Nov 14, 2010

बाल दिवस विशेष 
दो बाल गीत

1.
गुड्डा बहुत सयाना जी,
सीखा हुकुम चलाना जी।


पापा से बातें है करनी,
ऑफिस फोन लगाना जी।


टामी क्यों भौं-भौं करता है,
उसको दूर भगाना जी।


आंसू क्यों टप-टप टपकाते, 
छोड़ो रोना-धोना जी।


अच्छे गाते हो तुम चिंटू,
एक सुना दो गाना जी।


अब सोने दो रात हो गई,
ऊधम नहीं मचाना जी।


जाना है स्कूल सबेरे,
जल्दी मुझे जगाना जी।


2.
गोल  है चंदा सूरज गोल,
दीदी, क्या तारे भी गोल।


चूहा चूं-चूं चिड़िया चीं,
चींटी की क्या बोली बोल।


कोयल इतनी काली पर क्यों, 
कानों में रस देती घोल।


सात समंदर भरे पड़े पर,
पानी क्यों इतना अनमोल।


मां से भी पूछा था मैंने,
पर वे करतीं टालमटोल।


-महेन्द्र वर्मा

22 comments:

आशीष मिश्रा said...

दोनों बाल कविताएँ अच्छी लगी.........आभार

संजय भास्कर said...

दोनों कविताएँ अच्छी लगी

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत सुंदर और प्यारे बाल गीत ...... धन्यवाद

john-robotics said...

kawita badhiya hai dear jaari rakho

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनायें ! दोनों कविताएँ अच्छी है.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

दोनों कविताएँ बहुत सुन्दर है ...
बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !

mahendra verma said...

आप सभी के प्रति आभार।

Vijai Mathur said...

इन कविताओं के माध्यम से अच्छा सन्देश दिया है आपने .बच्चों को यह भी बता देते कि,समुद्र का पानी खरा होता है और पीने लायक नहीं है इस लिए जो मिल रहा है वह काफी अनमोल है और उसे किफ़ायत से इस्तेमाल करें.

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH said...

बाऊ जी,
नमस्ते!
अति सुन्दर!
आशीष
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पहला ख़ुमार और फिर उतरा बुखार!!!

ZEAL said...

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महेंद्र जी,

बाल दिवस पर आपकी ये अनुपम रचना बहुत अच्छी लगी--आभार।

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mahendra verma said...

आशीष् जी,गीत पसंद करने के लिए आभार।
आपकी टिप्पणी के अंत में लिखाहै- पहला खुमार, फिर उतरा बुखार- इस का मतलब समझ में नहीं आया। कहीं ये आप की नई पोस्ट का टाइटल तो नहीं , जाता हूं आपके ब्लॉग पर...धन्यवाद।

mahendra verma said...

दिव्या जी, गीत की सराहना करने के लिए आभार।

क्षितिजा .... said...

दोनों कविताएँ बहुत मासूम ... धन्यवाद महेंद्र जी ...

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

चूहा चूं चिड़िया चीं चीं
चींटी क्या बोली बोल।
वर्मा जी लगता है बाल कविता आगे आपका ज़ानर होने वाला है।
दोनो ही कवितायें बहुत ही रसदार हैं और बाल-मन को ज़रुर ही प्रफ़ुल्लित करेंगी। दिल के चारों कमरों और मन के लाखों तन्तुओं की तरफ़ से आपको बधाई।

Asha said...

दोनो बाल गीत बहुत अच्छे लगे |बधाई
आशा

मोहिन्दर कुमार said...

अरे क्या हुआ भाई साहिब आप तो बचपने पर उतर आये..

बचपन याद दिलाने के लिये आभार

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाऍं।


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जानिए गायब होने का सूत्र।
बाल दिवस त्‍यौहार हमारा हम तो इसे मनाएंगे।

उपेन्द्र said...

बाल दिवस पर बहुत ही अच्छी प्रस्तुति....दोनों कवितायेँ बहुत ही प्यारी है.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

महेंद्र जी, इन लुप्तप्राय शिशु गीत के माध्यमसे आपने बचपन वापस लौटा दिया...

Bhushan said...

बहुत सुंदर बाल-गीत. बहुत देर के बाद इतने बढ़िया बाल-गीत पढ़े. आभार

निर्मला कपिला said...

दोनो बाल रचना बहुत ही अच्छी लगी। बधाई।

तदात्मानं सृजाम्यहम् said...

महेन्द्र जी, फिर बचपन वापस आया है, या ह्रदय में छुपे शिशु ने किलकारी भरी है। भाई, रचना तो यही कहती है। बधाई स्वीकारें।