का मानवीकरण दूसरी तरफ मानव का फफूंदी -करण.दोनों सटीक .

Dr.NISHA MAHARANA said...

बाँध कर रखिए सभी रिश्ते वगरना यूँ न हो,
छूट जाते साथ हैं कई बार बरसों के लिए।very nice.

दिगम्बर नासवा said...

आसमाँ तू देख रिश्तों में फफूँदी लग गई,
धूप के टुकड़े कहीं से भेज अपनों के लिए....

सुभान अल्ला ... बहुत ही कमाल का शेर है इस खूबसूरत गज़ल का ...

mridula pradhan said...

आसमाँ तू देख रिश्तों में फफूँदी लग गई,
धूप के टुकड़े कहीं से भेज अपनों के लिए।
bar-bar padhi hoon......bahot achcha likhe hain.

Sunil Kumar said...

आसमाँ तू देख रिश्तों में फफूँदी लग गई,
धूप के टुकड़े कहीं से भेज अपनों के लिए।
वाह! क्या बात है,बेहतरीन गज़ल.........

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

है नहीं आसाँ गजल कहना कि मेरे यार सुन,
रूठ जाते हर्फ़ हैं कुछ ख़ास मिसरों के लिए।

कभी कभी ऐसा ही लगता है सर...

है बहुत मुश्किल की गिरकर गीत भी गाये कोई
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए...

बहुत उम्दा अशार... खुबसूरत ग़ज़ल...
सादर....

लोकेन्द्र सिंह said...

है नहीं आसाँ गजल कहना कि मेरे यार सुन,
रूठ जाते हर्फ़ हैं कुछ ख़ास मिसरों के लिए।.....
इसलिए अपुन तो इतनी बढिय़ा गजल कह ही नहीं पाते। कभी-कभार थोड़ा बहुत काम चला लेते हैं। आखिर की दो पोस्ट पर भी टिप्पणी छोड़ी हैं।

संध्या शर्मा said...

है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।

बहुत-बहुत खूबसूरत...लाजवाब... सादर

Amrita Tanmay said...

उस ख़ास मिसरे का बेसब्री से इन्तजार है . बेहद खुबसूरत लिखा है..

vandan gupta said...

है नहीं आसाँ गजल कहना कि मेरे यार सुन,
रूठ जाते हर्फ़ हैं कुछ ख़ास मिसरों के लिए।

्क्या बात कही है ……बहुत खूब गज़ल

मनोज कुमार said...

है नहीं आसाँ गजल कहना कि मेरे यार सुन,
रूठ जाते हर्फ़ हैं कुछ ख़ास मिसरों के लिए।
लाजवाब वर्मा साहब! क्या सुंदर प्रयोग किया है, रूठ जाते हर्फ़ हैं कुछ ख़ास मिसरों के लिए। ज़िन्दगी ऐसे ही रूठे लोगों को मनाने में बीत जाती है, जो कुछ मिसरों के लिए रूठते रहते हैं।

Shalini kaushik said...

bahut khoob.vah.....aabhar..mere jile ke neta ko C.M.bana do and 498-a

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 26-03-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

udaya veer singh said...

बेहतरीन रचना ,मुखर अभिव्यक्ति प्रशंशनीय है / शुभकामनायें जी /

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।......rooth jaate harf hain kuch khas misron ke liye...bar bar padhne ko dil karta hai..bahut hee shashakt ghazal...sadar badhayee ke sath

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।......rooth jaate harf hain kuch khas misron ke liye...bar bar padhne ko dil karta hai..bahut hee shashakt ghazal...sadar badhayee ke sath

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

आसमाँ तू देख रिश्तों में फफूँदी लग गई,
धूप के टुकड़े कहीं से भेज अपनों के लिए।
ना ज़मीं है ना हवा है और ना तितली कहीं,
आसमाँ भी गुम हुआ है आज शहरों के लिए।
है नहीं आसाँ गजल कहना कि मेरे यार सुन,
रूठ जाते हर्फ़ हैं कुछ ख़ास मिसरों के लिए।
संजय जी, बहुत ही नये प्रतिबिम्ब उतारे हैं, दाद कबूल कीजियेगा.

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

कृपया संजय जी के स्थान पर महेंद्र जी पढ़ें, लिपिकीय त्रुटि हेतु क्षमा करेंगे.

दीपिका रानी said...

है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।
बहुत खूब.. एक सुंदर ग़ज़ल पढ़ने को मिली..

virendra sharma said...

बाँध कर रखिए सभी रिश्ते वगरना यूँ न हो,
छूट जाते साथ हैं कई बार बरसों के लिए।

आम की अमिया कुतरने शाम का सूरज रुका,
बँध गए कोयल युगल हैं सात जनमों के लिए।
चर्चा मंच के मार्फ़त एक मर्तबा यह ग़ज़ल फिर पढ़ी .अभय और सीख दोनों बांटती है यह ग़ज़ल .

सदा said...

आसमाँ तू देख रिश्तों में फफूँदी लग गई,
धूप के टुकड़े कहीं से भेज अपनों के लिए....

वाह ..बहुत खूब लिखा है आपने ... लाजवाब करती पंक्तियां

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

वर्मा सा'ब!
हर्फ़ आपसे रुठ जाएँ हो ही नहीं सकता.. इतनी नरमी से आप उनको उठाते हैं, चुनते हैं, पिरोते हैं कि हर्फ़-हर्फ़ की इज्ज़तअफजाई होती है..
तीसरे शेर पर गुलज़ार साहब याद आये:
मचल के जब भी आँखों से, छलक जाते हैं दो आंसू,
सुना है आबशारों को बड़ी तकलीफ होती है!
/
बहुत ही सुन्दर गज़ल!!

अशोक सलूजा said...

बहुत खूबसूरत गज़ल पढ़ने को मिली !
वाह !
है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।
शुभकामनाएँ!

Kailash Sharma said...

आँख में तिरती रही उम्मीद सपनों के लिए,
गीत कोई गुनगुनाओ आज पलकों के लिए।

....लाज़वाब! हरेक शेर बहुत उम्दा और सार्थक..


http://aadhyatmikyatra.blogspot.in/

Maheshwari kaneri said...

ना ज़मीं है ना हवा है और ना तितली कहीं,
आसमाँ भी गुम हुआ है आज शहरों के लिए।....वाह: बहुत सुन्दर..

Dr Xitija Singh said...

ना ज़मीं है ना हवा है और ना तितली कहीं,
आसमाँ भी गुम हुआ है आज शहरों के लिए।

वाह !! क्या खूब लिखा है ...

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।

महेंद्र जी , ये चमत्कारी भाव कहाँ से ढूँढ लाते हैं

Suman said...

आँख में तिरती रही उम्मीद सपनों के लिए,
गीत कोई गुनगुनाओ आज पलकों के लिए।
kaya baat hai sundar gajal ....

Vandana Ramasingh said...

आसमाँ तू देख रिश्तों में फफूँदी लग गई,
धूप के टुकड़े कहीं से भेज अपनों के लिए।

है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।

है नहीं आसाँ गजल कहना कि मेरे यार सुन,
रूठ जाते हर्फ़ हैं कुछ ख़ास मिसरों के लिए।
विशिष्टता लिये हुए हैं सभी शेर पर ये अति विशिष्ट हैं ..संग्रहणीय

ऋता शेखर 'मधु' said...

है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।

कितने आसान शब्दों में इतनी बड़ी प्रेरणा...लाजवाब!

संजय @ मो सम कौन... said...

गज़लगोई की आपकी शैली बहुत खूबसूरत है, पढ़ो तो बहुत आसान दिखती है लेकिन ऐसा एक भी शेर अपन नहीं कह सकते।
छा गये वर्मा साहब..

संजय भास्‍कर said...

पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ...

हरेक शेर बहुत उम्दा और सार्थक बधाई स्वीकारें...महेंद्र जी

स्वाति said...

है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।
लाजवाब.....

Unknown said...

आसमाँ तू देख रिश्तों में फफूँदी लग गई,
धूप के टुकड़े कहीं से भेज अपनों के लिए।
jindagi se judi jindagi ki jubani.
LAJAWAB LINES.

ashish said...

superb ghazal as usual just loved it.

संजय भास्‍कर said...

...क्या खूब शेर कहे हैं, लाजवाब, याद रखने लायक...!!!!

dinesh gautam said...

क्या बात है, इतने कमाल के शेर कहे हैं आपने कि कोई भी इसे पढ़कर वाह वाह कह उठेगा। आप तो बस इसी तरह लिखते रहिए। खासकर इन दो शेरों ने तो आपका मुरीद बना दिया -

है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।

है नहीं आसाँ गजल कहना कि मेरे यार सुन,
रूठ जाते हर्फ़ हैं कुछ ख़ास मिसरों के लिए।

सचमुच कमाल के शेर!

dinesh gautam said...

क्या बात है, इतने कमाल के शेर कहे हैं आपने कि कोई भी इसे पढ़कर वाह वाह कह उठेगा। आप तो बस इसी तरह लिखते रहिए। खासकर इन दो शेरों ने तो आपका मुरीद बना दिया -

है बहुत मुश्किल कि गिरकर गीत भी गाए कोई,
है मगर आसान कितना देख झरनों के लिए।

है नहीं आसाँ गजल कहना कि मेरे यार सुन,
रूठ जाते हर्फ़ हैं कुछ ख़ास मिसरों के लिए।

सचमुच कमाल के शेर!

Satish Saxena said...

आसमाँ तू देख रिश्तों में फफूँदी लग गई,
धूप के टुकड़े कहीं से भेज अपनों के लिए।

गज़ब की रचनाशक्ति पायी है महेंद्र भाई ! वेहद प्रभावशाली रचना ...