Nov 25, 2017

पूजा से पावन





                 जाने -पहचाने  बरसों के  फिर  भी   वे अनजान लगे,
                 महफ़िल सजी हुई है लेकिन सहरा सा सुनसान लगे ।

                इक दिन मैंने अपने ‘मैं’ को अलग कर दिया था ख़ुद से,
                अब जीवन  की  हर  कठिनाई  जाने क्यों आसान लगे ।

                 चेहरे  उनके  भावशून्य  हैं  आखों  में  भी  नमी  नहीं,
                 वे  मिट्टी  के  पुतले  निकले  पहले  जो  इन्सान  लगे ।

                 उजली-धुँधली यादों की जब चहल-पहल सी रहती है,
                 तब  मन  के  आँगन का कोई कोना क्यों वीरान लगे ।

                  होते  होंगे  और कि जिनको भाती है आरती अज़ान,
                  हमको  तो  पूजा  से  पावन बच्चों की मुस्कान लगे ।

                                                                                                                            -महेन्द्र वर्मा

13 comments:

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 26 नवम्बर 2017 को साझा की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

दिगंबर नासवा said...

वाह ... दार्शनिकता लिए शेर सीधे मन में उतरते हैं
इक दिन मैंने अपने मैं को .. कमाल का शेर है दूर की बात कहता हुआ ...

Bharat Bhushan said...

आपकी यह ग़ज़ल उदासी से मुस्कान तक के सफ़र को सहज दर्शन बना देती है.
होते होंगे और कि जिनको भाती है आरती अज़ान,
हमको तो पूजा से पावन बच्चों की मुस्कान लगे।
यह शे'र इंसानी मासूमियत ऊँचाई देता है.

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुन्दर

NITU THAKUR said...

शानदार.....बधाई और शुभकामनाये

Sudha devrani said...

वाह!!!
लाजवाब गजल....
बहुत ही सुन्दर।

kuldeep thakur said...

दिनांक 28/11/2017 को...
आप की रचना का लिंक होगा...
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...

रेणु said...
This comment has been removed by the author.
रेणु said...

Blogger Renu said...
आदरणीय महेंद्र जी --- आपके ब्लॉग पर पहली बार आकर आपकी भावपूर्ण सुंदर रचना पढ़ी | बहुत अच्छी लगी | सराहनीय रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई प्रेषित करती हु |

Nov 28, 2017, 3:10:00 PM Delete

'एकलव्य' said...

बहुत ही सुन्दर रचना

संजय भास्‍कर said...

चेहरे उनके भावशून्य हैं आखों में भी नमी नहीं,
वे मिट्टी के पुतले निकले पहले जो इन्सान लगे ।
.....कमाल का शेर है नव वर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ ।

tbsingh said...

चेहरे उनके भावशून्य हैं आखों में भी नमी नहीं,
वे मिट्टी के पुतले निकले पहले जो इन्सान लगे ।सुन्दर पंक्तियाँ

Amrita Tanmay said...

मुस्कान सी खूबसूरत ।