Sep 15, 2013

जिस्म पर फफोले

पराबैगनी किरणों के
एक समूह ने
ओजोन छिद्र से
धरती की ओर झांका
सयानी किरणों के
निषेध के बावजूद
कुछ ढीठ, उत्पाती किरणें
धरती पर उतर आर्इं
विचरण करने लगीं
बाग-बगीचों, नदी-तालाबों और
सड़कों-घरों में भी
कुछ पल बाद ही
मानवों के इर्द-गिर्द
घूमने वाली पराबैगनी किरणें
चीखती-चिल्लातीं
रोती-बिलखतीं
आसमान की ओर भागीं
उनके जिस्म पर
फफोले उग आए थे
कटोरों के आकार के
कराहती हुर्इ
वे कह रही थीं-
हाय !
कितनी भयानक
और घातक हैं
मनुष्यों से
निकलने वाली
'मनोकलुष किरणें' !

                                 -महेन्द्र वर्मा


15 comments:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

सुंदर सृजन!बेहतरीन रचना के लिए बधाई!महेंद्र जी,

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संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पराबैगनी किरणों से भी घातक.... सटीक और यथार्थ को कहती सुंदर रचना ।

vandana said...

कितनी भयानक
और घातक हैं
मनुष्यों से
निकलने वाली
'मनोकलुष किरणें' !

सटीक व्यंग्य !!!

Asha Saxena said...

नया सोच लिए रचना |शानदार |

डॉ. मोनिका शर्मा said...

प्रभावी, सटीक अभिव्यक्ति

दिगम्बर नासवा said...

रासायनिक किरनें भी डर गह्यीं इंसानी किरणों से ... शायद किसी नेता के टकरा गयीं होंगी ...
सटीक, प्रभावी रचना ...

Bharat Bhushan said...

वाह. क्या बात है. मनोकलुष किरणें....बहुत खूब नाम दिया है.

Amrita Tanmay said...

'मनोकलुष किरणें' क्या सूक्ष्म परख है आपकी.. वाह!

Vikesh Badola said...

कड़वे सच को दर्शाती कविता।

संजय भास्‍कर said...

और घातक हैं
मनुष्यों से
निकलने वाली
'मनोकलुष किरणें' !

........ सटीक अभिव्यक्ति

Neeraj Kumar said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (23.09.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें .

Virendra Kumar Sharma said...


हाय !
कितनी भयानक
और घातक हैं
मनुष्यों से
निकलने वाली
'मनोकलुष किरणें' !

नेता पे पड़ के उलटे पाँव लौट जाएँ ,

लौट के फिर कभी न आयें।

कालीपद प्रसाद said...

सुन्दर बेहतरीन रचना बधाई!
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Kailash Sharma said...

कितनी भयानक
और घातक हैं
मनुष्यों से
निकलने वाली
'मनोकलुष किरणें' !

...लाज़वाब और सटीक व्यंग....

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

अज्ञेय जी ने कुछ इसी तरह साँप के माध्यम से कहा है--
साँप तुम सभ्य तो नही हुए
शहर में बसना भी तुम्हें नही आया
फिर कहाँ सीखा डसना
और जहर कहाँ पाया ।
बहुत बढिया ।