फूल हों ख़ुशबू रहे












दर रहे या ना रहे छाजन रहे,
फूल हों ख़ुशबू रहे आँगन रहे ।

फ़िक्र ग़म की क्यों, ख़ुशी से यूँ अगर,
आँसुओं से भीगता दामन रहे ।

झाँक लो भीतर कहीं ऐसा न हो,
आप ही ख़ुद आप का दुश्मन रहे ।

ज़िंदगी में लुत्फ़ आता है तभी,
जब ज़रा-सी बेवजह उलझन रहे ।

कल सुबह सूरज उगे तो ये दिखे,।
बीज मिट्टी और कुछ सावन रहे ।

                                                      -महेन्द्र वर्मा

5 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, गणतंत्र दिवस समारोह का समापन - 'बीटिंग द रिट्रीट'“ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Bharat Bhushan said...

हर दूसरी पंक्ति मन पर सशक्त दस्तक देती है. ये चार तो बेहद गहरी अर्थध्वनि करके अपनी छाप छोड़ती हैं-

झाँक लो भीतर कहीं ऐसा न हो,
आप ही ख़ुद आप का दुश्मन रहे ।
ज़िंदगी में लुत्फ़ आता है तभी,
जब ज़रा-सी बेवजह उलझन रहे ।

Unknown said...

Nice line, publish online book with best
Hindi Book Publisher India

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ख़ूब ...
हर शेर नया आग़ाज़ है ... अलग धार है हर शेर की ...
लाजवाब ग़ज़ल ...

Amrita Tanmay said...

बेहद उम्दा ।