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मंगलवार, 27 सितंबर 2016

बेवजह



मुश्किलें तुमने खड़ी की बेवजह,
क्यों किताबें चार पढ़ ली बेवजह ।

हाथ में गहरी लकीरें दर्ज थीं,
छल किया तक़़दीर ने ही बेवजह ।

सुबह ही थी शाम कैसे यक-ब-यक,
वक़्त ने की दुश्मनी-सी बेवजह ।

वो नहीं पीछे कभी भी देखता,
आपने आवाज़ क्यों दी बेवजह ।

धूप थी, मैं था मगर साया न था,
देखता हूँ राह किस की बेवजह ।


-महेन्द्र वर्मा

रविवार, 28 अगस्त 2016

बातों का फ़लसफ़ा



 
                            

ज़रा-ज़रा इंसाँ  होने से मन को सुकून मिलना तय है,
अगर देवता बन बैठे तो हरदम दोष निकलना तय है ।

सूरज गिरा क्षितिज के नीचे   सुबह सबेरे फिर चमकेगा,
चलने वालों का ही गिरना उठना फिर से चलना तय है ।

जब अतीत की गहराई से   यादों का लावा-सा निकले,
मन में जमी भावनाओं का गलना और पिघलना तय है ।

जहाँ-जहाँ  ढूँढ़ोगे   उसको   अपना   ही   साया   देखोगे,
ख़ुद से अलग समझते हो तो इस यक़ीन में छलना तय है ।

बातों का है  यही फ़़लसफ़ा  रपटीली  होती हैं   अक्सर,
समझ गए तो सँभल गए पर चूके अगर फिसलना तय है ।



                             -महेन्द्र वर्मा