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बुधवार, 27 जुलाई 2016

उम्र का समंदर














दिन ढला तो साँझ का उजला सितारा मिल गया,
रात की अब फ़िक्र किसको जब दियारा मिल गया ।

ज़िंदगी   की  डायरी   में    बस   लकीरें  थीं  मगर,
कुछ लिखा था जिस सफ़्हे पर वो दुबारा मिल गया ।

तेज़ लहरों ने गिराया फिर उठाया और तब,
उम्र के गहरे समंदर का किनारा मिल गया ।

वो  जिसे  बाहर  हमेशा  ढूँढता  फिरता  रहा,
बंद आखों से हृदय में जब निहारा मिल गया ।

वक़्त ने  की  मेह्रबानी  तोहफ़ा  उसने  दिया,
फिर वही अनबूझ प्रश्नों का पिटारा मिल गया ।


-महेन्द्र वर्मा

मंगलवार, 21 जून 2016

चींटी के पग




सहमी-सी है झील शिकारे बहुत हुए,
और उधर तट पर मछुवारे बहुत हुए ।

चाँद सरीखा कुछ तो टाँगो टहनी पर,
जलते-बुझते जुगनू तारे बहुत हुए ।

चींटी के पग नेउर को भी सुनता हूँ,,
ढोल मँजीरे औजयकारे बहुत हुए ।


आओ अब मतलब की बातें भी  कर लें,
जुमले वादे भाषण नारे बहुत हुए ।

कुदरत यूँ ही ख़फ़ा नहीं होती हमसे,
समझाने के लिए इशारे बहुत हुए ।




-महेन्द्र वर्मा

बुधवार, 25 मई 2016

मन के नयन

मन के नयन खुले हैं जब तक,
सीखोगे तुम जीना तब तक ।

दीये को कुछ ऊपर रख दो,
पहुँचेगा उजियारा सब तक ।

शोर नहीं बस अनहद से ही,
सदा पहुँच जाएगी रब तक।

दिल दरिया तो छलकेगा ही,
तट भावों को रोके कब तक।

जान नहीं पाया हूँ  कुछ भी,
जान यही पाया हूँ अब तक।

-महेन्द्र वर्मा

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

श्वासों का अनुप्रास










   (चित्र-महेन्द्र वर्मा)







सच को कारावास अभी भी,
भ्रम पर सबकी आस अभी भी ।

पानी  ही   पानी   दिखता  पर,
 
मृग आँखों में प्यास अभी भी ।
 
 मन का मनका फेर कह रहा,
खड़ा कबीरा पास अभी भी ।                                                                                                                           

बुद्धि विवेक ज्ञान को वे सब,
देते   हैं  संत्रास  अभी  भी ।

जीवन लय  को  साध  रहे हैं,
श्वासों का अनुप्रास अभी भी ।

पाने का  आभास क्षणिक था
खोने का अहसास अभी भी ।
 
पंख हौसलों के ना कटते,
उड़ने का उल्लास अभी भी ।

                                 -
महेन्द्र वर्मा