Nov 12, 2010

क्या आप बोलने की कला जानते हैं ?

प्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक सुकरात के पास एक युवक भाषण कला सीखने के उद्देश्य से आया। सुकरात ने स्वीकृति तो दी किंतु दुगुने शुल्क की मांग की। युवक आश्चर्य से बोला-‘मैं तो पहले से ही बोलने का अभ्यस्त हूं, फिर भी आप मुझसे दूने शुल्क की मांग कर रहे हैं ?‘ तब सुकरात ने कहा-‘तुम्हें बोलना नहीं बल्कि चुप रहना सिखाने में दूना श्रम करना पड़ेगा।‘
बोलने और चुप रहने के ताने-बाने में मनुष्य सदैव ही उलझता आया है। मनुष्य के जीवन में सुख और दुख के जो प्रमुख कारण हैं, उनमें वाणी भी एक है। संत कबीर कहते हैं-
एक शब्द सुखरास है, एक शब्द दुखरास।
एक शब्द बंधन करै, एक शब्द गलफांस।।
वाणी की इस द्वैधी प्रकृति को संतों ने बड़ी गहनता से अनुभूत किया था इसलिए उन्होंने वाणी के संयमित उपयोग के प्रति लोगों को सदैव सचेत किया। संत कबीर ने एक पद में बताया है कि कब, किससे, क्या बोलना चाहिए-
बोलत बोलत बाढ़ विकारा, सो बोलिए जो पड़े विचारा।
मिलहिं संत वचन दुइ कहिए, मिलहिं असंत मौन होय रहिए।
पंडित सों बोलिए हितकारी, मूरख सों रहिए झखमारी।
कन्फ्यूसियस ने कहा है-‘शब्दों को नाप तौल कर बोलो, जिससे तुम्हारी सज्जनता टपके।‘ कबीर ने भी यही कहा है-
बोली तो अनमोल है, जो कोई बोले जान।
हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आन।।
वाणी का अत्यधिक उपयोग प्रायः विकार उत्पन्न करता है। इसलिए संयमित वाणी को विद्वानों ने अधिक महत्व दिया है। ऋषि नैषध कहते हैं-‘मितं च सार वचो हि वाग्मिता‘ अर्थात, थोड़ा और सारयुक्त बोलना ही पाण्डित्य है। जैन और बौद्ध धर्मों में वाक्संयम का महत्वपूर्ण स्थान है।
कहावत है, ‘बात बात में बात बढ़ जाती है‘, इसी संदर्भ में तुलसीदास जी की यह व्यंग्योक्ति बहुत बड़ी सीख देती है-
पेट न फूलत बिनु कहे, कहत न लागत देर।
सुमति विचारे बोलिए, समझि कुफेर सुफेर।।
भारतीय दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति ने कहा है-‘कम बोलो, तब बोलो जब यह विश्वास हो जाए कि जो बोलने जा रहे हो उससे सत्य, न्याय और नम्रता का व्यतिक्रम न होगा।‘ इसलिए बोलते समय सतर्क रहना चाहिए। कबीर साहब के अनुसार-
शब्द संभारे बोलिए, शब्द के हाथ न पांव,
एक शब्द औषध करे, एक शब्द करे घाव।
फ्रांसीसी लेखक कार्लाइल ने कहा है कि मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक्शक्ति है।
गांधीजी ने भी मौन को सर्वोत्तम भाषण कहा है। सुकरात कहा करते थे-‘ईश्वर ने हमें दो कान दिए हैं और मुंह एक, इसलिए कि हम सुनें अधिक और बोलें कम।‘
किंतु व्यावहारिक जीवन में सदा मौन रहना संभव नहीं है इसलिए संत कबीर ने बोलते समय मध्यम मार्ग अपनाने का सुझाव दिया है-
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
                                                                                                                               - महेन्द्र वर्मा 

12 comments:

ajit gupta said...

बहुत प्रेरक आलेख। सच है जब तक आपकी वाणी सशक्‍त नहीं होगी तब तक आप कितना ही बोले प्रभाव नहीं छोडेगी। इसलिए उतना ही बोले जितना लोग सुने।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

महेन्‍द्र भाई, सच कहा आपने जीवन में सफल होने के लिए बोलने की कला आना जरूरी है।
आभार।

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मिलिए तंत्र मंत्र वाले गुरूजी से।
भेदभाव करते हैं वे ही जिनकी पूजा कम है।

Vijai Mathur said...

बिलकुल सही आलेख दिया आपने जिसने आधुनिक मौनी बाबा पूर्व प्रधान मंत्री नर्सिघा राव जी की याद दिला दी जिन्होंने मौन रह कर अपनी अल्प मत सरकार पूरे पञ्च साल आराम से चला ली.

Bhushan said...

कम बोलने के लाभ-अलाभ दोनों हैं. आज कल बोलने का युग है. जानकारी से मारने का युग है. जो अधिक बोलता है (बाज़ार में) उसे सफलता मिलते देखी गई है.

Dorothy said...

वाक् कौशल पर आधारित विचारोत्तेजक आलेख के लिए धन्यवाद. आभार
सादर,
डोरोथी.

क्षितिजा .... said...

सही कहा आपने ... बोलने की कला आना बहुत ज़रूरी है ... नहीं तो 'एक चुप सौ सुख '.. ये सबसे अच्छा है .. :)

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत प्रेरक.....सच में बोलने में संयम का बहुत महत्व है.....

मो सम कौन ? said...

बहुत सारगर्भित लेख है वर्मा जी। लिखना\बोलना आ जाये, और वो भी सार्थक, तो कुछ और पाने को नहीं बचेगा।

ZEAL said...

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संतुलित आहार की तरह , वाणी भी नियंत्रित एवं संतुलित होनी चाहिए।

There is an old adage , it goes thus -

" think twice before you speak "

Thanks for the beautiful post .

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मनोज कुमार said...

वाणी में संतुलन ही हमें अपनाना चाहिए। बहुत सही सीख देती रचना।

वन्दना said...

बेहद प्रेरक आलेख…………तभी तो कहा गया है
ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय
औरन को सीतल करे आपहु सीतल होय

जितना बोलो तर्कसंगत बोलो।

Sunil Kumar said...

बहुत सारगर्भित लेख है